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हास्य व्यंग्य एक्सप्रेस

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कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है

पोस्टेड ओन: 23 Sep, 2010 Uncategorized में

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मैंने यह निश्चय किया था कि ब्लाग पर कभी व्यंग के सिवा और कुछ न लिखूंगा पर आज मैं अपनी यह कसम तोड़ रहा हूं सिर्फ यह बताने के लिये कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और मेरा मानना है कि मेरी और आपकी आवाज कश्मीर के मुट्ठीभर अलगाववादियों को जरूर सुनाई देगी ।

यह लेख अभी हाल में जागरण जंक्शन पर प्रकाशित हुये लेख ”गोली मार भेजे में” के उत्तर में है ।

पहले उपरोक्त लेख में की गयीं कुछ टिप्पणियां हैं ।

K M Mishra के द्वारा September 18, 2010

विशेष सशस्‍त्र बल कानून का एक दूसरा पक्ष भी है । वह पक्ष है कश्मीर और पश्चिमोत्तर जैसी स्थितियों को पूरे भारत में फैलने से रोकना । अनु0 370 का मजा लूटने वालों और कश्मीर को भारत से अलग करने वालों के लिये ही विशेष सशस्‍त्र बल कानून की जरूरत पड़ती है । कश्मीर घाटी में पाकिस्तान का झंडा लहराने वालों और इसी भारतीय संविधान को रद्दी से ज्यादा न मानने वालों को के लिये अनुच्छेद 21 की बात करना बेमानी होगी । उपेन्द्र जी सत्ता और यह दुनिया हमेशा से सिर्फ अच्छी अच्छी नीतियों से नहीं चलती हैं । आज पंजाब शांत है तो उसके लिये इंदिराजी का वह दमनकारी रूप इसका कारण है और कश्मीर अशांत है तो वह इसलिये क्योंकि वहां पर भारत की अखण्डता को चूनौती देने वाले खटमालों को दमन नहीं किया जा रहा है । सारे कीड़े मकोड़ों को साफ करके के पश्चात ही वहां शांति प्रिय देश की नीतियों लागू हो सकती है । इन खटमलों का एक ही उद्देश्य है कश्मीर को अलग कर के भारत की अखंडता पर हमला । अमरनाथ यात्रा आप बड़ी जल्दी भूल गये । इसके अलावा कश्मीरी पण्डितों के साथ क्या किया गया और आज सिख और बौद्धों को किस तरह से धर्मपरिर्वतन के लिये धमकाया जा रहा है । और रही मूलाधिकार की बात तो मूलाधिकारों का कितना पालन इस देश में हो रहा है ये भी तो आप अच्छी तरह जानते हैं । आभार ।


आर.एन. शाही के द्वारा September 18, 2010

मैं श्रद्धेय मिश्रा जी की भावनाओं से सहमति प्रकट करते हुए यह कहना चाहूंगा कि ठीक ऐसे समय, जबकि हमारे जवान कश्मीर में चौतरफ़ा आग और पत्थरों से घिरे हुए एक तरफ़ अलगाववादियों से जूझ रहे हैं, और दूसरी तरफ़ वहां के आतंकवाद की चिर समस्या से, पूरे देश की मीडिया से कुछ चुनिन्दा तत्वों को क्यों ऐसे ही वक़्त इस अनुच्छेद को तत्काल प्रभाव से हटा लेने की सख्त आवश्यकता महसूस हो रही है? ये मांग इतने ज़ोर-शोर से इसके पूर्व के दिनों में नहीं उठी थी । कहीं इसके निहितार्थ में भी तो कोई रहस्य नहीं छुपा हुआ है?

Ramesh bajpai के द्वारा September 18, 2010

प्रिय श्री मिश्रा जी, उपेन्द्र जी अनुच्छेद 370 को बिलकुल साधारण मान रहे है उनकी दलील है की यह तो काफी पहले से लागु .है ,


K M Mishra के द्वारा September 19, 2010

शाही सर प्रणाम । अनुच्छेद 370 का विरोध उतना ही पुराना है जितनी कश्मीर समस्या पुरानी है । गलत राजनैतिक लाभ लेने के लिये और तुष्टीकरण की नीतियां किस हद तक आत्मघाती होती हैं यह इसका साफ उदाहरण है । हमने कश्मीर सहित कई राज्यों को 370 की बैसाखी दे दी । आप देखें कि इस बैसाखी का प्रयोग जम्मू कश्मीर में सिर्फ कश्मीर घाटी के लिये ही होता है जम्मू और लद्दाख के इलाकों के वो सुविधा नहीं दी जाती है । कश्मीर घाटी जम्मू कश्मीर का मात्र एक छोटा सा हिस्सा है । 2/3 कश्मीर जम्मू और लद्दाख में बसता है । कश्मीरियत की बात होती है तो सिर्फ घाटी के 7,8 जिलों के लिये । क्या जम्मू में बसने वाले हिंदू और सिख और लद्दाख में बसने वाले बौद्ध कश्मीरी नहीं हैं । 370 का काला अनुभव यह कहता है कि इन राज्यों को हमने विशेष दर्जा देकर उनको आम भारतीयों से दस फिट ऊपर बैठा दिया । अब वे स्वायत्ता और उसकी आड़ में स्वतंत्रता की बात करते हैं पाकिस्तान के इशारों पर । वहां न हमारा संविधान लागू होता है और नहीं हमारा तिरंगा । कुल मिलाकर अनु0 370 ने ही उनको न भारतीय होने दिया और न ही उस क्षेत्र को भारत का हिस्सा मानने दिया । अनु0 370 ही मामले की असली जड़ है । शांति की बात वही समझता है जो शांति से रहना चाहता है । मगर जो अपने आप को स्वतंत्रता सैनानी समझता है वह भारत के खिलाफ युद्ध छेड़े हुये है और युद्ध के नियम सदा से ही दूसरे होते हैं ।


upendraswami के द्वारा September 21, 2010


मिश्रा जी, शाही जी, रमेश जी! मुझे लगता है कि कश्मीर को देखने का हमारा नजरिया बहुत सीमित व एकतरफा है- अनुच्छेद 370, कश्मीरी पंडित.. वगैरह, वगैरह। मिश्रा जी का कश्मीर के लोगों को कीड़े-मकोड़े, खटमल कहना दर्शाता है कि हम किस सोच के साथ इस चुनौती का सामना कर रहे हैं। क्या कश्मीर के सारे लोगों को ठिकाने लगाकर कश्मीर पर नियंत्रण बनाए रखने में हमें गर्व होगा या एक फलते-फूलते कश्मीर को साथ लेकर चलते हुए गमें गर्व होगा- जवाब तो इस सवाल का ढूंढना है। शाही जी का यह कहना भी गलत है कि इस मसले को अब उठाने में कोई निहितार्थ हैं। अगर आम लोगों को तसल्ली देना कोई निहितार्थ है, तो वह बेशक कभी भी हो सकता है। लेकिन मैंने अपनी मूल पोस्ट में लिखा था कि मणिपुर में इरोम शर्मिला तो दस साल से इस कानून के खिलाफ अनशन पर हैं। एएफएसपीए का विरोध तो काफी समय से हो रहा है, बस ज्यादती होती है तो गूंज ज्यादा सुनाई देने लगती है। इसी तरह अनुच्छेद 370 का इस्तेमाल भी सिर्फ राजनीतिक विरोध के लिए होता है। कश्मीर को विशेष अधिकार प्राप्त है तो उसका क्या नुकसान बाकी देश को हुआ, इसका किसी के पास कोई तर्क नहीं, इसके सिवाय कि अनुच्छेद 370 का फायदा उठाकर कश्मीर में आतंकी पनप रहे हैं। कश्मीर के भारत में विलय की स्थितियों व शर्तों की कोई बात नहीं होती। और फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि हम कश्मीर के लोगों को दिल से जोड़ने की बात कर रहे हैं या उनकी छाती पर पैर रखकर उन्हें रौंदने की।

श्रद्धेय उपेन्द्र जी इस पूरी बहस से निकल कर कुछ बातें सामने आती हैं । लेकिन उसके पहले मैं कुछ कहना चाहूंगा । सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून उन्हीं क्षेत्रों में लगाये जाते हैं जहां हालात सामान्य नहीं होते या जहां आतंकवाद बुरी तरह हावी होता है । इस बात को तो आप भी मानेंगे । सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून एक विशेष कानून है जिसमें सशस्त्र बलों को विशेष शक्ति दी जाती है जो कि वहां के हालातों को देखते हुये उचित होगा अन्यथा फिर आर्मी या पैरामिलेट्री फोर्स की वहां तैनाती बेमानी हो जायेगी । अब सेना या अर्धसेना का नजरिया दूसरा होता है और वह होना भी चाहिये क्योंकि जहां युद्ध जैसी स्थितियां होती हैं वहां पर गुप्तचरी भी बड़े पैमाने पर होती है । सुरक्षा में जरा सी चूक इंसानी जान माल को ले डूबती है । कुल मिलाकर हालात को देखते हुये कड़े कानूनों की जरूरत पड़ती है । भारत जैसे दुनिया के सर्वाधिक शांतिप्रिय देश में ऐसे कानून बनाने पड़ते हैं तो समझिये कि यह देश की अखण्डता, एकता और सम्प्रभुता के लिये नितांत जरूरी होता है । जहां पर कड़ाई होती है वहां मनावाधिकारों का उल्लंघन भी होता है यह कोई नई बात नहीं है । लेकिन उपेन्द्र जी सर्जन अगर यह देखेगा कि सर्जरी से खून निकलता है या गैंगरीन से वह छोटा सा अंग सड़ रहा है और अगर जल्द सर्जरी नहीं की गयी तो पूरे शरीर में जहर फैल जायेगा तो क्या वह कुछ मिली0 खून के लिये पूरे शरीर को दांव पर लगा दे । सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून सर्जरी के प्रयोग में आने वाला नश्तर है । सर्जरी होगी तो कुछ खून बहेगा ही लेकिन फिर जहर पूरे शरीर में नहीं फैलेगा । अब देखिये नक्सलियों की सर्जरी अगर तीन दशक पहले ही हो गयी होती तो वह आज कैंसर का रूप धारण नहीं किये होते और न ही आज बेकसूर आदिवासी भी उनकी चपेट आये होते ।

अब चलिये कश्मीर की तरफ । मैंने ऊपर पहले ही कहा है कि कश्मरी का मतलब सिर्फ घाटी नहीं है बल्कि जम्मू और लद्दाख का इलाका भी है । कश्मीरियत की अगर बात होगी तो उसमें सिर्फ घाटी के मुसलमान ही नहीं जम्मू के हिंदू और सिख और लद्दाख के बौद्ध भी आयेंगे । सन 1948 के युद्ध के बाद और नेहरू के यूएनओ जाने के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर की आबादी में परिवर्तन के लिये क्या गुल खिलाए हैं ये किसी से नहीं छिपा है । कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है । कश्मीर का इतिहास सिर्फ 1947 से नहीं शुरू होता है । कल्हड़ की राजतरंगिनी उठा कर देखिये । कश्मीर का इतिहास उन्होंने कश्मीर में योगेश्वर श्री कृष्ण के आगमन से शुरू किया है ।

आज सिर्फ घाटी के चंद पाकिस्तान परस्त लोग ही अलगाववाद और स्वतंत्रता की बात करते हैं । जम्मू और लद्दाख बिल्कुल शांत है । फिर दो साल पहले तक तो कश्मीर शांत था । कश्मीर मे आम चुनाव हुये और 60 प्रतिशत वोटिंग हुयी थी । भारत सरकार ने इधर सेना भी हटा ली । कश्मीर पूरी तरह से शांत था । लेकिन उमर अब्दुला के अनुभवहीन होने का फायदा आज अलगाववादी और पाकिस्तान उठा रहा है । इसके अलावा भारत का मुंबई हमले के लिये पाकिस्तान पर दबाव बढाना और विकीलीक्स रिपोर्ट के तहत पाक सरकार और आर्मी के अलकायदा और अंतराष्ट्रीय आतंकवाद की खेती करने के खुलासे से पाकिस्तान  बौखला गया और उसने घाटी में अपने भाड़े के टट्टूओं को बढ़ावा दे दिया ।

घाटी में अलगाववादी पाकिस्तान का झंडा फहरा रहे हैं । सशस्त्रबलों पर पत्थर फेंक रहे हैं । गोलियां चला रहे हैं । वह वे लोग नहीं है जिन्होंने अभी चुनाव में वोट दिये थे और शांति में विश्वास करते हैं । मैं जोर दे कर कहूंगा कि युद्ध के नियम दूसरे होते हैं और जब देश की अखण्डता की बात आयेगी तब मानवाधिकार ताक पर रख दिये जाते हैं । जिन्हें अलग देश चाहिये उनके लिये ही सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून है । अब आप अब भी अलगाववादियों के मानवाधिकारों की इतनी ही पैरवी करेंगे तो यह मानने मे कोई संकोच नहीं होगा कि आप सर्जरी में बहने वाले खून को देख कर या तो डर गये हैं या फिर आप कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग नहीं मानते । दुनिया का एक हजार साल का इतिहास उठा कर देख लीजिये किसी भी शक्शिाली राष्ट्र ने अपनी सम्प्रभुता और अखण्डता के लिये बहुत कुछ किया है, भारत तो बहुत ही दयालु देश है । सी आई ए, के जी बी, एम आई 6, मोसाद, आई एस आई ऐसे लोगों को कच्चा चबा जाती है । यह भारत है जहां इन खटमलों से मिलने के लिये नेता इनके घर चिरौरी करने जाते हैं जब कि इन खटमलों का शांति से कोई सरोकार नहीं है । और हो भी क्यों । ये पाकिस्तान के भाड़े के टट्टू हैं । अगर ये अलगाववादी किसी और देश में होते या इंदिरा जी ही होती तो अब तक इनके शरीर किसी कब्र में होते और रूहें कयामत का इंतजार कर रही होतीं ।

मैं जागरण जंक्शन के सभी ब्लागरों और पाठकों से यह अनुरोध करना चाहूंगा कि वे सभी मेरे साथ दृढ़ता से कहें कि ”कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और हम कश्मीर को भारत से कभी अलग नहीं होने देंगे । मुट्ठीभर अलगाववादियों हम भारत के सवा अरब लोग तुम्हारे खिलाफ खड़े हैं ।“ जय हिंद ।



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mogodgvxxvu के द्वारा
May 23, 2011

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kkdmfyhu के द्वारा
May 22, 2011

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Kailyn के द्वारा
May 21, 2011

I bow down humbly in the presence of such gretnaess.

Coolbaby के द्वारा
October 28, 2010

Mishra Ji I respect you dear………..But why you get angry on me? I have never said “kashmeer is not the part of Indian nation” I objected that if we accept kashmeer as the part of India we must accept kashmeeries are Indians…I explained it in”I sure If Kashmeer is ours the inhabitants of Kashmeer are also ours” what wrong I have said ? I objected that we should not use to abusing on kashmeeries. I suggested to use lovely voice against our indian brother if we really want to bring them on right path. these premises have conclusion to matter of kashmeer for kashmeeries…..because they entire of them don’t want to be separated…… We have no power to solve this on our way so what it gains any advantage to abuse them. Lets see this matter how it goes? One Last thing “Mujhe hindi bahut acchi tarah se aati hai per yahan typing me problem hoti hai isliye main english me likhta hun …….shayad aap muaaf karenge” blessings

    K M MIshra के द्वारा
    October 30, 2010

    प्रिय कूलबेबी, क्योंकि तुम बेबी हो इसलिये आशीर्वाद । कृपया पूरा लेख पढें । शायद आप पढ़ भी चुके हैं । मैंन कब कहा कि कश्मीरी हमारे भाई नहीं हैं । मैंने सिर्फ इतना कहा कि कश्मीर समस्या को अगर नेहरू के चश्मे से देखेंगे तो रहा सहा कश्मीर भी गवां देंगे और अगर लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई के नजरिये से देखेंगे तो पीओके और चीन द्वारा कब्जाया भाग भी वापस ले लेंगे । . कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है । कश्मीरियों के लिये पूरा भारत खुला है लेकिन भारतवासियों के लिये कश्मीर नहीं खुला है । यह कौन सी समानता हुयी । आपको शायद मालूम नहीं होगा कि बंटवारे के बाद जो हिंदू जम्मू कश्मीर में आकर बसे उन्हें जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनावों में वोट डालने की आजादी नहीं है । वे सिर्फ लोकसभा के चुनावों में ही अपन मतदान कर सकते हैं । जो अनु0 370 खुद संविधान के तमाम मूलअधिकारों के ही खिलाफ हो वह अपने आप असंवैधानिक हो जाती है । क्योंकि हम कश्मीर को नेहरू के नजरिये से देखते हैं इसलिये यह सब दिखायी नहीं पड़ता है । . यह तो आपभी मानते होंगे कि अलगाववादियों को पाकिस्तान सरकार का समर्थन हासिल है और वे भारत सरकार के खिलाफ एक युद्ध लड़ रहे हैं और कश्मीर को भारत से अलग करने की मांग कर रहे हैं । अब आप ही बताईये कि सन 47 और 99 में भेष बदल कर कश्मीर पर हमला करने वालों और इन अलगाववादियों में क्या अंतर है । . प्रिय कूलबेबी मैं तुमसे गुस्सा हूं नहीं हूं बल्कि तुमको यह बताना चाह रहा हूं कि जब कोयी चोर पकड़ा जाता है तो सबसे पहले घर का मालिक उसकी धुनाई करता है, फिर बाहर की पब्लिक फिर पुलिसवाले उसे थाने ले जाकर सूतते हैं । तुम्हारी भी यही हालत है प्यारे । तुम छद्म नाम से ऊल जलूल टिप्पणी करते हो । तुम कोयी ब्लागर नहीं हो । तुम हमारे लिये एक घुसपैठिये हो । तुम्हारी हालत उस चोर जैसी है । अगर तुम ब्लागर होते तो लोग तुम्हारे समर्थन में उतरते । क्योंकि तुम ब्लागर नहीं हो इसलिये अकेले हो । . इसीलिय निवेदन कर रहा हूं कि प्यारे बच्चे अपने असली नाम से एक ब्लाग बनाओ अपनी फोटू लगाओ और फिर अपनी बात रखो । फिर तुम्हारी तरफ से बहस करने वाले भी हो जायेंगे लेकिन अगर घुसपैठिये बने रहोगे तब तुम मुश्किल में पड़ जाओगे । . हिंदी टाईपिंग अगर समस्या है तो गूगल के तमाम साफ्टवेयर हैं जिनसे तुम रोमन में लिख कर हिंदी में लिख सकोगे । बहुत से साफ्टवेयर आफ लाईन भी काम करते हैं । मैं तुम्हारी ब्लाग बनाने मे मदद कर दूंगा । तुम्हारा के एम मिश्र

    Giggles के द्वारा
    May 22, 2011

    Hhaaahha. I’m not too bright today. Great post!

Coolbaby के द्वारा
October 24, 2010

Amazing ! Kashmeer is not your matter……..It is matter of those who stay in kashmeer.I read here your comments and alike you buddies,But It appears to be double standard in your mind,what have been done by Indira gandhi is right? then you have to accept Mahmood Ghaznavi as a Great Reformer because he united India at time the various kings here fighting for their own throne……..Ha Ha Ha Ha …….Any thing can be more amusing ? When I look your language and people alike you,you all seem to using offensive dialogues……..It reflects you all are not interested in the final results ….you all are here to abusing and fighting one another… I sure If Kashmeer is ours the inhabitants of Kashmeer are also ours…….Do You Not?

    K M MIshra के द्वारा
    October 25, 2010

    “Kashmeer is not your matter……..It is matter of those who stay in kashmeer” According to you Mr. Coolbaby Mrs. Arundhati Rai, Members of khalistan Liberation force, Separatist of Noth East and Maoist who were recently present in Seminar with Sayyed Ali Shah Gilani in New Delhi were Kashmiri. Don’t speak the language of Separatist, it will indicate your sedition toward the Union of India. Jai Hind.

    Coolbaby के द्वारा
    October 25, 2010

    According to you Mr. Coolbaby Mrs. Arundhati Rai, Members of khalistan Liberation force, Separatist of Noth East and Maoist who were recently present in Seminar with Sayyed Ali Shah Gilani in New Delhi were Kashmiri. What a misunderstanding?is there More? I have spoken out of many things……….they enough to be replyed. Are you have same opinion regarding Kashmeeries what been expressed in last row? (I sure If Kashmeer is ours the inhabitants of Kashmeer are also ours)

    K M MIshra के द्वारा
    October 25, 2010

    (I sure If Kashmeer is ours the inhabitants of Kashmeer are also ours) प्यारे ठंडे बच्चे जी आपकी टिप्पणी का जवाब मैं एक लाईन में दे सकता हूं लेकिन वह आपको समझ में नहीं आयेगा । हिंदी आती हो (अगर हिंदुस्तानी होगे तो आती होगी पाकिस्तानी होगे तो कुछ सालों मे भारतीय सेना पहुंच कर तुम्हे सीखा देगी) तो पूरा लेख ध्यान से पढ़ो इसमें कहीं नहीं लिखा है कि कश्मीरी हमारे भाई बंधु नहीं हैं । 80 प्रतिशत कश्मीर तो जम्मू और लद्दाख मे बसता है । हां अलगाववादियों के मानवाधिकार का मैं कतई समर्थक नहीं हूं । उनका वहीं हश्र होना चाहिये जो इंदिरागांधी ने पंजाब में अलगाववादियों का किया था । आशा है कि समझ गये होगे । वैसे गजनवी तुम्हारा कौन लगता है इसकी भी जानकारी दे देना ।

    Coolbaby के द्वारा
    October 26, 2010

    80% kashmeer to jammu me basta hai……Ha Ha Ha What a argument ? sooner You will recieve award on this amazing argument……Not due to be well in argue but by containing in seven wonders. Gaznavi I never meet him …….Not my surname is gaznavi……You seem to be sure to meet him. Hindi is Good language But here some difficulties run to prevent me. and ofcourse I am an Indian. But I think Indian force has not its own proper knowledge of Hindi….Please Unke sath kuch Hindi professers ko zaroor pakistan bhej dena. Bless you God

    K M MIshra के द्वारा
    October 26, 2010

    बेटा ठंडे बच्चे आशीर्वाद, तुम्हारी टिप्पणी से पता चल गया कि तुम को हिन्दी कितनी आती है । तुमतो बचवा हिन्दी ठीक से पढ़ भी नहीं सकते हो । 80% kashmeer to jammu me basta hai……Ha Ha Ha पूरा पढ़ा करो तुम्हारे लिये प्राईमरी की पाठशाला मैंने नहीं खोल रखी है । \"80 प्रतिशत कश्मीर तो जम्मू और लद्दाख मे बसता है\" . रहा भारतीय फौज का सवाल तो उन्हें जितनी हिंदी आती है उतनी पाकिस्तान को सीखाने के लिये बहुत है क्योंकि उसको भारत सरकार के मुंबई हमलों के डोसियर समझ में नहीं आ रहे हैं इससे साफ पता चलता है कि उनकी समझ और तुम्हारी समझ में काफी समानता है । . और मुन्ना थोड़ा बड़े बन जाओ । अपना ब्लाग बनाओ और दिमाग में कुछ पाजिटिव है तो लिख डालो । इस तरह चोरों की तरह छद्म नाम से टिप्पणियां करोगे तो मुश्किल में पड़ जाओगे ।

    y.dubey के द्वारा
    October 26, 2010

    आदरणीय मिश्र जी , आप का यह कथन की यह गिलानी और अरुंधती के संसर्ग की उपज है सर्वथा उपयुक्त लगता है,क्योकि भारत के इतिहास में वर्णित सभी जातियों और उपजातियो में इसके नाम की तरह की कोई भी जाती नहीं पाई जाती है ,एक बात में मै आपसे असहमत हूँ की आप इस तरह के जीवो को ब्लॉग लिखने के लिए आमंत्रित कैसे कर सकते है जिसका की एक कमेन्ट भी सकारात्मक न रहा हो वो ब्लॉग लिख कर कितना गन्दा करेगा इस मंच को मै सोच कर भी परेशां हो जाता हूँ,ऐसे लोग ही विचारो की स्वतंत्रता के नाम पर विष फैलाते है.

kmmishra के द्वारा
October 8, 2010

राहुल बाबा के जिगरी उमर अब्दुल्ला इस उमर में लौंडहाई से बाज नहीं आ रहे हैं । उनका ताजा बयान है कि कश्मीर का भारत में अधूरा विलय हुआ था । राहुल बाबा की संगत का असर तो पड़ना ही था । न इनको भारत के इतिहास का ज्ञान है और न उनको । कश्मीर का मुख्यमंत्री एक ऐयाश नेता का ऐयाश पुत्र है । इनको इतना भी ज्ञान नहीं है कि अगर भारतीय सेना कश्मीर में न होती तो ये पिता पुत्र रावलपिंडी या मुल्तान की किसी सैनिक जेल की शोभा बढ़ा रहे होते । मित्रों, देश युवराजों के चक्कर में फंसता जा रहा है । पुराने लंपट जमींदारों के अघाये हुये युवराजों की फौज आज कल सत्ता के गलियारों में घूम रही है । नजरें उठा कर देखिये । चोर का बेटा चोर, भिखारी का बेटा भिखारी, सेठ का बेटा सेठ, आई ए एस का बेटा आई ए एस, डाक्टर का बेटा डाक्टर, विधायक का बेटा विधायक, मंत्री का बेटा मंत्री, सीएम का बेटा सीएम और पीएम का बेटा पीएम बन रहा है । बिहार चुनाव में टिकट भी वंशवाद के आधार पर बांटे गये हैं । संविधान में लोकतंत्र की जो परिभाषा दी गयी है वह सिर्फ चुनाव की डेट घोषित होने से चुनाव के नतीजे घोषित होने तक ही फलीभूत होती है । उसके बाद भारत में फिर वही सामंतयुग प्रभावी हो जाता है । अगर यकीं न आये तो वर्तमान स्थिति और 100 साल पहले की स्थिति दोनो की तुलना करके देख लीजिये । आम आदमी पहले की तरह ही मंहगाई, गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी से त्रस्त है । कभी किसी अफसर से, पुलिस वाले से, मंत्री से वर्तमान में पाला पड़े तो पहले की जमीदारी व्यवस्था आंखों के सामने घूम जायेगी । थाने और कचहरी का चक्कर अगर शुरू हुआ तो आपका भगवान ही मालिक है । अब आप कहेंगे कि क्या किया जा सकता है । बहुत आसान काम है । बंदूक उठा कर किसी लाम पर नहीं जाना है । वही तरीका अपनाईये जो गांधी जी ने अपनाया था । शांति पूर्वक विरोध करिये । अपनी बात कहने से झिझकिये नहीं । जो गलत है उसकी शिकायत करिये । संपादक के नाम पत्र, आर टी आई, ब्लाग पर अपनी आवाज बुलंद कीजिये और जो सो रहे हैं और सोचते हैं कि देश ऐसा ही चलने दो उनको जगाईये । धीरे धीरे माहौल बदलने लगेगा । जय हिंद ।

kmmishra के द्वारा
October 7, 2010

प्रिय अमित जी वंदेमातरम ! आपने बहुत सही कहा है कि पाकिस्तान भारत का अभिन्न अंग है । अभी हाल में मियां मुशर्रफ ने कश्मीर में आतंकवादी शह को अपना जन्मसिद्ध अधिकार माना है । नपुंसक भारत सरकार अपनी फटी धोती दुनिया को दिखा कर रो रही है कि पड़ोस के लौंडे आकर छेड़ जाते हैं । इजराईल से सबक लें और अमेरिका के काम में हाथ बंटायें । वह ड्रोन हमले कर रहा है पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में अलकायदा पर ये पाक अधिकृत कश्मीर में मिसाईल हमले करें लश्कर के कैंप पर । टिप्पणी के लिये आभार ।

Amit kr Gupta के द्वारा
October 7, 2010

मिश्रा जी ,पाकिस्तान भारत का अभिन्न अंग हैं. पाकिस्तान की कुछ नापाक इरादों के कारण आज कश्मीर की स्थिति ऐसी हैं . बेहतरीन लेख. http://www.amitkrgupta.jagranjunction.com

Munna के द्वारा
September 30, 2010

adarniya upendra ji Dhanya hai aap aur apakey vichar lagata hai aap bhi kishi neta key rishateydar hai. haram jadey netao ney tto ankho per chatukaritta ki patti bhandh rakhi hai. kuch sawal aapsey karata hu 1 kashmir mai bahumat ki bat hoti hai tto kashmire pandito key basaney ki bat kyo nahi hoti 2 gujrat dango ki bat hoti hai tto godhara ki bat kyo nahi hoti 3 mahamahim uchatam nyalaya ki mahima ki bat hoti hai tto sahbanoo ki bat kyo nahi hoti 4 sansad bhawan mai muslim MP MUSLIM hitto ki bat hoti hai tto tali bajati hai hindu MP hindu ki bat karata hai tto sampradaik ho jata hai 5 gat varsh tto chatukarita ki had ho gai rajeev gandhi puruskar muslim ko gyanpeeth puruskar muslim ko, CWG mai theem song bananey ka theka muslim ko kya karogey aap app ek avadan patra pakistan sarkar ko bhej do apani pakistani nagrikta key liye yaar ye nahi kar sakatey tto aligarh,agra barelly mai koi makan muslim ilakey mai kharid lo tto apaka bhi bhoot utar jayega aur rastra hit ki bat karogey yaa bhi ye ulti shidhi batey likhana band karo

    K M Mishra के द्वारा
    October 1, 2010

    मुन्ना जी वंदेमातरम ! आपके सवालों का जवाब न भ्रष्ट नेताओं के पास है और न ही जयचंद इतिहासकारों की फौज के पास । जबकि इस तरह के सवाल नहरू के जमाने से कांग्रेस से पूछे जा रहे हैं और इसके उत्तर में वे चुप रहना ही बेहतर समझते हैं ।

    Munna के द्वारा
    October 1, 2010

    Mishara ji Pranam Apko mai sahradaya dhanyawad deta hu ki apaney reply blog pada aur ahasas kiya ki bharat mata ke ye kapoot neta iis desh ko kish rastey paer ley ja rahey hai. Apaney pada hoga aur suna bhi hoga ki iin alagavawadi ki bajah sey teen mahiney kasmireer ashant raha. unn patharwajo ke liye ye sarkar 100 karor rupey bhej rahi hai lekin ankhon mai patti bandhey netao ko ye samajha mai nahi aata ki iin patharwajo aur algavawadi ki bajah sey jo hamarey sapoot sipahi marey gaey hai unkey ley 1 caror bhi nikal sakey kasmeer ki ek hi problem hai dhara 370( BACHCHEY KO 24 GHANTEY GOUD MAI LIYE RAHOGEY TTO HAMAREY UPER HI SUSU KAREGA) dhara 370 hataney ke liye jan jagrati ki jaroorat hai nahi tto desh hamarey apakey jaisey bhaiiyo ki kamai ye neta in patharwajo par hi udatey rahegey

Ramesh bajpai के द्वारा
September 30, 2010

प्रिय श्री मिश्रा जी मेरा आपसे यह अनुरोध मात्र है यदि थोड़ी सी चर्चा कश्मीर के इतिहास की भी हो जाय तो वर्तमान को समझने में आसानी होगी

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 30, 2010

    मिश्रा जी महाराजा रंजित सिंह ने भी कश्मीर पर राज्य किया था क्या ?

    K M Mishra के द्वारा
    September 30, 2010

    बाजपेई जी आपने बहुत सही कहा । कश्मीर के इतिहास से आम भारतीय परिचित नहीं है । इसके पीछे भी सरकार की नीतियां ही काम कर रही हैं । वो चाहते हैं कि आम भारतीय कश्मीर को विवादित भाग मान कर शांति के लिये कश्मीर भूल जाये । कश्मीर का इतिहास बहुत लंबा है । कल्हड़ ने अपने विशाल ग्रंथ राजतरंगिणी मे कश्मीर के इतिहास को बहुत ही विस्तार से लिखा है । वो कश्मीर का इतिहास द्वापर युग से शुरू करते हैं जब कृष्ण ने कश्मीर आकर यहां अपने भक्त को राज्य स्थापित करने में मदद की थी । जिन नेहरू की बचकाना नीतियों ने कश्मीर को आज नासूर बना दिया है उनके जीजा और विजय लक्ष्मी पंडित के विद्वान पति स्व0 रणजीत पंडित ने ही सबसे पहले राजतरंगिणी का अंग्रेजी में अनुवाद किया था (वह एक बड़ा मजेदार किस्सा है) फिर उसके हिंदी और दूसरी भाषा में अनुवाद हुये । बड़ी जल्दी ही कश्मीर का लंबा इतिहास आप सभी को पढ़ने को मिलेगा ।

    K M Mishra के द्वारा
    September 30, 2010

    बाजपेई जी आपने रणजीत सिंह जी का अच्छा उल्लेख किया । एक वक्त महान सिख राजा रणजीत सिंह का राज्य अफगानिस्तान के कुछ क्षेत्रों से लेकर पाकिस्तान के काफी हिस्सों और पूरे पंजाब पर था । कश्मीर भी उन्होंने जीत लिया था । फिर कश्मीर में उन्होंने अपना एक शासक बैठाया और डोगरा राजवंश की स्थापना की जिसके अंतिम राजा हरि सिंह थे । जिन्होंने 1948 में पाकिस्तान के आक्रमण के पश्चात विलयपत्र पर हस्ताक्षर किये थे ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    October 1, 2010

    धन्य वाद मिश्रा जी चलिए इसी बहाने मेरा ज्ञान पुष्ट हुवा . पर मेरे प्रश्नों की सिल सिला ख़त्म नहीं हुआ .भारत के विभाजन से पूर्व अफगानिस्तान व वर्मा क्या हमसे जुड़ा था मतलब हमारी सीमा में ये दोनों देश शामिलथे [ यह थोडा अलग प्रश्न है पर में आ गया तो जिक्र कर दिया ]साइंस पढ़ कर आदमी उसी का हो जाता है

    आर.एन. शाही के द्वारा
    October 2, 2010

    बाजपेयी सर आपने जो जिज्ञासा प्रकट की है वह सर्वविदित है । मुझे इतिहास की कोई विशेष जानकारी तो नहीं है, परन्तु जहां तक बर्मा (म्यांमार) की बात है, वह तो अंग्रेज़ी हुकूमत के समय भारत का ही हिस्सा था, जिसके बंटवारे की व्यवस्था अंग्रेज़ों ने अपने शासन काल में ही कर दिया था । अफ़गानिस्तान की जहां तक बात है तो खुद मिश्रा जी ने स्पष्ट किया है कि महाराजा रणजीत सिंह का राज्य अफ़गानिस्तान तक फ़ैला हुआ था । महाभारत काल में धृतराष्ट्र की ससुराल भी अफ़गानिस्तान के गांधार में हुआ करती थी, जो आज कंधार के नाम से जाना जाता है । यह सभी क्षेत्र वृहत्तर भारतखंड की भूमि का ही हिस्सा थे ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    October 2, 2010

    बहुत बहुत धन्यवाद श्री शाही जी . .एक बात जो मै समझ रहा हु वस् यह की कश्मीर के बारे में चर्चा अभी होनी चाहिए .बहुत तथ्य सामने आयेगे . समय मिले तो जबाब दे दीजिये गा

    आर.एन. शाही के द्वारा
    October 2, 2010

    सर कश्मीर पर तो चर्चा तब तक चलेगी ही, जब तक कश्मीर का विवाद समाप्त नहीं हो जाता । इसमें कहां कोई संदेह है?

ravindrakkapoor के द्वारा
September 28, 2010

प्रिय मिश्राजी, आपको इस ज्वलंत समस्या पर जन मानस का ध्यान खीचने के लिया साधुवाद. छमा चाहता हूँ कि कमेंट्स लिखते समय यह पंक्तिया रह गई. सुभकामनाओ के साथ – रवीन्द्र के कपूर

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    रविंद्र जी कश्मीर मामले में बहुत सी बातें अभी अनकहीं हैं । कश्मीर का इतिहास, कश्मीर के गद्दार और आतंकियों के मानवाधिकार बनाम देश की अखण्डता, सम्प्रभुता । इन सब विषयों पर भी जल्द ही विचार रखूंगा । फिलहाल कश्मीर पर नरेश जी का नया लेख पढें जग बौराना में । आशा है आपको पसंद आयेगा । जय हिंद ।

ravindrakkapoor के द्वारा
September 28, 2010

कश्मीर मेरे देश का ऐसा एक ऐसा स्वर्ग है कि सारी दुनिया उसके भूभाग पर अपना प्रभाव देखने के लिए उतावली है . मेरे विचार से सबसे पहले भारत को सारी दुनिया को बतला देना चाहिए कि पाकिस्तान से कोई भी बात हम तभी करेगे जब वो भारत को धोका देकर कश्मीर का जो विशाल भूभाग को दबाये बैठा है पहले उसे खाली करे. पूरा विश्व जनता है और अगर नहीं जानता तो भारत का भारत के हर उस व्यक्ति का यह पहला दायुत्य बनता है कि वो हर संभव माध्यम (लेखनी , कला, हिंदी, अंग्रेजी साहित्य, कविता, कहानी, नाटकों, लेख, आदि ) के माध्यम से पूरी दुनिया को बिना और समय खोये यह बतलाना शुरू करे कि कैसे झूठ का सहारा ले पाकिस्तान ने एक भूभाग को दबा रखा है और उसी भूभाग पर पूरी दुनिया के विनाश कि फसल पर फसल पिछले साठ सालों से बो रहा है. अगर विश्व ने इसे पहचानने मे और देर कि तो एक दिन यह फैलती आग उस देश को भी निगल लेगी जो इसे हवा दे रहे है. रवीन्द्र के कपूर

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    रवीन्द्र जी वंदेमातरम ! कश्मीर मुद्दे पर आप राष्ट्र के साथ खड़े हुये इसके लिये आपका आभारी हूं ।

vijendrasingh के द्वारा
September 27, 2010

मिश्रा जी किन शब्दों में कहूँ की जो कुछ आपने अपने लेख में लिखा है वो मेरी आत्मा की आवाज़ भी है ऐसा लगता है जैसे हर हिन्दुस्तानी जो भारत माता से प्यार करता है आपके शब्द उनके दिल की आवाज़ है बहुत सुंदर लेख …………मैंने भी कुछ लिखा था कश्मीर पर ……http://vijendrasingh.jagranjunction.com

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    विजेन्द्र जी वंदेमातरम ! कश्मीर मुद्दे पर आप राष्ट्र के साथ खड़े हुये इसके लिये आपका आभारी हूं ।

ekta के द्वारा
September 25, 2010

ये सोच समझ से परे है की की कश्मीर की बात पर हम क्यों कुछ पाकिस्तान परस्त अलगावादी नेताओ से दोस्ती के लिए हाथ बढ़ाते है जिन नेताओ को जेल क अन्दर होना चाहिए उन् से दोस्ती करना न सिर्फ गलत है यह आत्मघाती भी है आज उन चंद देशद्रोहियों की वजह से कश्मीर अवाम गुमराह हो रही है कश्मीर की तरक्की रुकी है कस्मीयत की बात करने वाले ये चंद नेता कश्मीर क नाम पर अपनी राजनितिक रोटिया सेक रहे है यह कहने की जरूरत नहीं है की कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है क्योकि यह सदियों से भारत का अंग रहा है और सदियों तक रहेगा जिस भूमि को हमारे सहिदो ने अपनी खून से सीचा है उसे हमसे कोई अलग नहीं कर सकता अगर कभी जरूरत होगी तो देश का हर एक नागरिक इसके लिए कुर्बान हो जाने को तैयार होगा अलगाववादी नेता साप की तरह है जिनके फण को कुचल कर ही उनसे मुक्ति पाई जा सकती है देश में रह कर पाकिस्तान का झंडा लहराने वालो को इस देश में कोई जगह नहीं होनी चाहिए आज जरूरत है कश्मीर की ३७० जैसे कानून को हटाने की जिससे वहा का बहुलवादी जन्सयंकी ढाचा बना रहे …. यह कश्मीर के भविष्य को चढ़ जेहादी तत्वों से बचा सकता है

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    एक्ता जी वंदेमातरम ! कश्मीर मुद्दे पर आप राष्ट्र के साथ खड़े हुये इसके लिये आपका आभारी हूं ।

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
September 25, 2010

मिश्रा जी, बहुत ही गर्म मुदद उठाया है बहुत बहुत धन्‍यवाद। -दीपक जोशी

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    जोशी जी वंदेमातरम ! कश्मीर मुद्दे पर आप राष्ट्र के साथ खड़े हुये इसके लिये आपका आभारी हूं ।

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
September 25, 2010

प्रिय के एम मिश्रा जी, मैने वादी एवं प्रतिवदियों को पढ़ा, मेरी सोच जरा हट कर है। सारे फसाद की जड़ यदि है तो यह राजनेता लोग है, जो अपनी कुर्सी के लिए देश को बेचने के लिए भी तैयार है। कशमीर में 370 की अगुवाई मेरी जानकारी के हिसाब से श्री नेहरू जी ने की थी (क्‍योंकि वह एक कशमीरी थे) और उसे आगे तक जारी रखा माननीय श्रीमती इंदिरा जी ने। उस समय उन की सोच कुछ और रही होगी, क्‍योंकि वह अपने कश्‍मीरी जनता से वोट की खातिर उन में सम्मिलित हो गये कि यहां बाहर के प्रदेश का कोई भी नागरिक आकर नही बस सकेगा। और वही हुआ 370 काशमीर पर लागू रहा और कांग्रेस पुरी मैजोरिटि से सत्‍ता पर काबिज रही। एक दुसरा उदाहरण देना चाहुंगा – पंजाब को जलाने में भी माननीय श्रीमती इंदिरा जी का ही हाथ था। भिडंरवाला को पहले उन्‍होंने ही पनह दी और उस के साथ कई मंचों पर उन की साथ-साथ के फोटों मेंगजिनों में हम ने भी देखे थे (इंडिया टुडे में) और जब ऑग ज्‍यादा लग गई तो आपरेशन ब्‍लूस्‍टार करना पड़ा और उस का खमियाजा स्‍वयं उन्‍हें अपने खुन से देना पड़ा। आप यदि गौर करें तो देखें आज आप कितने भी साक्षय विश्‍व एवं अमेरीका के सामने रखें कि मुंबई में एवं भारत के अन्‍य प्रदेशों में आतंकवादी गतिविधीयों का संचालक पाकिस्‍तान है। और अमेरीका उसे मानते हुए भी आज पाकिस्‍तान को हर तरह से पैसों कि मदद कर रहा है चाहे वह सैन्‍य विस्‍तार हो या और किसी नाम से। शायद आप लोग जानते होंगे अमेरिका में युद्व सामग्री, अस्‍त्र-शस्‍त्र, गोला बारूद एवं मिजाईल तक बनाने का काम प्राईवेट कंपनीयां करती है। और उन के मालिकों का अमेरीकी सरकार पर दबाव रहता है कि वह ऐसी योजना न बनाए जिस से ऐशीयाई देशों मे शांति हो सके और उन की फैक्‍टरीयों में बने माल की खपत न हो। भारतीय सरकार यदि कशमीर पर कुछ करने जाती है तो वह मानवाधीकार की अवहेलना है और अफगानिस्‍तान में ड्रॉन से हमले करवा कर भी अमेरीका सर्वोपरी माना जाता है। आज 370 की जड़े इतनी पैवस्‍त हो गई है कि अब इसे उखाड पाना किसी के बस की बात नहीं है। आज यदि कोई भी सख्‍त कदम उठा कर यदि हम काश्‍मीर में शान्ति लाना चाहेंगे तो पहले तो कहीं न कहीं भारतीय राजनिति आड़े आएगी। फिर मानवाधीकार की अवहेना का मुददा सर उठाऐगा। पर कड़वा सत्‍य यही है कि बिना अर्मि को दि गई स्‍वंत्रता के हम इन दमनकारी ताकतों को दबा नही पाएंगे और यह हडडी हमारे गले में अटकी ही रहेगी। – दीपक जोशी

    K M Mishra के द्वारा
    September 25, 2010

    जोशी जी वंदेमातरम ! आपने 370 और भिंडरवाला से संबन्धित जो बाते कहीं वो बिल्कुल सही हैं । 370 की विषबेल बोने वाले नहेरू ही थे और इंदिरागांधी ने ही भिंडरवाला को अपने राजनीतिक लाभ के लिये खड़ा किया था मगर जब भिंडरवाला पाकिस्तान और आई एस आई के हाथों की कठपुतली बन गया और भारत से अलग खालिस्तान देश की मांग करने लगा तब इंदिराजी ने सख्ती से उसका और पंजाब मंे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का सिर कुचल दिया । आपका यह भी कहना सही है कि आज पाकिस्तान और अगानिस्तान में आतंकियों के साथ मासूमों की भी जाने जा रही हैं । देख कर वाकई में दुख होता है कि अपने राजनीतिक लाभ के लिये सरकारें हजारों साल से मासूमों के खून से होली खेलती आयी हैं । मासूम सिविलियन गेंहू में घुन की तरह पिसता रहा और उसकी सुनवाई भी नहीं होती है । मगर भारत में हालात बहुत बेहतर हैं । आज जो कुछ भी कश्मीर या नक्सली प्रभावी क्षेत्रो में हो रहा है वह केन्द्र की आत्मघाती नीतियों का ही कारण है । सांप पालने ही नहीं चाहिये । सांप को दूध पिलाने से और देशविरोधी सिद्धांतों की बात करने वालों को बहुत पहले ही कुचल देना चाहिये । आगे चल कर इनमें से कोई जिन्ना की तरह डाईरेक्ट ऐक्शन की बात करने लगेगा तब सरकार के हाथ पांव फूल जायेंगे और अंतर्राष्ट्रीय दबाव जो बनेगा उसके सामने घुटने टेक देंगे । नक्सली आंदोलन को हवा देने वाले ये कम्युनिस्ट हैं । आज माओवादी इनके ही नेताओं को गोलियों से छलनी कर रहे तब भी इनकी आंखे नहीं खुली हैं । ममता बनर्जी और कांग्रेस भी आज बंगाल के चुनाव में वोटबैंक की खातिर दांव खेलने लगे हैं । जोशी जी हम भारतीय स्वाभाव से दयालु और सहिष्णु होते हैं । हम दूसरों की पीड़ा देखकर अपनी पीड़ा भूल जाते हैं । निसंदेह राजनैतिक कारणों से मासूमों का खून बहता है मगर कश्मीर में अगर भारतीय सेना न होती तो उसके हालात पाक अधिकृत कश्मीर के ही समान नारकीय होते । इसके लिये अलावा पाकिस्तान और चीन को दान करने के पश्चात जितना कश्मीर हमारे पास शेष बचता है वह उसमें से 80 प्रतिशत इलाका जम्मू और लद्दाख का हिंदू बाहुल्य इलाक है । मात्र 20 प्रतिशत घाटी के 1 प्रतिशत पाक परस्त अलगाववादियों की परवाह करके केन्द्र सरकार भारत का पक्ष कमजोर कर रही है । इन अलगाववादियों में इतना भी बूता नहीं है कि वह चुनाव में खड़े होकर कश्मीरी जनता से उनका समर्थन हासिल कर सकें । इन भाड़े के टट्टूओं को पाकिस्तान से पेंशन मिलती है । इनको सुन कर हम अपना नुकसान कर रहे हैं । फिर येे तो बात करने के लिये ही तैयार नहीं हैं । जरूरत है सख्त कदम की । इन मरे हुये गंधाती लाशों को कश्मीर से निकाल फैंक दें तो कश्मीर की आबो हवा अपने आप खुशगवार हो जायेगी । आपकी टिप्प्णी से इस सार्थक बहस को एक नया आयाम मिला है । बहुत बहुत धन्यवाद । जय हिंद ।

Ramesh bajpai के द्वारा
September 25, 2010

rameshbajpai के द्वारा September 17, 2010 “ठीक इसी तरह कश्मीर में हमने कुछ पैकेज घोषित करके उसे उसके हाल पर छोड़ने के अलावा कुछ नहीं किया। इससे ” उपेन्द्र जी मै आपकी बात से बिलकुल सहमत नहीं हु . चुकी आप खुद पत्रकारिता मै है और मै साधारण रचना कार . तर्क आप के साथ हो जायगे. बात सिर्फ कश्मीर की आवाम की नहीं है .उसके साथ भारत की अस्मिता का भी जुडाव है . धरा ३७० क्या है . जेहाद का जहर भरने वाले लोग आप क्या समझाते है इतनी आसानी से मान जायेगे .

    upendraswami के द्वारा
    September 25, 2010

    लेकिन रमेश जी, न्यायपालिका कमजोर है तो इसका मतलब यह नहीं कि निर्दोर्षों की जान ले ली जाए। हम यहां किसी दरिंदे की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि आम जनता के सामने खड़ी सेना की बात कर रहे हैं।

Pramendra Pratap Singh के द्वारा
September 25, 2010

aaj puri tarah se bharat ko bechne ki taiyari chal rahi hai, central government ko kashmir ki koi chinta hi nahi hai vah to sirf muslimo ki chinta karne me lagi hui hai. ki kis prakar muslimo k jyada se jyada vote hasil kiye ja sakte hai. vah din dur nahi ki jab sarkar vote k liye kashmir ko daan n de de.

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    प्रमेन्द्र जी वंदेमातरम ! कश्मीर मुद्दे पर आप राष्ट्र के साथ खड़े हुये इसके लिये आपका आभारी हूं ।

आर.एन. शाही के द्वारा
September 24, 2010

श्रद्धेय मिश्रा जी, प्रणाम! आज फ़िर उपेन्द्र जी की कल वाली बहस का उत्तर लिखकर आप के ब्लाँग पर आया और अपनी प्रतिक्रिया के जवाब में लिखी गई आपकी विस्तृत जानकारियों से भरी सामग्री पढ़कर इस पवित्र अभियान के सापेक्ष मुझे लग रहा है कि यहां आने वाले उत्कंठित पाठकों की सुविधा के मद्देनज़र उपेन्द्र जी से हुई बहस को ही यहां पेस्ट कर देना चाहिये, क्योंकि आपका लेख भी तो उस बहस के जवाब में ही लिखा गया है! आप और उपेन्द्र जी से क्षमा चाहते हुए, उस बहस को उस कड़ी के साथ, जिसे आपने अपने लेख में भी उद्धृत किया है, यहां नीचे पेस्ट कर रहा हूं । बहुत-बहुत धन्यवाद ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    September 24, 2010

    upendraswami के द्वारा September 21, 2010 मिश्रा जी, शाही जी, रमेश जी! मुझे लगता है कि कश्मीर को देखने का हमारा नजरिया बहुत सीमित व एकतरफा है- अनुच्छेद 370, कश्मीरी पंडित.. वगैरह, वगैरह। मिश्रा जी का कश्मीर के लोगों को कीड़े-मकोड़े, खटमल कहना दर्शाता है कि हम किस सोच के साथ इस चुनौती का सामना कर रहे हैं। क्या कश्मीर के सारे लोगों को ठिकाने लगाकर कश्मीर पर नियंत्रण बनाए रखने में हमें गर्व होगा या एक फलते-फूलते कश्मीर को साथ लेकर चलते हुए गमें गर्व होगा- जवाब तो इस सवाल का ढूंढना है। शाही जी का यह कहना भी गलत है कि इस मसले को अब उठाने में कोई निहितार्थ हैं। अगर आम लोगों को तसल्ली देना कोई निहितार्थ है, तो वह बेशक कभी भी हो सकता है। लेकिन मैंने अपनी मूल पोस्ट में लिखा था कि मणिपुर में इरोम शर्मिला तो दस साल से इस कानून के खिलाफ अनशन पर हैं। एएफएसपीए का विरोध तो काफी समय से हो रहा है, बस ज्यादती होती है तो गूंज ज्यादा सुनाई देने लगती है। इसी तरह अनुच्छेद 370 का इस्तेमाल भी सिर्फ राजनीतिक विरोध के लिए होता है। कश्मीर को विशेष अधिकार प्राप्त है तो उसका क्या नुकसान बाकी देश को हुआ, इसका किसी के पास कोई तर्क नहीं, इसके सिवाय कि अनुच्छेद 370 का फायदा उठाकर कश्मीर में आतंकी पनप रहे हैं। कश्मीर के भारत में विलय की स्थितियों व शर्तों की कोई बात नहीं होती। और फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि हम कश्मीर के लोगों को दिल से जोड़ने की बात कर रहे हैं या उनकी छाती पर पैर रखकर उन्हें रौंदने की।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    September 24, 2010

    आर.एन. शाही के द्वारा September 22, 2010 उपेन्द्र जी थोड़ी देर से देख पाया, इसके लिये खेद है । देखिये अपने देश के नागरिकों, चाहे वो कश्मीरी हों या कोई और, मारकर अपनी बात नहीं मनवाई जा सकती, आपका यह कथन सही है । तो क्या दूसरे राज्यों के उग्रवादी हमारे नागरिक नहीं हैं? हम उन्हें मारने अथवा उनका उन्मूलन करने की योजनाएं आखिर क्यों बना कर भिड़े हुए हैं? इसीलिये न कि स्वदेशी होते हुए भी वो हमारी संवैधानिक व्यवस्था को मानने से इंकार करते हैं, और यह कि हिंसक हैं? तो वहां कश्मीर में ऐसी क्या खास बात है कि वहां की हिंसक भीड़ जो उग्रवादियों की तरह ही हमारी संवैधानिक व्यवस्था को मानने से इंकार कर रही है, और मरने मारने पर उतारू है, वहां से सख्ती हटा ली जाय, क्यों? शिष्टमंडल गया तो है कश्मीर और जम्मू भी । क्या हुआ है वहां, मुझसे ज़्यादा जानकारी आपके पास होगी । गिलानी सहित तीनों मूर्तियों ने टका सा जवाब दिया है कि हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ आज़ादी चाहिये, बिजली पानी और सड़क नहीं । जम्मू में अलग तरीके का विरोध हुआ कि सारी मानमनव्वल सिर्फ़ वहीं क्यों, कश्मीरी पंडितों को विश्वास में लिये बिना वार्ता का औचित्य क्या है? अब बताइये उपेंद्र जी क्या गलत कह रहे हैं कश्मीरी पंडित? जो अवाम हमारे साथ रहने के लिये तैयार नहीं है, उसे सारी सुविधाओं सहित हमें तुरन्त सख्ती छोड़कर तश्तरी में सजाकर अलग मुल्क घोषित करवा देना चाहिये । यदि यही मानवाधिकार की असली और लाभदायक परिभाषा होगी, तो फ़िर हमारी बहस बेकार ही है । चीन ऐसे ही आगे नहीं बढ़ गया उपेंद्र जी, थ्येनआनमन चौक पर यदि उसने छद्म मानवाधिकार का मुंह देखा होता, तो आज शायद इलाक़े की महाशक्ति नहीं होता ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    September 24, 2010

    upendraswami के द्वारा September 22, 2010 शाही जी, मैं यह बात पहले भी कह चुका हूं कि सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून पूर्वोत्तर के राज्यों में पचास से भी ज्यादा साल से है और वहां लगातार उसका विरोध होता रहा है। शर्मिला के बारे में मैंने बताया जो दस साल से इसके विरोध में अनशन पर हैं। कुछ साल पहले वे दिल्ली भी आईं, विरोध किया, पुलिस ने जबरन एम्स में भर्ती कराया और फिर मणिपुर भेज दिया। इस कानून का विरोध न कोई पहली बार हो रहा है और न केवल कश्मीर के संदर्भ में हो रहा है। इसका विरोध समग्र रूप में लगातार होता रहा है। इसलिए खास तौर पर कश्मीर के लिए कुछ कहा जा रहा है, ऐसा नहीं है। यह बात तो मेरी मूल पोस्ट में भी स्पष्ट थी। अब बात कश्मीर की। क्या कश्मीरियों का यह सवाल जायज नहीं कि कश्मीर में चार महीनों में सौ लोगों के मारे जाने के बाद क्यों सरकार को वहां शिष्टमंडल भेजने की याद आई? क्या यह काम विरोध की पहली घटना के बाद ही नहीं हो जाना चाहिए था? और फिर विरोध की बात ही क्यों, कश्मीर को लेकर इतने सालों में क्यों नहीं कभी वहां जाकर आम लोगों से मिलकर बात की गई? क्या सरकार की शान में गुस्ताखी हो जाती अगर चिदंबरम खुद गिलानी, फारूक व मलिक से मिलने पहुंच जाते? आखिरकार हम देश के सामने खड़े सबसे बड़े संकट को सुलझाने की बात कर रहे हैं तो सरकार क्या अपनी तरफ से दो कदम आगे नहीं चल सकती थी? बातचीत को खुले दिल से तैयार तो हों, तो सारे मुद्दों की बात हो, कश्मीरी पंडितों की भी बात हो। लेकिन अगर हम तय ही कर चुके हों कि समाधान सिर्फ बंदूक से ही हो सकता है तो रास्ता कैसे निकलेगा। चीन ने थ्येन आनमन में जो किया, उसका पक्ष आप भले ही लें, मैं नहीं ले सकता। शक्ति बनने का वो कोई रास्ता नहीं और चीन केवल उसके बूते है भी नहीं।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    September 24, 2010

    आर.एन. शाही के द्वारा September 23, 2010 उपेन्द्र जी अगर आपका आफ़स्पा हटाने से सम्बंधित लेख कश्मीर के संदर्भ में नहीं था, तब तो हम इस बहस का पटाक्षेप ही कर दें । हम इस वक़्त कश्मीर और सिर्फ़ कश्मीर की बात कर रहे हैं, मैं मिश्रा जी या बाजपेयी साहब कोई भी । यह हर क़ीमत पर सुनिश्चित हो जाना चाहिये कि कश्मीर हमारा अभिन्न अंग बना रहेगा । यहां मैं या कोई भी आम भारतीय मानवाधिकार के नाम पर अपने भूखंड के शीर्ष को गंवाने की बात का समर्थन नहीं कर सकता, भले हमें आफ़स्पा से भी कड़े क़ानून क्यों न बानाने पड़ें, देश की पूरी सेना झोंककर युद्ध ही क्यों न लड़ना पड़े, या पूरी 120 करोड़ की जनता को सीमाओं पर चढ़कर दुश्मनों से आमना सामना क्यों न करना पड़े । हम कश्मीर किसी भी स्थिति में हाथ से नहीं जाने दे सकते उपेंद्र जी । वहां चिदम्बरम जी जाकर नहीं मिले, तो क्या वे लोग चिदम्बरम का इंतज़ार कर रहे थे जिन्होंने बाक़ी के नेताओं से मिलने से इंकार करते हुए सिर्फ़ और सिर्फ़ आज़ादी लेने की बात की? कहीं अंजाने में हम अपनी सेना पर यह आरोप तो नहीं लगा रहे कि जो स्थिति आज बनी है, वह सेना की कारस्तानी है । उस धरती पर जब भी पहल हुई है, आतंकवादियों और अलगाववादियों द्वारा ही खुराफ़ात की शुरुआत की गई है, फ़िर सेना तो अपना काम करेगी ही । दूसरे राज्यों में जहां आफ़स्पा लागू है, वह एक अलग बहस का विषय हो सकता है वहां की परिस्थितियों के आधार पर । अगर राजनीतिक बातचीत से कश्मीर में सचमुच कोई सकारात्मक हल निकलता है, तो वह स्वागत योग्य होगा, लेकिन पहले से ही अनगिनत सुविधाएं प्राप्त कर रहे अलगाववादियों के आगे घुटने टेक कर यदि कुछ भी और परोसने की कोशिश की गई, तो हमारे लिये आत्मघाती होगा ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    September 24, 2010

    upendraswami के द्वारा September 23, 2010 शाही जी, कश्मीर की भी बात करें तो अफसोस कि हमारी ठीक यही सोच वहां के लोगों को हमसे दूर कर रही है। यानी कश्मीर पर नियंत्रण रखने के लिए हम जिस नीति पर चल रहे हैं, वही नीति दरअसल उन लोगों को हमने परे कर रही है। हमने कश्मीर को पाकिस्तान मान लिया क्योंकि वहां कुछ पाकिस्तान-परस्त लोग हैं। इसलिए सारे कश्मीर हमारे दुश्मन हो गए। जब हम सेना झोंकने और 120 करोड़ लोगों को सीमा पर खड़े करने की बात कर रहे हैं तो वह कश्मीर के पार की बात कर रहे हैं। लेकिन हमारे जेहन में यह तर्क काम कर रहा है कि पूरा कश्मीर दुश्मन देश है। कश्मीर और पाकिस्तान में फर्क नहीं करेंगे तो कभी इस समस्या को सुलझा नहीं पाएंगे। आपकी आखिरी पंक्ति भी वही सोच दिखाती है, हमारा संविधान कश्मीरी लोगों को विशेष सुविधाएं दे रहा है, अलगाववादियों को नहीं। हमारे आधे सांसद भ्रष्ट हैं, अपराधी हैं- तो क्या हम पूरी संसद को फांसी चढ़ा देंगे? सजा कश्मीरी लोगों को क्यों देना चाह रहे हैं। मेरी एक बात का जवाब दीजिए- हिसार में जाट आरक्षण आंदोलन में एक आंदोलनकारी की मौत हुई तो मुख्यमंत्री तुरंत वहां गए, पांच लाख का मुआवजा दिया.. कुछ ऐसा ही हाल अलीगढ़-मथुरा के किसान आंदोलन में हुआ, दोनों ही जगह आंदोलनकारियों ने जमकर आगजनी की, हिंसा की, तोड़-फोड़ की। अगर कश्मीर को हम उतना ही अपना मानते हैं तो क्यों नहीं सुरक्षा बलों की फायरिंग में सौ लोगों के मारे जाने के बाद भी हमारे मुख्यमंत्री वहां गए, लोगों से मिले, उन्हें कोई तसल्ली दी? सेना हर गलती के लिए नहीं, लेकिन कुछ के लिए तो जिम्मेदार है ही। कैप्टन कोहली प्रकरण पर आप क्या कहेंगे?

    आर.एन. शाही के द्वारा
    September 24, 2010

    आर.एन. शाही के द्वारा September 24, 2010 उपेन्द्र जी अब हमारी बहस में विषयांतर और खिंचाव की स्थिति आ रही है, जो गैरज़रूरी है, और ऐसी स्थिति तभी आती है, जब कहने को दोनों पक्ष के पास कुछ और नहीं बचता । हर बहस या तर्क़-वितर्क़ में कुछ छुपे आशय आते रहते हैं, जो खामोशी से समझ लिये जाते हैं, अर्थात अंडरस्टूड होते हैं । कश्मीरी विद्रोहियों की संख्या इतनी नहीं है कि हमें अपनी सारी सेना झोंकनी पड़े, या 120 करोड़ की आबादी उनका प्रतिकार करने पहुंच जाय । मेरा आशय यह है, कि जो स्थितियां आती दिख रही हैं, उसमें यदि अलगाववादियों के किसी आह्वान पर विदेशी सेनाएं उनकी मदद को आ जाती हैं, जैसा कि वे छद्म आतंकवादियों के भेष में पूर्व से हैं भी, और क्या पता बड़ी सेनाएं भी कल को सामने आ जाएं, तो हम मुंह की खाकर पीछे हटकर सुलह समझौते जैसी कायरता सरकार को नहीं करने देंगे । मर जाएंगे, लेकिन कश्मीर नहीं देंगे । वहां हमारे विवेकशील तर्क़ काम नहीं करेंगे जो आदमी को कायर बनाते हैं, बल्कि विशुद्ध भावनाएं होंगी जिनका एक ही मक़सद होगा, कि परमाणु युद्ध भी करना पड़े, तो करेंगे, अपने देश का टुकड़ा किसी कीमत पर नहीं देंगे । वैसे भी आततायी घाटी को खून से लाल करते रहे हैं, और हमने टुकुर-टुकुर देखने के अलावा अभी तक कुछ किया नहीं है । अभी भी आपको कोई खतरा नहीं दिख रहा उपेन्द्र जी, मानवाधिकार की बात कर रहे हैं, जबकि पाकिस्तान ने अभी कल भी हमें ललकारते हुए नसीहत दी है कि अब कश्मीर पर से दावा छोड़ दें । अब ऐसा नहीं होगा, क्योंकि देश जाग चुका है, भले किसी को दिखाई न दे रहा हो । वह जनभावनाएं ही हैं, जिसकी वजह से कल फ़ैसला टला है । अब यह अन्दरूनी खेल भी बहुत दिनों तक चलने वाला नहीं है । हर चीज़ की एक हद होती है, और अब वह पार कर रही है । ‘जाग उठा है देश ये सारा दृढ संकल्प की बारी है – स्वाभिमान जगा भारत का नवयुग की तैयारी है’ । आप भी तैयार रहिये उपेंद्र जी । आने वाले कल का मक़सद होगा कि सारे विशेषाधिकार समाप्त कर घाटी में भारत बसाया जाय, क्योंकि इस समस्या के अंत का यही एकमात्र रास्ता है । कश्मीरी पंडित अनन्तकाल तक अपनी भूमि से अलग नहीं रहेंगे, न ही वहां के सिखों और बौद्धों को अपना धर्म परिवर्त्तन करने की नौबत आने देंगे । कश्मीरी मुसलमान जो देशभक्त और निर्दोष हैं, कोई पागल ही होगा जो उन्हें भी अलगाववादियों की श्रेणी में रखकर देखेगा । लेकिन उनके बीच में फ़ंसे हुए हैं, तो सामयिक रूप से परेशानी झेलने से उन्हें हम नहीं बचा सकते । इस बहस में अब कोई तर्क़ नहीं रहा । कश्मीर हमारा था, हमारा है, और हमारा रहेगा । चीन और पाकिस्तान संयुक्त प्रयास करके भी अब हमारे ज़मीन का और टुकड़ा नहीं कर सकते । हमें मिटाकर करना चाहेंगे, तो खुद भी मिटेंगे । पहले और आज की स्थिति में फ़र्क़ है । 62 में हमारा देश अभी घुटनों के बल रेंग रहा था, जब ड्रैगन ने ज़मीन हथियाई थी । आज वह जानता है कि उसके पास अगर दिल्ली तक मार करने वाली मिसाइलें हैं, तो हमारी पहुंच भी बीजिंग तक हो चुकी है । हमारी कमज़ोरियां सिर्फ़ हमारी राजनीति में समाया हुआ भ्रष्टाचार है, जिसके कारण नैतिक बल में हम तुलनात्मक रूप से चीन से पीछे हैं । इस कमज़ोरी से पीछा छुड़ाना हमारे अपने हाथ में है । वह आज हमसे ताक़तवर ज़रूर है, लेकिन जानता है कि हम भी आज 62 जैसे कमज़ोर नहीं हैं, कि टकराकर आसानी से बिना अपना नुकसान उठाए हमें धूल चटा देगा । रही बात पाकिस्तान की, तो वह हमेशा हमारे सामने पिद्दी ही रहेगा । प्राँक्सी वार से अधिक न वो कर पाया है, न कर पाएगा । आफ़स्पा कानून एक सामयिक ज़रूरत है, सामरिक नहीं । और न ही अपने नागरिकों पर नाहक़ ज़ुल्म ढाने के लिये बना है । अलगाववादी हों या छद्मवेश वाले पाकिस्तानी आतंकवादी, हमारा डायलाँग वही रहेगा – ‘दूध मांगोगे, खीर देंगे- कश्मीर मांगोगे, तो चीर देंगे’। धन्यवाद उपेंद्र जी ।

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    आदरणीय शाही जी वंदेमातरम । आपने बड़ा अच्छा किया जो पूर्व में की गयीं इन टिप्पणियों को यहां दुबारा प्रेषित किया । इससे बहस को सम्रगता मिलेगी । जय हिंद ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 25, 2010

    अजीज प्रिय शाही जी किन शब्दों में आभार व्यक्त करू नहीं समझ पा रहा , आज सुबह से आपके कमेन्ट पढ़ रहा था . वे अपने जबाब न देकर आप से या हम लोगो से ही जबाब मांग रहे है . [उपेन्द्र जी अब हमारी बहस में विषयांतर और खिंचाव की स्थिति आ रही है, जो गैरज़रूरी है, और ऐसी स्थिति तभी आती है, जब कहने को दोनों पक्ष के पास कुछ और नहीं बचता । हर बहस या तर्क़-वितर्क़ में कुछ छुपे आशय आते रहते हैं, जो खामोशी से समझ लिये जाते हैं, अर्थात अंडरस्टूड होते हैं । कश्मीरी विद्रोहियों की संख्या इतनी नहीं है कि हमें अपनी सारी सेना झोंकनी पड़े, या . .]

    आर.एन. शाही के द्वारा
    September 25, 2010

    upendraswami के द्वारा September 24, 2010 अच्छा भाषण बन पड़ा है, शाही जी। दाद दी जा सकती है। लेकिन मुद्दे से भटका हुआ है। हमारी कई राजनीतिक पार्टियां, संगठन यह भाषण कई सालों से देते आ रहे हैं। जो लोग राह चलते इंसान की मदद नहीं कर सकते, वे कश्मीर पर अच्छा भाषण दे सकते हैं। यह टिप्पणी आप पर नहीं, राजनीतिक दलों पर है, इसलिए अन्यथा न लीजिएगा। मेरी तरफ से कोई विषयांतर नहीं, न मुझे इतनी लंबी बातें कहनी आती हैं। सिर्फ कुछ पंक्तियां- कश्मीर पर सारा मौजूदा संकट आखिर पिछले चार महीने के घटनाक्रम की ही वजह से है न! आपने इतनी बातों में मेरी दो बातों का जवाब नहीं दिया, मुझे तो सिर्फ उनका जवाब चाहिए। पिछली प्रतिक्रिया से ही उद्धृत कर दे रहा हूं- “हिसार में जाट आरक्षण आंदोलन में एक आंदोलनकारी की मौत हुई तो मुख्यमंत्री तुरंत वहां गए, पांच लाख का मुआवजा दिया.. कुछ ऐसा ही हाल अलीगढ़-मथुरा के किसान आंदोलन में हुआ, दोनों ही जगह आंदोलनकारियों ने जमकर आगजनी की, हिंसा की, तोड़-फोड़ की। अगर कश्मीर को हम उतना ही अपना मानते हैं तो क्यों नहीं सुरक्षा बलों की फायरिंग में सौ लोगों के मारे जाने के बाद भी हमारे मुख्यमंत्री वहां गए, लोगों से मिले, उन्हें कोई तसल्ली दी? सेना हर गलती के लिए नहीं, लेकिन कुछ के लिए तो जिम्मेदार है ही। कैप्टन कोहली प्रकरण पर आप क्या कहेंगे?” इनका जवाब हो तो बेहतर है, वरना बहस बंद कर देनी चाहिए।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    September 25, 2010

    आर.एन. शाही के द्वारा September 25, 2010 उपेन्द्र जी मैं तो आपका धन्यवाद करते हुए पिछली बार ही अपनी बहस बन्द मान कर गया था, परन्तु आपने फ़िर वापस बुला लिया । लगता है कुछ लगाव हो गया है, जिसके कारण हम एकदूसरे को छोड़ने के लिये तैयार नहीं हो पा रहे हैं । वह भाषण नहीं था, कश्मीर की अभिन्नता के प्रति जनभावनाओं के प्रतिनिधित्व की आवाज़ थी । यह भी हो सकता है कि हम लोग दो विषयों को एक मानकर बेकार की बहस में उलझ गए हैं । आफ़स्पा नाम की बहस की मंज़िल पर शायद अलग-अलग रास्तों के राही टकरा गए । हम अपनी बहस के केंद्र में पहले दिन से ही कश्मीर से आफ़स्पा हटाने की स्थिति है या नहीं, इसको रख कर चले, और इससे अधिक हमें कुछ देखना भी नहीं था । आप उसको जाट आन्दोलन और कैप्टन कोहली प्रकरण से भी जोड़ रहे हैं । कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री को मैं व्यक्तिगत तौर पर डरपोक और अयोग्य मानता हूं, मैंने अपने कुछ लेखों में इसका ज़िक्र भी किया है । बेशक उन्हें यदि कुछ निर्दोषों पर आंच आई थी, तो उनके बीच जाकर उनके घावों पर मरहम लगाना था, जो कि उनका नैतिक और संवैधानिक कर्त्तव्य था । उन्होंने नहीं किया, क्योंकि अव्वल दर्ज़े के निकम्मे और भीरु स्वभाव के हैं । डर के मारे जलते कश्मीर से फ़रार होकर राहुल गांधी के साथ मैदानी इलाक़ों में घूम रहे हैं । इस बात का भारतीय संघ के साथ कश्मीर के रिश्ते का कुछ लेना देना नहीं है, कि उन्होंने अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं किया, इसलिये आफ़स्पा हटा लिया जाय । इसी प्रकार कोहली मामला भी एक सैन्य अधिकारी की व्यक्तिगत सोच और कृत्य का मामला है । यदि आप मानते हैं कि सारे कश्मीरी अलगाववादी नहीं हैं, तो यह भी मानना चाहिये कि सारे सैन्य अधिकारी भी कैप्टन कोहली नहीं हो सकते । आफ़स्पा कानून के औचित्य के लिये कैप्टन कोहली और कमज़ोर मुख्यमंत्री के गैरज़िम्मेदाराना कृत्य का उदाहरण तर्क़ के रूप में प्रस्तुत करना, कश्मीर समस्या को बहुत छोटी दृष्टि से देखना कहा जाएगा । हम चाहे जितनी बहस कर लें, बात वहीं आकर थम जाएगी कि वर्तमान स्थिति में आफ़स्पा हटाकर क्या हम कश्मीर को भारतीय संघ का अभिन्न हिस्सा रख पाएंगे? जवाब होगा, \’नहीं\’ । अब रोगमुक्त होने के लिये जब हम एंटी बायोटिक खाते हैं, तो वह शरीर के अच्छे या बुरे बैक्टीरिया की पहचान नहीं कर पाता, दोनों को समान रूप से मारता है । अच्छे बैक्टीरिया की कमी हम अलग से विटामिन की गोली लेकर पूरा करते हैं । आफ़स्पा को ज़रूरी एंटीबायोटिक के तौर पर ही देखना होगा । यदि न लें, तो रोग से मरना अवश्यंभावी हो जाता है ।

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
September 24, 2010

प्रिय श्री मिश्र जी, चातक जी के शब्‍दों में आपके इस सिंहनाद नें जैसे सोते से जगा दिया है । मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि सर्जन अगर यह देखेगा कि सर्जरी से खून निकलता है या गैंगरीन से वह छोटा सा अंग सड़ रहा है और अगर जल्द सर्जरी नहीं की गयी तो पूरे शरीर में जहर फैल जायेगा तो क्या वह कुछ मिली0 खून के लिये पूरे शरीर को दांव पर लगा दे । सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून सर्जरी के प्रयोग में आने वाला नश्तर है । सर्जरी होगी तो कुछ खून बहेगा ही लेकिन फिर जहर पूरे शरीर में नहीं फैलेगा । अब देखिये नक्सलियों की सर्जरी अगर तीन दशक पहले ही हो गयी होती तो वह आज कैंसर का रूप धारण नहीं किये होते और न ही आज बेकसूर आदिवासी भी उनकी चपेट आये होते । ………. क्‍योंकि हमारें देश में ऐसे सैकड़ों उदाहरण है जब जहर को फैलनें दिया गया और फिर अंग विशेष को काटनें के लिए स्‍वस्‍थ अंग की बलि भी दी गई । इसलिए मैं आपकी बात के साथ हूँ और दोहरा रहा हूँ कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और हम कश्मीर को भारत से कभी अलग नहीं होने देंगे । मुट्ठीभर अलगाववादियों हम भारत के सवा अरब लोग तुम्हारे खिलाफ खड़े हैं ।“ जय हिंद । कसम तोड़नें के लिए धन्‍यवाद । अन्‍यथा हम इस जानकारी व अच्‍छे लेख से वंचित रह जाते । अरविन्‍द पारीक

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    अरविंद जी वंदेमातरम ! कश्मीर भारत का मुकुट है । आज कुछ मुट्ठीभर किराये के टट्टू उसे भारत से अलग करने की मांग कर रहे हैं । हम भारवासियसों को उठ कर उसका प्रतिकार करना होगा नही तो वो सोचेंगे कि भारतीय कभी नींद से न जगने वाली कौम है । आपकी टिप्पणी से बहुत बल मिला । जय हिंद ।

    Priest के द्वारा
    May 21, 2011

    AKAIK you’ve got the asnewr in one!

    sypivjarnam के द्वारा
    May 22, 2011

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    vfiteu के द्वारा
    May 23, 2011

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rita singh 'sarjana' के द्वारा
September 24, 2010

मिश्रा जी ; नमस्कार l जहाँ देश का सवाल हैं वहां मैं सदैब साथ हूँ l आपकी आवाज के साथ मेरा स्वर भी शामिल हो तो गौराव्नित महसूस करुँगी l कश्मीर हमारे देश का अभिन्न अंग है और रहेगा l

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    रीता जी वंदेमातरम । एक आम भारतीय जब देश की बात आती है तो वह आंदोलति हो उठता है । हम सब को आज कशमीर के मुद्दे पर साथ आना पड़ेगा ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 24, 2010

    मिश्रा जी देखिये अपने सिंहनाद का चमत्कार . हमारी बहनों ने भी बिगुल बजा दिया

Y.DUBEY के द्वारा
September 24, 2010

आदरणीय मिश्र जी, इंजिनीअर होने के नाते धारा और अनुच्छेद तो नहीं जानता हूँ, लेकिन मेरे हिसाब से सारी गलती भारतीय सेना की है, विशेष अधिकार प्राप्त सेना पिछले 6o सालो से कश्मीर में है,फिर भी गिलानी,मसूद जिंदा है .हमारे senadhyachh लोग तो राज्यपाल पद के लालच में केंद्र की चमचागिरी करते है और सेना पत्थर खाती है ,अल्गाव्व्वाडियो को मेरा ये सन्देश है की कश्मीर छोडो और अपने आका से कहो की सिंध बचाए हमारे राष्ट्रगान पंजाब सिंध गुजरात मराठा अभी अपूर्ण है.

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    अल्गाव्व्वाडियो को मेरा ये सन्देश है की कश्मीर छोडो और अपने आका से कहो की सिंध बचाए हमारे राष्ट्रगान पंजाब सिंध गुजरात मराठा अभी अपूर्ण है. दुबे जी वंदेमातरत ! आपने बिल्कुल सही कहा कि अभी हमारा राष्ट्रगान अपूर्ण है । दुबे जी जहां तक सेना की बात है तो हमारी सेना और पाकसेना में एक बड़ा भारी फर्क यह है कि हमारी सेना संविधान को मानती है और सिर्फ अपने फर्ज तक ही सीमित रहती है । वह विधायिका और न्यायपालिका के काम में हस्तक्षेप नहीं करती जैसे की पाक सेना करती है । नपुंसक तो दिल्ली में बैठे हुये लोग हैं जो यह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि खटमलों को पालें या साफ कर दें । नेहरू चले गये लेकिन उनकी नीतियां अभी भी जिंदा हैं । भारत देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल का आजादी के कुछ समय बाद ही चले जाना था । अगर पटेल कुछ साल और रह जाते तो कश्मीर समस्या नहीं होती क्योंकि वह पाकिस्तान समस्या को ही निपटा देते जो कि आज वैश्विक आतंकवाद का गढ़ और मुख्य उत्पादनकर्ता बना हुआ है । आपकी बहुमूल्य टिप्पणी के लिये धन्यवाद ।

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    September 24, 2010

    मिश्र जी .. चीन के आक्रमण के बाद जब उसने भारत की जमीं को जबरन कब्ज़ा कर लिया था तब संसद में जवाब देते हुए नेहरु जी ने यही कहा था की जो जमीन चीन के कब्जे में है वह अनुपयोगी है बंजर है ,, अब सवाल ये है की इस तरह से हम कबतक इन गंभीर समस्याओ पर टाल मटोल की नीति अपनाते रहेंगे .. कश्मीर का मुद्दा हम स्वयं ही लगातार खतरनाक बनाते चले जा रहे है …..वास्तविकता यही है की कश्मीर जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिए सरदार पटेल जैसी दूर दृष्टि और दृढ़ता चाहिए ..जो आजादी के बाद किसी भी नेतृत्वा में नहीं दिखती है .. .. हम ये भूलते जा रहे है की कश्मीरी अलगाववादी और नक्सली आतंक के लिए मानवाधिकार के लिए हम देश के करोणों लोगो के मानवाधिकारों और सुरक्षा को खतरे में डाल रहे है….. ये तय करने में क्या कठिनाई है … आप एक सीधा प्रश्न के बारे में सोचिये की अगर आपके दाहिने हाथ को उठाने में ५ लोग मरते है और बाये हाथ को उठाने में २० लोग मरते है तो आपका निर्णय क्या होगा .. जबकि एक हाथ उठाना अनिवार्य है … जाहिर तौर पर आप दाहिना हाथ उठाएंगे .. आप ये नहीं देखेंगे की ५ मर रहे है बल्कि ये देखेंगे की १५ बच गए …..और जब ये ५ आतंकवादी है तो फिर संकोच कैसा अगर आप हाथ नहीं उठाएंगे तो वे ५ बाकि २० को मार देंगे जो निर्दोष है… विकास और शोषण का प्रश्न ही नहीं है प्रश्न केवल ये है की कश्मीरियों के दुःख के नाम पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को अव्यवस्थित करने की शाजिश की जा रही है .. और इस साजिश में हम खुद भी शामिल है ..सरकार को दाहिना हाथ उठा देना चाहिए .. और सेना को वे शक्तिया देनी चाहिए ताकि कश्मीर को इन उपद्रवियों से पूरी तरह मुक्त किया जा सके ….

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    प्रिय निखिल जी वंदेमातरम ! नेहरू जी के इस कथन पर किसी राष्ट्रवादी सांसद ने छूटते ही कहा था कि आपके सर पर भी अब कुछ नहीं उगता । कहिये तो इसे भी चीन को सौंप दें । कश्मीर कठिन दौर से गुजर रहा है लेकिन अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर मुंबई हमले जैसा दबाव सरकार पर बना देंगे तो सरकार को जनता की सुननी पड़ेगी फिर चाहे पाकिस्तान हो या उसके अलगाववादी टट्टू दोनो को ही सबक सीखने के लिये तैयार रहना चाहिये ।

    NIKHIL PANDEY के द्वारा
    October 2, 2010

    जी यह बात जहा तक मैंने सुनी है सरदार पटेल जी ने ही कही थी…..(.बाल वाली.बात)…. निश्चित रूप से अब दबाव बनाए का समय आ रहा है हर मुद्दे पर जनता जागरूक हो रही है … उत्सुकता है उसे जानने के समाधान की ..उसकी ही प्रक्रिया इस वैचारिक आन्दोलन से शुरू हुई है .. सरकार को जागना तो होगा ही… ये विचार आज जन -जन तक पहुच रहा है की ऐसे मुद्दों को लटकाए रख कर नासूर बनाना देश के आतंरिक और वाहय हितो के लिए खतरनाक है ..

Arun के द्वारा
September 24, 2010

मिश्र जी इस लेख के लिए तहे दिल शुक्रिया कबूल करे . इतनी सटीक व सार गर्भित जानकारी का स्वागत है .मै तो मात्र पाठक हु ज्यादा लिख नहीं पता .बहुत अच्छा लगा

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    kmmishra के द्वारा September 24, 2010 अरूण जी वंदेमातरम ! टिप्पण्णी के लिये बहुत आभारी हूं । भले ही आप कम लिखते हों मगर आपके सीने में एक भारतीय दिल धड़कता है और राष्ट्रपे्रम आपकी नसों में खून बन कर दौड़ता है । जय हिंद ।

rajkamal के द्वारा
September 23, 2010

मिश्रा जी …..यह तो इज्जत का ही नहीं ..बल्कि जिंदगी का ही सवाल है …. इसलिए हमारे कश्मीर को कोई अपनी मैली आँख से देख भी नहीं सकता … यह हमारा था और हमेशा ही रहेगा ….

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    राजकमल जी वंदेमातरम ! आपने एक आम भारतीय की सोच को आवाज दी है । हम किसी भी हालत में कश्मीर को भारत से अलग नहीं होने देंगे भले ही इसके लिये हमें अपने पड़ोसी के फिर से टुकड़े टुकड़े करने पड़ें । जय हिंद ।

    Rosa के द्वारा
    May 21, 2011

    I bow down hbulmy in the presence of such greatness.

    ncoqecncb के द्वारा
    May 22, 2011

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    ntvjvtagyu के द्वारा
    May 23, 2011

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Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
September 23, 2010

सर मैं आप से पूरी तरह सहमत हूँ और इस बात का पूर्णतया समर्थन करता हूँ की, इस समय अति उदारता दिखाना, या सच्चाई से मुंह मोदते हुए, गलत कामों की अनदेखीकराते सुए सही और आवश्यक नियमों को हटाने पर बहस करना खुद को जहर देने जैसा है ……….. जैसा की कश्मीर में अलगाववादी विचार धारा के पोषको का utpaat है, ऐसे दशा में राष्ट्र हित में उनका दमन करने की आवश्यकता है ……….. देश की एकता और अखंडता के साथ कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है ….. ”कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और हम कश्मीर को भारत से कभी अलग नहीं होने देंगे । मुट्ठीभर अलगाववादियों हम भारत के सवा अरब लोग तुम्हारे खिलाफ खड़े हैं ।“ जय हिंद ।

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    देश की एकता और अखंडता के साथ कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है ३ण्ण् शैलेश जी वंदेमातरम । आपने सही कहा अब देश की एकता और अखंडता के साथ कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है ३ण्ण्। टिप्पणी के लिये बहुत बहुत आभारी हूं ।

atharvavedamanoj के द्वारा
September 23, 2010

माननीय मिश्रा जी मैं जल्दी ही कश्मीर का काव्यात्मक इतिहास प्रस्तुत करूँगा …विघटनवादी तेवरों के विरुद्ध ऐसे ही तथ्यात्मक किन्तु आक्रात्मक पलटवार करने की आवश्यकता है …आभार ..वन्देमातरम

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    मनोज जी वंदेमातरम ! विघटनवादी तेवरों के विरुद्ध ऐसे ही तथ्यात्मक किन्तु आक्रात्मक पलटवार करने की आवश्यकता है ! आपने सही कहा, अब समय आ गया है इनके कुत्सित इरादों का पूरी दृढ़ता के साथ जवाब देने का । कश्मीर की सही इतिहास को भी अब सामने लाना है । इस वैचारिक और राष्ट्रीय आंदोलन में आपसे सहयोग की अपेक्षा है । जय हिंद ।

chaatak के द्वारा
September 23, 2010

प्रिय श्री मिश्र जी, आपकी राष्ट्रवादी विचारधारा एक दिन जरूर मुखरित होकर सामने आएगी इस बात का अंदाजा हमें था| जिस प्रवाह में आपने इस लेख को लिखा है वह प्रशंसनीय है| अब वह समय आ गया है जब सभी एक स्वर में गर्जना करे ताकि गलतफहमी में जी रहे उदारवादियों के ढोल का शोर थम सके| हमें आज उन आतंकियों और कायर दुश्मनों से उतना खतरा नहीं जितना खतरा इन छद्म उदारवादियों से है जिन्हें जान हथेली पर रखकर राष्ट्र की सीमा और आतंरिक शान्ति व्यवस्था सुरक्षित रखने की कोशिश करने वाले हमारे सैनिक जुल्मी और अताताई लगते हैं और क़ानून व्यवस्था को बिगाड़ने वाले, दंगे करने वाले, देश में रहकर देश से गद्दारी करने वाले यहाँ तक कि नापाक देश से आकर आतंक फ़ैलाने वाले दरिन्दे मासूम इंसान लगते हैं जिनके मानवधिकार की सबसे ज्यादा परवाह की जानी चाहिए| ‘यह भारत है जहां इन खटमलों से मिलने के लिये नेता इनके घर चिरौरी करने जाते हैं जब कि इन खटमलों का शांति से कोई सरोकार नहीं है ।’ भारतीय राजनेताओं के घटियापन की बिलकुल सही व्याख्या करती है| मंच के व्यंगकार के प्रथम सिंहनाद पर ढेरों बधाईयाँ! वन्दे-मातरम!

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    चातक जी वंदेमातरम ! कश्मीर पर अलगावादियों का बेसुरा राग तो पहले से ही सुन रहे था । अभी हाल में कश्मीर गये केन्द्र सरकार के शिष्टमण्डल में शामिल अशिष्ट लोगों की कथनी और करनी देख कर घोर निराशा हुयी लेकिन सब्र का बांध तब टूट गया जब अपने ही कुछ ब्लागर मित्र आतंकियों के मानवाधिकार का रोना रोने लगे । जल्दी ही कश्मीर के इतिहास पर भी लिखूंगा । और आप सब प्रबुद्धजनों से भी अनुरोध है कि कश्मीर संबन्धी जो वास्तविक तथ्य और इतिहास हैं उसको भी सामने लायें क्योंकि सरकारी झूठ की बार आवृत्ति से उसने सच का रूप ले लिया है और जनमानस उसी को सत्य समझने लगा है । जय हिंद ।

Aakash Tiwaari के द्वारा
September 23, 2010

आदरणीय मिश्रा जी नमस्कार….. आज आपका गम्भीर मुद्दे पर गम्भीर रूप देखकर मुझे भी कुछ गंभीरता से सोचने और लिखने का साहस मिला है,,,,,, कश्मीर हमारा था कश्मीर हमारा है और रहेगा……मगर कैसे इन भ्रष्ट नेताओं के द्वारा,,जो की पैदा ही हुए है अपनी माँ को वे……..य में बेचने के लिए अपनी बहन बेटियों को बा……र में उतारने के लिए…..जो केंद्र सरकार एक राज्य को इतने दिनों से सम्भाल नहीं पा रही है वो देश को क्या ख़ाक संभालेगी…मेरी नजर में ये सरकार अब तक की सबसे निकम्मी सरकार है सब के सब चोर हैं सा….. अलगाववादियों को तो खड़ा कर के गोली से उदा देना चाहिए..दंगा,,और उपद्रव मचाने वालों को जिस दिन गोली से उडाना शुरू कर देंगे सब कुछ शांत हो जाएगा… अरे इ जो कश्मीर के लाफ्न्गवं है और जौन पाकिस्तान परस्त लोग हैएन इ सरकार के ढिलाई के फायदा उठाय के सब कुछ करत हैएन..अबही क़ानून लागू होई जाए तौ देखा सब कौनो आपन आपन बिली में जाए के छिपी जाए… सब को तो आराम है हम इलाहाबाद में आराम से बैठे हैं,सब नेता अपनी गाड़ियों की एसी में आराम फरमा रहे है..मगर हमारे फ़ोर्स के जवान भाई वहा के लोगों से पत्थर और गोली खा रहे है और कुछ कर भी नहीं सकते..क्या उन्हें सिर्फ मरने के लिए वर्दी पहनाई जाती है की उनको भी कुछ अधिकार है…मुठ्ठीभर लोग इतने दिनों से नरक मचाये हुए है अबही अगर अलगाववाद की बात करने वालों को, उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने का आदेश आ जाये,,तो सब कुछ तुरंत ठंडा हो जाएगा मगर जिस देश में “अफजल गुरु” जैसे लोगों की पैरवी हो उस देश का कुछ भी नहीं हो सकता…हम सब लोग जातिगत और svaarthi raajneeti me hi uljhe hue hain… as soon as we are not do anything nothing can solve in this country… I love my country,I love my country’s people….. Aakash tiwaary

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    आकाश जी वंदेमातरम ! आपकी आवाज एक आम भारतीय के दिल की आवाज है । नेता चाहे जो कहें, चाहे जितनी घटिया तुष्टिकरण की राजनीति करें मगर एक आम भारतीय सब कुछ समझता है । वक्त आ गया है जब सवा अरब भारतीयों को इन जलील नेताओं से प्रश्न पूछना चाहिये कि कब तक हम अपनी मातृभूमि का कोई न कोई हिस्सा तुम्हारी घटिया और नपुंसक राजनीति की भेंट चढ़ाते रहेंगे । कश्मीर एक राष्ट्रीय मुद्दा है और अब पूरे राष्ट्र को मिल कर इस मुद्दे के लिये एक स्वर में कहना होगा ”कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है ।“

    Keyla के द्वारा
    May 21, 2011

    Hey, that post leaves me felieng foolish. Kudos to you!

    scsyjqintt के द्वारा
    May 22, 2011

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    umxywaz के द्वारा
    May 23, 2011

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Tufail A. Siddequi के द्वारा
September 23, 2010

मिश्रा जी अभिवादन, “सी आई ए, के जी बी, एम आई 6, मोसाद, आई एस आई ऐसे लोगों को कच्चा चबा जाती है । यह भारत है जहां इन खटमलों से मिलने के लिये नेता इनके घर चिरौरी करने जाते हैं जब कि इन खटमलों का शांति से कोई सरोकार नहीं है । और हो भी क्यों । ये पाकिस्तान के भाड़े के टट्टू हैं । अगर ये अलगाववादी किसी और देश में होते या इंदिरा जी ही होती तो अब तक इनके शरीर किसी कब्र में होते और रूहें कयामत का इंतजार कर रही होतीं ।” बधाई. कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और हम कश्मीर को भारत से कभी अलग नहीं होने देंगे । मुट्ठीभर अलगाववादियों हम भारत के सवा अरब लोग तुम्हारे खिलाफ खड़े हैं। जय हिंद ।

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    सिद्दीकी जी, वंदेमातरम । आपकी टिप्पणी से मुझे हमेशा बहुत हौसला मिलता है । आपकी टिप्पणियां मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं । बहुत बहुत शुक्रिया ।

आर.एन. शाही के द्वारा
September 23, 2010

श्रद्धेय मिश्रा जी, प्रणाम! आपने उपेंद्र जी की टिप्पणियों के उद्धरण का जहां तक का हिस्सा अपने लेख में लिया है, उसके बाद उनका जवाब और फ़िर बहस दर बहस मेरी उनसे तीन दिन से लगातार चल रही है । अभी-अभी उनके रात वाली बहस का जवाब लिखकर आपके ब्लाँग पर आ रहा हूँ । उनका ‘गोली मार भेजे में’ यहीं ऊपर ‘ज़्यादा चर्चित’ में काफ़ी ऊपर आ चुका है । उपेंद्र जी बार बार मानवाधिकार और उनके सामने ज़रूरत से नीचे गिरकर बात किये जाने का प्रस्ताव दे रहे हैं, जिन्हें यदि बात-चीत से समझाया जा सकता, तो शायद आज ये स्थिति ही नहीं होती । आपने बिल्कुल ठीक कहा है, कि सड़न के बाद अंग को काटकर आँपरेशन के अतिरिक्त कोई और उपाय नहीं होता । अब तो शिष्टमंडल भी जाकर हो आया है, देखते हैं कि इसका क्या सकारात्मक परिणाम दिखाई देता है । समीचीन और तथ्यपरक लेख के लिये बधाई ।

    kmmishra के द्वारा
    September 23, 2010

    शाही सर प्रणाम । अपकी टिप्पणी वहां जा कर देखी । कुछ बात सेना और सशस्त्रबलों के बारे में कहना चाहूंगा ताकि आपकी बात कुछ लोग नहीं समझ रह हैं उन्हें थोड़ी जानकारी मिले । कुछ लोगों को जिनको इतिहास की जानकारी नहीं है वो भारतीय सेना और सशस्त्रबलों पर मानवाधिकार हनन के आरोप लगाते हैं । अगर 1948 में भारतीय सेनाओं ने हवाई मार्ग से श्रीनगर और कश्मीर के दूसरे इलाकों मे अभियान न चलाया होता तो आज पूरा कश्मीर ही पाक अधिकृत राज्य होता । कश्मीरियों को यहां भारतीय सेना का एहसान मानना चाहिये क्योंकि पाक अधिकृत कश्मीर में कश्मीरियों को तो वोटिंग राइट्स भी नहीं हैं । पाकिस्तान सेना और आतंकवादी संगठनों ने उस इलाके को आतंक की प्रयोगशाला बना डाला है जहां मानवाधिकार नामकी कोई चिड़िया भी होती यह वहां के लोगों ने कभी नहीं सुना होगा । यह भारत है जहां भाड़े के टट्टू अलगाववादी पाकिस्तान के इशारे पर स्वतंतत्रा के लिये युद्ध लड़ रहे हैं । कश्मीर को पाक अधिकृत कश्मीर जैसे नर्क में तब्दील कर के इनको सिर्फ अपना हिस्सा ही मिलेगा वहां का शासन नहीं । अब बात अनु0 370 की । अनु0 370 के तहत खरबों खरबों का विशेष पैकेज कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों को दिया जाता है । कश्मीर के लिये खरबों खरबों का वह पैकेज 1948 से जारी है । इस पैकेज को भी पूरे कश्मीर के लिये नहीं बल्कि घाटी के 7-8 शहरों को दिया जाता है जैसे जम्मू और लद्दाख का इलाका कश्मीर से बाहर के क्षेत्र हैं । जम्मू और लद्दाख का क्षेत्र न सिर्फ आबादी बल्कि क्षेत्र को देखते हुये घाटी से तीन गुना बड़ा है । पिछले 60 साल से सवा अरब भारतीयों के खून पसीने से दिये जाने वाले टैक्स से कश्मीर के चंद शहरों को विशेष पैकेज दिया जाता है और साथ ही पाक परस्त अलगाववादियों को भी विशेष सुविधाएं दी जाती हैं । सांप को दूध पिलाने से वह काटना नहीं छोड़ता है । अनु0 370 ने ही इनको विद्रोही, स्वतंत्र राष्ट्र कश्मीर के निजाम होने का सपना देखने के लिये उकसाया है जबकि जम्मू और लद्दाख के हिंदुओं, सिखों और बौद्धों को क्या मिला है । इन सबके बावजूद हिंदुओं के आराध्य और कश्मीर घाटी को पूरे भारतवासियों के हृदय से जोड़ने वाले बाबा अमरनाथ की यात्रा को बंद कराने के लिये न सिर्फ अलगाववादी बल्कि मुती मु0 और उमर अब्दुला जैसे नेता खुलआम भाषण देते हैं । कश्मीरी पंडितों का हश्र तो सभी जानते हैं और अब कश्मीर के सिख और बौद्धों को भी खुलेआम धर्म परिवर्तत के लिये धमकी दी जा रही है । अब समय आ गया है जब पूरे भारत को खड़े होकर इस सबका विरोध करना होगा और कहना होगा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 23, 2010

    आत्मीय शाही जी मैंने वहा जाकर लिखना छोड़ दिया है वे सिर्फ अपनी बात ही लिख प् रहे है जबाब नहीं देते . मैंने लिखा था हमारे बच्चे है वे जवान जो भाड़े के दिहाड़ी ८०० वाले खच्चरों के पत्थर खा रहे है कोई अमेरिकन नहीं , अब सारे जबाब सवाल इसी पोस्ट पर करे . धन्यवाद

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 24, 2010

    प्रिय मिश्रा जी मै एक और बात की जानकारी चाह रहा था . क्या भारत का कोई नागरिक धरा ३७० की वजह से / अन्य किसी धारा के कारण कश्मीर में जमीन का मालिकाना हक़ प्राप्त कर सकता है . ?

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 24, 2010

    मिश्रा जी विद्वान् उपेन्द्र जी को कम से कम एक बार जाकर उधर वाले कश्मीर का जायजा भी लेना चाहिए .या पाकिस्तान के हिन्दुओ की हालत पर गौर करना चाहिए वहा कितना मावाधिकार काम कर रहा है

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 24, 2010

    हमने अपने फौजियों के लिए किसी के भाई .भतीजे , बेटे .लिख कर उनके लिए ., अपने जिगर के टुकडे शब्द लिखा था .उपेन्द जी ने जबाब दिया आप कश्मीरियों को जिगर का टुकड़ा नहीं मानते .हमारी यही सोच कश्मीर समस्या के समाधान में बाधक है [ क्या कोई स्वाथ्य बहस इस तरह हो पायेगी ]

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    बाजपेई जी आपका कहना सही है कि कश्मीर में भारत के दूसरे राज्यों के नागरिक कोई जमीन नहीं खरीद सकते हैं । इसके साथ ही अगर कोई कश्मीरी महिला किसी दूसरे राज्य के पुरूष से विवाह करती है तो उस महिला को उत्तराधिकार में प्राप्त जमीन के अधिकार भी समाप्त हो जाते हैं ।

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    बाजपेई जी आप का कहना बिल्कुल सही है कि मानवाधिकार सिर्फ अलगाववादियों और आतंकियों के ही नहीं होते हैं । मानवाधिकार और मूलाधिकार का हक हमारे सैनिकों और सशस्त्रबलों के सिपाहियों को भी है । आज कश्मीर में अलगाववाद का मुद्दा आम कश्मीरी नहीं उठा रहा है । यह मुद्दा उठाने वाले पाकिस्तान के किराये के टट्टू हैं । आम कश्मीरी ने तो अभी दो साल पहले राज्य में हुये चुनावों में 60 प्रतिशत मतदान किया था । अगर उनको भारत में रहना स्वीकार नहीं था तो उन्होंने मतदान क्यों किया था । आम कश्मीरी भारत के साथ रहना चाहता है । जिसे भारत के साथ नहीं रहना है वह भारत के भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार भारत देश के खिलाफ युद्ध छेड़े हुये हैं और भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार (धारा 121) भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने का दण्ड भी सजाये मौत ही है ।

    Snow के द्वारा
    May 21, 2011

    THX that’s a great ansewr!

    oltcyufw के द्वारा
    May 22, 2011

    755rD1 wqxikaigoreu

NIKHIL PANDEY के द्वारा
September 23, 2010

हमें एक बात और ध्यान रखनी होगी ..की कश्मीर ही वह मुद्दा है जो 1947 से आजतक पकिस्तान के जीवन को थामे है … संचालित किये हुए है ,, वह सरकारे मिडिया सब कुछ कश्मीर के नाम पर ही बनाते बिगड़ते है … जैसे बादशाह बन्ने के बाद गजनवी ने कसम ली थी की वह हर साल काफ़िरो पर आक्रमण करेगा वैसे ही पकिस्तान ..में सत्ता के केंद्रीय लक्ष्यों में कश्मीर रहता है ..उसी की आजादी नाम पर वह अपने यहाँ आतंकवादी भरती करता है .एक भ्रमजाल पाकिस्तानी युवाओ के मन में डालता रहता है की उन्हें इस्लामियत के नाम पर कश्मीर में अपने बंदी मुसलमान भाइयो और महिलाओ की इज्जत को बचाना है इसके नाम पर जेहाद का तांडव करने भारत भेजता है ..इसी के भरोसे पकिस्तान का खर्चा चलता है .उसे कर्ज दिए जाते है तो क्या अंतर्राष्ट्रीय संस्थाए नहीं जानती की उन्हें कहा खर्च किया जाता है .. वे जानती है .. लेकिन क्या करे ..सब गन्दा है पर धंधा है ये… की तर्ज पे भारत से शांति की अपील करती है और हम वापस अपने बिलों में घुस जाते है …. यकीं मानिये अगर आज की तारीख में कश्मीर मुद्दा भारत सुलझा ले तो पकिस्तान तबाह हो जायेगा ……क्योकि वैसे भी एक असफल राष्ट्र के रूप में वह कश्मीर के नाम पर ही जिन्दा है … और कौन नहीं जनता की कश्मीरी मानवाधिकारों की बात करने वाले कश्मीर के अलगाववादी बुद्धिजीवी अपनी खुराक पकिस्तान और आई एस आई से ही पाते है तो वे तो उनकी ही बात करेंगे …. बढ़िया किया आपने एक गंभीर विषय पर लिख कर …एक बार पुनः धन्यवाद

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    एक भ्रमजाल पाकिस्तानी युवाओ के मन में डालता रहता है की उन्हें इस्लामियत के नाम पर कश्मीर में अपने बंदी मुसलमान भाइयो और महिलाओ की इज्जत को बचाना है इसके नाम पर जेहाद का तांडव करने भारत भेजता है निखिल जी बिल्कुल सही कहा आपने । आम पाकिस्तानियों को सन 1947 से बरगलाया जा रहा है कश्मीर के मुद्दे पर । मुंबई हमले के आरोपी कसाब का भी यही कहना है कि भारत विरोधी बातें और कश्मीरियों के बारे में अनापशनाप बातें उसके दिमाग में आई एस आई और सेना ने ही भरी थीं । इसी के भरोसे पकिस्तान का खर्चा चलता है ण्उसे कर्ज दिए जाते है तो क्या अंतर्राष्ट्रीय संस्थाए नहीं जानती की उन्हें कहा खर्च किया जाता है ! न सिर्फ पाकिस्तान का खर्च चल रहा है बल्कि भारत में मुस्लिम मतों की राजनीति करने वाले कुछ तथाकथित राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों को चंदा भी मिडिल ईस्ट के कुछ देशों से आता है । जब एक आर टी आई के तहत यह प्रश्न पूछा गया कि राजनैतिक पार्टियों को कितना चंदा दिया जाता है तो सभी राजनैतिक पार्टियों ने एक स्वर में बताने से इंकार कर दिया था कि हम सरकारी संस्थान नहीं है जो अपना खर्च बतायें । कुछ राजनैतिक पार्टियों जो सिमि जैसे संगठनों के लिये ढाल का काम करती है उनको तो उन्हीं विदेशी संस्थाओं से पैसा मिलता है जो अलकायदा और जैशे मुहम्मद को चंदा देती हैं । यह बात मैं नहीं कह रहा हूं । यह आई. बी. और दूसरी खुफिया संस्थाओं का कहना है । इसके बावजूद भी केन्द्र की यूपीए सरकार उसके खिलाफ कुछ नहीं करती क्योंकि पिछली और इस यूपीए सरकार को भी उन तथाकथित पार्टियों का समर्थन हासिल है ।

NIKHIL PANDEY के द्वारा
September 23, 2010

आदरणीय मिश्र जी , व्यापक अवलोकन और तर्कसंगत तरीके से पोस्ट रखने के लिए धन्यवाद उम्मीद है इससे सभी को समझने में सुविधा होगी.. वर्तमान परिस्थिति में २ चीजे गौर करने लायक है .. कश्मीर मे आम चुनाव हुये और 60 प्रतिशत वोटिंग हुयी थी ,, कबी १ सीट तक सीमित तथाकथित कमुनल भाजपा ११ सीटे जीत गई ,, और कश्मीर शांत था… ये स्पष्ट होने लगा था की घाटी में कुछ सकारात्मक बदलाव होंगे…, दूसरी बात जिसे आपने रेखांकित किया है ……उमर अब्दुला के अनुभवहीन होने का फायदा आज अलगाववादी और पाकिस्तान उठा रहा है । इसके अलावा भारत का मुंबई हमले के लिये पाकिस्तान पर दबाव बढाना और विकीलीक्स रिपोर्ट के तहत पाक सरकार और आर्मी के अलकायदा और अंतराष्ट्रीय आतंकवाद की खेती करने के खुलासे से पाकिस्तान बौखला गया और उसने घाटी में अपने भाड़े के टट्टूओं को बढ़ावा दे दिया ।…. यह वास्तविकता है उम्र अब्दुल्ला का अनुभवहीन और कश्मीरी अवाम से एक दुरी का फायदा अलगाववादी उठा रहे है .. इससे डर कर अगर आज हमने सेना के मनोबल को तोड़ने वाला कोई निर्णय ले लिया तो बहुत खतरनाक sthiti ban jayegi…. नक्सलवाद हो या कश्मीर का मसला ये अगर आज नासूर बने हुए है तो इसकी वजह ये ही है की इन्हें दूर दृष्टि से नहीं देखा गया .. इसे केवल विकास का मसला मान कर एक ही एंगिल से देखा गया .. जबकि हम ये भूल गए की देश के चारो तरफ ऐसी शक्तिया मौजूद है जिनका उद्देश्य ही है भारत को अस्थिर रखना … बहुत बढ़िया उदाहरण आपने पंजाब का दिया और वास्तव में कश्मीर और नक्सल समस्या पर ऐसी कठोर निर्णय समय रहते लिए जाने चाहिए थे …अब ये जहर बन कर देश की रगों में दौड़ने लगा है तो हम पगलाए घूम रहे है.. कुछ सूझ नहीं रहा .. लेकिन कश्मीर पर निर्णय भारत की सरकार नहीं १२० करोड़ हिन्दुस्तानी करेंगे … ये समस्या भावुकता से हल नहीं होगी इसके लिए दृढ संकल्प की जरुरत है .. सरकार का jo निर्णय हो हम सभी का निर्णय तो आपने bata ही दिया है ………… ”कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और हम कश्मीर को भारत से कभी अलग नहीं होने देंगे । मुट्ठीभर अलगाववादियों हम भारत के सवा अरब लोग तुम्हारे खिलाफ खड़े हैं ।“ जय हिंद ।

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    लेकिन कश्मीर पर निर्णय भारत की सरकार नहीं १२० करोड़ हिन्दुस्तानी करेंगे ३ ये समस्या भावुकता से हल नहीं होगी इसके लिए दृढ संकल्प की जरुरत है निखाल जी टिप्पणी के लिये आभारी हूं । अब वक्त आ गया है जब कश्मीर मुद्दा हर राज्य चुनावों में भी गूंजना चाहिये । किस पार्टी का कश्मीर पर क्या स्टैण्ड है लोगों को इसकी जानकारी होनी चाहिये ।

rkpandey के द्वारा
September 23, 2010

आदरणीय के. एम. मिश्र जी, आपने आज बिलकुल अलग मुद्दे को उठा लिया है किंतु ये बेहद आवश्यक भी था. आप जैसे बुद्धिजीवियों को सही बात कहने के लिए आगे आना ही चाहिए. हालांकि आपके व्यंग्य भी खास मुद्दों को लेके ही लिखे गए होते हैं लेकिन कश्मीर जैसे संवेदनशील विषय पे आपका मुखर होके सामने आना जरूरी था. भारत के अभिन्न अंग काश्मीर को किसी भी प्रकार से विच्छेदित करने का प्रयास करने वालों को बलपूर्वक कुचलना ही आखिरी विकल्प है.

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    आदरणीय पाण्डेय मुझे दो साल से अधिक हो गया हिन्दी ब्लागिंग में मगर मैंने आज तक ब्लाग पर सिर्फ व्यंग्य ही लिखे हैं । मुझे ऐसा लगता है कि मैं किसी भी विषय पर व्यंग्य लिख सकता हूं पर जिस तरह महाभारत में श्री कृष्ण ने हथियार न उठाने की कसम खायी थी पर भीष्म पितामह की वीरता को देख कर उन्हें भी रथ का पहिया उठाना पड़ा था वैसी ही कुछ हालत श्री कृष्ण के इस भक्त की भी कश्मीर की वर्तमान स्थिति देख कर हो गयी । लेकिन अब गंभीर मुद्दों पर चुप नहीं बैठा जायेगा और जनमानस को वास्तिविक तथ्यों से अवगत किया जायेगा क्योंकि भारतीय स्वभाव से बड़े ही मासूम, दयालु और सहिष्णु होते हैं । इसके अलावा सरकारें गलत सलत इतिहास की जानकारी दे कर उनको बरगलाती हैं और हममे से बहुत से लोग उस जानकारी/या इतिहास को सही मानन कर अपनी धारणा बना लेते हैं । अब दिमाग पर पड़ी धूल साफ होनी चाहिये । वंदेमातरम !

Ramesh bajpai के द्वारा
September 23, 2010

कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है । कश्मीर का इतिहास सिर्फ 1947 से नहीं शुरू होता है । कल्हड़ की राजतरंगिनी उठा कर देखिये । कश्मीर का इतिहास उन्होंने कश्मीर में योगेश्वर श्री कृष्ण के आगमन से शुरू किया है । प्रिय मिश्रा जी .तहे दिल से विचारो का स्वागत है .समर्थन है . कश्मीर हमारा है .हमें भी कश्मीर और वहा की जनता से उतना ही प्रेम उतनी ही आत्मीयता है जितनी किसी अन्य भारतीय से , जय हिंद जय भारत

    kmmishra के द्वारा
    September 24, 2010

    बाजपेई जी प्रणाम । हम कैसे कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग न माने । कश्मीर पिछले पांच हजार साल से घोषित रूप से भारत देश का हिस्सा रह है । अगर कश्मीर हमसे छिन जाता है तो यही माना जायेगा कि हम भारतीय इतिहास से कुछ सीख नहीं लेते और बड़े भारी भुलक्कड़ हैं । देश का बंटवारा कराने वाली ताकतें आज फिर सक्रिय हो गयी हैं । जमीयत उलेमा.ए.हिन्द देश भर के मुस्लिम संगठनों को इकट्ठा करके कश्मीर ले जाने की तैयारी में है जिससे ये तमाम मुस्लिम संगठन कश्मीर की आग को पूरे देश में फैला सकें । अब जागने का वक्त आ गया है और उनको यह बताने का कि हम बेहोश नहीं हैं । कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और हम इसे अपनी जान से प्यारी मातृभूमि से अलग नहीं होने देंगे ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 24, 2010

    aaj isi soch aur housle ki jarurat hai

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 26, 2010

    प्रिय मिश्रा जी अब नया सिगूफा यह की पत्थर बाजी करने वाले स्कूलों के क्षात्र है और अच्छे घरो के है .

    K M Mishra के द्वारा
    September 30, 2010

    बाजपेई जी आपने ठीक कहा आज पूरे भारत को कश्मीर पर एक होना होगा । 1971 में लगे घाव पड़ोसी के अभी तक हरे हैं और वह भारत को हजार जख्म देने की नीति पर कायम है । कश्मीर को नासूर कुछ उसने बनाया और कुछ नेहरू की नीतियों ने । आभार ।

    K M Mishra के द्वारा
    September 30, 2010

    बाजपेई जी, इस शिगूफे को उड़ाने वाले लगता है यह कहना चाहते हैं कि कश्मीर के मदरसों में इल्म की कम और आतंकवाद का अभ्यास ज्यादा होता है ।




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