सत्यमेव .....

हास्य व्यंग्य एक्सप्रेस

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जी0 एस0 एल0 वी0 – डी 3 बंगाल की खाड़ी को समर्पित । (व्यंग्य/कार्टून)

Posted On: 16 Apr, 2010 मस्ती मालगाड़ी में

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वही ठेठ गंवई अंदाज । कोई शुभ काम शुरू करने से पहले गांव के चऊरा (ग्राम देवता) को बलि दी जाती है । इसरो के ग्राम देवता बंगाल की खाड़ी में रहते हैं इसलिये हर नई तकनीकी पहले वहां समर्पित की जाती है तब आगे काम बढ़ाया जाता है । परंपरा तो निभानी ही पड़ेगी ।

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Kaedon के द्वारा
May 22, 2011

Cool! That’s a clever way of lokniog at it!

Ram kumar Pandey के द्वारा
April 19, 2010

मिश्र जी, आपकी कई व्यंग रचनाएं पढी. वाकई उत्कृष्ट लिखते हैं आप. हाजिर जवाबी से लिखा हुआ यह व्यंग निश्चित रूप से प्रेरणास्पद है.

    Danice के द्वारा
    May 21, 2011

    Fell out of bed feeling down. This has brihgtneed my day!

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
April 16, 2010

ha ha ha ……. bahut sunder , bahut achchha kataksh hai..

    Nollie के द्वारा
    May 21, 2011

    Thanks for sharing. Always good to find a real epxert.

manoj के द्वारा
April 16, 2010

महोदय आपका व्यग्यं बहुत ही हास्य और सुन्दत्र होता है , मगर ध्यान रखिए हर बात व्यंग्य की नही होती, बंगाल में इतने लोग प्रकृति ए कोप से मर गए और आपको मजाक सुझ रहा है. इसरो की सालों की मेहनत पर पानी फिर गया और आपको हंसी आती है. देखिए मैआपकी व्यग्य की कद्र करता हूं मगर इस तरह ऐसे समय में साथ देने की ब्जाय आपका व्यंग्य बेहद बुरा है.

    kmmishra के द्वारा
    April 16, 2010

    मनोज जी, आपको बुरा लगा इसके लिये क्षमाप्रार्थी हूं । इस प्रक्षेपण का इंतजार मुझको पिछले 18 सालों से था । कल का दिन मेरे लिये भी किसी दुःस्वपन से कम न था । 18 साल पहले अमेरिका ने हमें क्रायोजेनिक इंजन इसलिये नहीं दिया था क्योंकि इस इंजन का इस्तेमाल इंटर कान्टीनेन्टल ब्लास्टिक मिसाईल में भी किया जाता है । उसने हमें सिर्फ यह इंजन नहीं दिया बल्कि रूस को भी हमें यह तकनीकी देने से रोक दिया । कल अगर जीएसएलवी डी -3 का प्रक्षेप्रण सफलता पूर्वक हो जाता तो भारत अपनी पहली इंटर कान्टीनेन्टल ब्लास्टिक मिसाईल (सूर्य- रेंज 5000 किलोमीटर) के परीक्षण की तरफ अपना पहला कदम बढ़ा चुका होता । हम एक साल और पिछड़ गये और संचार उपग्रह जीसेट -4 का नुकसान हुआ सो अलग । यह राष्ट्रीय क्षति है । इसके पहले भी एक बार जी0 एस0 एल0 वी0 का प्रक्षेपण असफल हो गया था लेकिन हम हिम्मत नहीं हारे और रूस से मिले क्रायोजेनिक इंजनों का हमने सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया था । मुझे अपने वैज्ञानिकों पर पूरा भरोसा है और जल्द ही हम दुनिया को दिखा देंगे कि भारत वास्तव में एक महाशक्ति है । अब बात व्यंग्य की । क्यों इस घटना पर व्यंग्य किया ? भाई मैंने अपने गुरू स्व0 शरद जोशी जी का मात्र अनुसरण किया है । बहुत पहले उन्होंने भी ऐसे ही एक असफल अंतरिक्ष अभियान पर व्यंग्य किया था “ प्रतिदिन/शुंई, फुस्स, बिझंुग ” । इसका अर्थ हमारे वैज्ञानिकों की हंसी उड़ाना कदापि नहीं है,था । एक दुर्घटना घटी, हम दुःखी हुये, लेकिन हटाओ इस दुख के पल को, एक मुस्कान लाओ चेहरे पर और दुबारा नई ताकत, ऊर्जा और धैर्य के साथ अपने लक्ष्य पर लग जाओ । गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में । वो क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं ।


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