सत्यमेव .....

हास्य व्यंग्य एक्सप्रेस

29 Posts

624 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 799 postid : 330

गुजरात के नाथ

Posted On: 24 Sep, 2010 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

इस लेख को लिखने की प्रेरणा आदरणीय रमेश बाजपेई जी के लेख ” अयोध्या इतिहास के आइने में “ में अभी हाल मे आयी श्रद्धेय अरूणकांत जी की टिप्पणी पढ़ने से मिली । अरूण जी की टिप्पणी जो कि नीचे दी गयी है ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है । क्योंकि मैं इतिहास का विद्यार्थी नहीं रहा इसलिये मैं इस टिप्पणी को लेकर वरिष्ठ पत्रकार और भारतीय इतिहास के जानकार श्री नरेश मिश्र के पास गया । उक्त टिप्पणी को पढ़ कर उन्होंने जो लेख लिखवाया वह नीचे दे रहा हूं ।

कृष्ण मोहन मिश्र

अरुण कान्त शुक्ला \\\\\\\’आदित्य \\\\\\\’ के द्वारा
September 21, 2010

आदरणीय बाजपेयी जी ;
आपका लेख निसंदेह ज्ञानवर्धक है | जिन कालखंडों की आपने चर्चा की है , उनमें अयोध्या ही क्यों पाटलीपुत्र , उज्जयनी , वाराणसी , प्रयाग एवं अनेक अन्य नगर अपने वैभव और धार्मिक महत्त्व के लिये आज तक जाने जाते हैं | उसी महत्व और वैभव को पुनः हासिल करने के प्रयास में तो पूरा समाज आदि सामंतकाल में चला जायेगा | इतिहास से अतीत के गौरव को खींचकर लाने से वर्त्तमान का गौरव नहीं बनता | देश में जो लोग ऐसा करना चाहते हैं , उन्होंने वर्त्तमान को कितना कष्टदायी बना दिया है , यह भी अक विचारणीय प्रश्न है |
हर काल के शासकों ने इतिहास को न केवल अपने तात्कालिक राजनीतिक उद्देश्यों के लिये अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा बल्कि अपने हिसाब से लिखवाया भी है | वर्तमान में कोई भी राय बनाने से पहले इतिहास में मंदिरों को तोडने की प्रक्रिया को समझाना बहुत आवश्यक है | क्या मंदिर इसलिए तोड़े गए कि मुसलमान राजा हिदू धर्म का अपमान करना चाहते थे ? हम बहुचर्चित और कट्टरपंथियों द्वारा सबसे ज्यादा हवाला दिए जाने वाले मुहम्मद गजनवी और सोमनाथ मंदिर की चर्चा करें | मुहम्मद गजनवी अफगानिस्तान के गजना नामक शहर से आया था और शायद इसी लिये उसका नाम गजनवी था | गजना से सोमनाथ आने के लिये उसे एक लंबा सफर तय करना पड़ा होगा और निश्चित रूप से रास्ते में बहुत सारे हिन्दू मंदिर पड़े होंगे | उसने उन सब मंदिरों को क्यों नहीं तोड़ा ? रास्ते में बामियान की वशाल बुद्ध की मूर्तियां भी उसे दिखी होंगी , उसने उन्हें हाथ भी नहीं लगाया | पहला सवाल यह उठता है कि उसने तोडने के लिये सोमनाथ मंदिर को ही क्यों चुना ? जब गजनवी सोमनाथ की और बढ़ रहा था तो रास्ते में मुल्तान नाम का शहर पड़ा | मुलतान के नवाब का नाम था अब्दुल फत दाउद | गजनवी ने उससे उसकी सल्तनत की सीमाओं से होकर सोमनाथ जाने की अनुमति मांगी | अब्दुल फत दाउद ने इसकी अनुमति नहीं दी और इस कारण दोनों मुसलमान राजाओं में युद्ध हुआ और इस युद्ध में मुल्तान की जामा मस्जिद शहीद हो गई | याने गजनवी ने अपने राजनीतिक प्रयोजन के लिये रास्ते में आने वाली मस्जिद को भी नहीं छोड़ा | मुल्तान के बाद जो मुख्य शहर पडता था , उसका नाम था थानेश्वर , जहाँ का राजा आनंदपाल था | गजनवी ने उससे भी वही निवेदन किया और आनंदपाल ने उसे अपने राज्य से गुजरने की अनुमति दे दी | अबयः बात तो सभी जानते हैं कि सोमनाथ की अकूट संपदा को उसने लूटा और फिर यह कहकर मंदिर को तोड़ा कि इस्लाम में मूर्ति पूजा को मान्यता नहीं है , इसलिए में मंदिर को तोड़ रहा हूँ | यहाँ प्रश्न उठता है कि अगर वह इस्लाम का सिपाही था तो उसने रास्ते में पड़ने वाले मंदिरों को क्यों नहीं तोड़ा ? अगर वह इस्लाम का सिपाही था तो उसने अपने रास्ते में आने वाली मस्जिद को क्यों नहीं छोड़ा ? गजनवी की फ़ौज में एक तिहाई सैनिक हिन्दू थे और उसके बारह सिपलसहारों में से पांच हिन्दू थे | उनके नाम थे तिलक , सोंधी , हरजान , राण और हिंद | उसने सोमनाथ जीतने के बाद वहाँ अपने प्रतिनिधि के रूप में एक हिंदू राजा की नियुक्ति की और अपने नाम के सिक्के चलाये जिनकी लिखावट संस्कृत में थी |
कमेन्ट लंबा हो रहा है इसलिए में रामभक्त गोस्वामी तुलसीदास का हवाला देते हुए अपनी बात खत्म करूँगा कि उसी काल में तुलसीदास अयोध्या में ही रहते थे | अगर राम मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई होती तो निश्चित रूप से तुलसीदास इसका जिक्र अपनी रचनाओं में करते | एक और छोटी किन्तु महत्वपूर्ण बात है कि अभी भी बहुतायत में हिन्दू परम्परा के अनुसार स्त्री अपने पहले बच्चे को जन्म देने के लिये मायके जाती है , तब सीता भी गईं होंगी | और तो और आज भी अयोध्या में ऐसे लगभग पचास से ज्यादा मंदिर हैं जो यह दावा करते हैं कि राम का जन्म वहीं हुआ था |
गोस्वामी तुलसीदास के बारे में एक रोचक जानकारी है कि उन्होंने राम कथा को पहली बार आम बोलचाल की भाषा अवधी में लिखा |चूंकि उस समय ब्राम्हण वर्ग केवल देवभाषा संस्कृत का प्रयोग करता था , और तुलसी दास ने उसके विपरीत जाकर अवधी (लोकभाषा) का प्रयोग किया , इसलिए उन्हें जाती से निकाल दिया गया और उनके राम मंदिर आने पर रोक लगा दी गई | पर इस रामभक्त ने अपनी भक्ति को जारी रखने के लिये किसी ढाँचे को ध्वस्त नहीं किया और एक मस्जिद में रहने लगे | तुलसीदास ने अपनी आत्मकथा विनय चरितावली में लिखा है ;
तुलसी सरनाम गुलाम है राम को , जाको रुचे सो कहे वोहू
माँग के खइबो मस्जिद माँ रहिबो , लेबे का एक न देबे का दोऊ

टिप्पणीकार का इतिहास के बारे में ज्ञान अधूरा और गलत साक्ष्यों पर आधारित है । इस तथ्य पर गौर करना चाहिये कि पाटलिपुत्र, उज्जैन, वाराणसी और प्रयाग के तमाम मंदिर मुस्लिम शासनकाल में धवस्त किये गये इसके बावजूद हिंदू आस्था बाबरी ढांचे को राममंदिर क्यों मानती है और उस स्थल को आस्था का केन्द्र क्यों समझती है । हिंदुओं को अपने तमाम मंदिरों के ध्वस्तीकरण पर मलाल होने के बावजूद उस पर दुबारा कब्जे का आग्रह नहीं है । हिंदू मानस सिर्फ अपने आराध्य श्री राम की जन्मस्थली पर मंदिर क्यों बनाना चाहता है ।

टिप्पणीकार इतिहास से कट कर वर्तमान की चिंता करने की सलाह देते हैं । उन्हें यह बताना जरूरी है कि जो देश या समुदाय अपने अतीत की संस्कृति, ऐतिहासिक घटनाओं से वाजिब सबक लेकर वर्तमान को नहीं संवारना चाहता उसका वजूद जल्दी ही खत्म हो जाता है । यूनान, मिश्र, और रोमन सभ्यता का पतन इसलिये हुआ था कि उस सैनिक नजरिये से बेहद ताकतवर संस्कृति का कोई वैभवशाली अतीत नहीं था । तलवार के बल से जो साम्राज्य बनाये जाते हैं वे तलवार की धार से ही टुकड़े -टुकड़े हो जाते हैं । हिंदू संस्कृति के निमार्ण में हिंसा या सैनिक शक्ति की कोयी भूमिका नहीं थी । वह उस वैचारिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक बुनियाद पर बनी थी जिसे आज तक सनातन कहे जाने का गौरव हासिल है । हमारे देश में जिन तीन धर्मों का प्रचार, प्रसार हुआ वे मुख्य रूप से हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म हैं । इतिहास में ऐसा कोई ठोस उदाहरण नहीं मिलता कि इनमें से किसी भी धर्म के प्रचार के लिये किसी शासक ने या समुदाय ने युद्ध और हिंसा का सहारा लिया हो । मौर्य और गुप्त साम्राज्य में ऐसे तमाम उच्च पदाधिकारियों के नाम गिनाये जा सकते हैं जो बौद्ध, जैन या हिंदू थे । शासक कभी इस मुद्दे पर गौर नहीं करते थे कि उनके सेनापति, मंत्री किस धर्म के अनुयायी हैं । वे सिर्फ यह देखते थे कि साम्राज्य और शासन के हित में कौन व्यक्ति सबसे ज्यादा उपयुक्त है ।

इसके बरखिलाफ मध्यपूर्व मे जिन तीन सेमेटिक धर्मों का प्रचार हुआ उनके अनुयायी शासकों ने तलवार का सहारा लेकर अपने धर्म का प्रचार करने मे गुरेज नहीं किया । इसाईयों और इस्लामी शासकों ने याहूदियों को उनके मूल स्थान से खदेड़ कर दुनिया के तमाम हिस्सों में बसने को मजबूर किया । इसाईयों और मुसलमानों में क्रूसेड (धर्मयुद्ध) सदियों तक चलता रहा । क्या भारत के इतिहास में ऐसे धर्मयुद्धों का कोई प्रसंग आता है । हिंदू शासकों ने इस्लाम के तूफान में विस्थापित हुए अग्निपूजक पारसियों को उदारता से अपनाया । यह उदारता हिंदू संस्कृति की सबसे बड़ी पूंजी है । हमारी संस्कृति उदार, सदाशय और समन्वयवादी है । हम किसी भी हितकारी विचारधारा के लिये अपनी खिड़कियां बंद नहीं करते । हम हर दिशा से शुभ विचारों की बयार का स्वागत करते हैं ।

टिप्पणीकार ने महमूद गजनवी को मुहम्मद गजनवी लिखा है । जाहिर है वे सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण करने वाले शासक का सही नाम नहीं जानते । मुहम्मद गोरी ने तराईन की लड़ाई में पृथ्वीराज चैहान को हरा कर पहली बार भारत में स्थायी रूप से इस्लामी शासन की नींव डाली । उसने अपने एक गुलाम को दिल्ली का सुल्तान बनाया और इस देश में गुलामवंश की नींव पड़ी । महमूद गजनवी ने सिर्फ एक बार भारत पर आक्रमण नहीं किया था । उसने कई बार इस देश पर हमला करके यहां के मंदिरों की संपत्ति को लूटा था । इसका विस्तृत व्यौरा जानने के लिये टिप्पणीकार को ‘शाहनामा’ पढ़ना चाहिये । अगर ‘शाहनामा’ पढ़ने में दिक्कत आये तो उन्हें कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी लिखित ‘गुजरात के नाथ’ पढ़ना चाहिये ।

टिप्पणीकार का यह कथन भ्रामक है कि हिंदूओं ने सोमनाथ मंदिर के रास्ते में महमूद गजनवी को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया । उन्होंने प्रयास किया और कुर्बानियों दी लेकिन उनका प्रयास संगठित नहीं था । वे इस्लामी जुनून से भरी गजनवी की फौज का मुकाबला नहीं कर सके । महमूद गजनवी ने जब गदा की चोट से सोमनाथ शिवलिंग तोड़ने के प्रयास किया था तब पुजारियों और हिंदू सामंतों ने उससे अनुरोध किया था कि वह शिवविग्रह न तोड़े । इसके बदले में वे गजनवी को मुंह मांगी दौलत देने को तैयार थे । लेकिन गजनवी ने दो टूक जवाब दिया था कि वह तवारीख में बुतों का सौदागर नहीं बुतशिकन कहा जाना पसंद करेगा । टिप्पणीकार को महमूद गजनवी की यह बात क्यों याद नहीं आयी इस बारे में सिर्फ कयास लगाया जा सकता है । टिप्पणीकार यह कहकर महमूद गजनवी का बचाव करना चाहता है कि उसने सोमनाथ के अलावा कोई मंदिर नहीं तोड़ा जाहिर है उन्हें इतिहास की आधी अधूरी जानकारी है ।

राम मंदिर तोड़ कर वहां मस्जिद बनाने का काम बाबर के शिया सिपहसालार मीर बाकी ने किया था । इस घटना का विवरण मुस्लिम और यूरोपियन इतिहासकारों ने किया है । मंदिर मस्जिद संघर्ष का लंबा इतिहास है । इसके सम्बन्ध में जो दावे किये गये और मुकद्दमेबाजी हुयी उसकी शुरूआत 19वीं सदी से हो गयी थी ।

टिप्पणीकार का यह कहना भी तथ्यों से परे हैं कि गोस्वामी तुलसीदास के जमाने में ब्राह्मण वर्ग आम बोलचाल की भाषा के रूप में संस्कृत का प्रयोग करते थे । उन्हें भाषा विज्ञान का इतिहास पढ़ना चाहिये । ईसा के जन्म से 600 साल पहले भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था । उनके जीवनकाल में संस्कृत की जगह पालि भाषा आम लागों के चलन में थी । पालि के बाद प्राकृत का प्रचार हुआ । प्राकृत के बाद अपभ्रंशकाल आया और उससे हिन्दी के साथ ही मराठी, गुजराती, जैसी तमाम क्षेत्रीय भाषाओं का का विकास हुआ ।

टिप्पणीकार यह भूल जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास का अवधी में रामचरितमानस लिखने का प्रयोजन किसी मंदिर का इतिहास लेखन नहीं था । वे तो सिर्फ निराश, हताश और दिगभ्रमित हिंदू समुदाय में सबसे ज्यादा प्रचलित लोक भाषा अवधी का सहारा लेकर उसे अपने धर्म पर टिके रहने का आह्नन करना चाहते थे । उनका जीवनकाल मुगल शासन का दौर था । वे ऐसी बातें क्यों लिखते जिससे हिंदू समुदाय को इस्लामी रोष का सामना करना पड़ता ।

गोस्वामी तुलसीदास को कभी जाति बहिष्कृत नहीं किया गया और न ही उन्हें राम मंदिर में जाने से रोका गया । वे मस्जिद मे रहते थे इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है । तुलसीदास की आत्मकथा का जिक्र करके टिप्पणीकार ने हास्यास्पद स्थिति पैदा कर दी है । गोस्वामीजी ने विनय चरितावली नाम का कोई ग्रंथ नहीं लिखा है । उनकी रचना का नाम विनय पत्रिका है । विनय पत्रिका में कवि ने केवल अपने आराध्य श्री राम के प्रति अपनी अविचल भक्ति का वर्णन किया है । उनकी एक रचना का नाम गीतावली है । टिप्पणीकार जल्दबाजी में उसे विनय चरितावली लिखते हैं । गोस्वामी तुलसीदास ने अपने कट्टर आलोचकों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिये अपना फक्कड़ और अकिंचन स्वरूप व्यक्त किया था । इस पद में उन्होंने लिखा था

मांग के खाईबो, मसीत में सोईबो ।

टिप्पणीकार ने मसीत की जगह मस्जिद लिख दिया है । सोईबो की जगह रहिबो समझ लिया है । इसमें गलती गोस्वामी जी की नहीं खुद टिप्पणीकार की है । गोस्वामी जी तो अपने आलोचकों को यह बताना चाहते थे कि उन्हें किसी लाभ लोभ की आकांक्षा नहीं है । उन्हें जो भिक्षा में मिल जाता है उसी को प्रसाद समझ कर ग्रहण करते हैं । रात में सोने की जगह नहीं मिले तो मस्जिद में सो जाते हैं । मस्जिद भी पवित्र धार्मिक स्थान हैं इसलिये उसमें किसी भक्त का रात गुजारना यह साबित नहीं करता कि वे मंदिरों से बहिष्कृत थे और मस्जिद में रहते थे ।

यहां महान संत गुरू नानक के एक दोहे का जिक्र करना मुनासिब होगा ।

नानक नान्हे व्हे रहो जैसे नान्हीं दूब ।

और रूख सूख जायेंगे दूब खूब की खूब ।

यह दोहा गुरू नानक ने बाबर के पंजाब पर हमले और उसकी हैवानियत को देख कर कहा था । तुलसी ने भी वही किया । वे जानते थे कि इस्लाम का तूफान एक दिन गुजर जायेगा । इसमें बड़े बड़े पेड़ उखड़ जायेंगे मगर जो झुक कर सब सहन कर लेगा उसका कुछ न होगा ।

लेखक – श्री नरेश मिश्र

ब्लागर मित्रों ऐसी ही कुछ बहस कश्मीर के अलगाववादियों के मानवाधिकार को लेकर मेरी पिछली पोस्ट “कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है“ पर छिड़ी हुयी है । मैं आप सभी प्रबुद्धजनों को इस पोस्ट पर आमंत्रित करता हूं कि आयें और सिंहनाद करें “कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और हम कश्मीर को भारत से कभी अलग नहीं होने देंगे । मुट्ठीभर अलगाववादियों हम भारत के सवा अरब लोग तुम्हारे खिलाफ खड़े हैं ।”

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 4.33 out of 5)
Loading ... Loading ...

33 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

daniel के द्वारा
September 29, 2010

इस लेख और सम्बंधित प्रतिक्रियाओं के द्वारा मेरा काफी ज्ञानार्जन हुआ और मनोरंजन भी आप दोनों को बहुत बहुत धन्यवाद

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    डैनियल जी वंदेमातरम । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

atharvavedamanoj के द्वारा
September 27, 2010

आदरणीय मिश्र जी ब्लॉग पर आया तो किसी दुखद घटना के बारे में पता चला ..मिश्रा जी मैं की वह कौन सी घटना है ..क्या आप दुःख की घडी में मुझे भी साथ लेना भूल गए ..वन्देमातरम

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 27, 2010

    नहीं जानता …छुट गया

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    मनोज जी वंदेमातरम ! दुख की इस घड़ी में आपके साथ से धैर्य बंधा । आभार ।

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
September 26, 2010

सर यद्यपि मैं कभी इतिहास का छात्र नहीं रहा, फिर मैं इतना कहना चाहूंगा की इतिहास में जहाँ सत्ता धारक की उप्लाभियों का महिमा मंडन किया जाता है, वहीँ दूसरी तरफ कमाजोरिओं और विवादित प्रसंगों को या तो छोड़ दिया जाता है, या फिर उसको दो लाइनों में बाँध दिया जाता है | और इसमे कोई संशय नहीं की चाहे बाबर हो, अकबर, औरंगजेब या कोई और गज़नवी और अन्य सबमे एक बात जो सामान थी सब के सब धर्मांध और दमनकारी विचारधारा के रहे | आप दोनों मिश्र जी को बधाई ……. जय हिंद ….

    kmmishra के द्वारा
    September 26, 2010

    शैलेष जी वंदेमातरम ! आपने ठीक कहा है । असल में भारत में इतिहास लेखन का काम एक योजना के तहत किया गया है । और इस योजना को अंजाम दिया है नेहरू और उनके कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने । लेकिन इतिहास के दूसरे पक्ष को छिपाया नहीं जा सकता है क्योंकि उसके भी सैकड़ों हजारों पुरातात्विक और ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं । समकालीन इतिहासकारों के लिखे को तो नहीं काटा जा सकता ।

    daniel के द्वारा
    September 29, 2010

    अकबर को तो छोड़ देते शैलेश जी !

Y.DUBEY के द्वारा
September 26, 2010

आदरणीय मिश्र जी, आपके हास्य व्यंग लेखन का तो मै हमेशा से ही कायल रहा हूँ. लेकिन जिस तरह से आपने रास्त्रहित जैसे मुद्दे को जिस बेहतरीन तरीके से उठाया है है वो काबिलेतारीफ है आप से पहले इन विषयों पर मैंने बहुत से आलेख पढ़े पर आप पहले शख्स है जिन्होंने इसे बहस का स्वरुप दिया और एक सार्थक परिणाम ये हुआ की लोग क्या सोचते है और उनका नजरिया क्या है और यदि वो गलत है तो क्यों है का आभास हुआ .कितनो लोगो ने अपने नजरियों को रखा जो की किसी द्वारा सुनी हुई या अप्भ्रन्सित है, जैसे की सोमनाथ आक्रमण के बारे में, तुलसीदास के बारे में ,अयोध्या के बारे में , काशी विश्वनाथ के बारे में इत्यादि, ये उनका अल्पज्ञान नहीं है वरन यह एक सोची समझी साजिश का परिणाम है यह ठीक वैसे ही है जैसे की हिटलर को क्रूर करार दिया गया और उसी कालखंड के नागासाकी और हिरोशिमा के दोषियों का नाम हम और आप नहीं जानते है .विदेशी इतिहासकारों ने अपने मन मुताबिक इतिहास से छेड़छाड़ की.हमारे यहाँ भी उसी तरह के लोग मौजूद है आपने एन सी आर टी की किताब तो पढ़ी ही होगी उठा कर देखिये बाबर, अकबर, औरंगजेब की महानता के इतने किस्से मौजूद है की खुद बाबर भी सरमा जाये, और गीता प्रेस सम्प्रदायक है, आशा करता हूँ की पूज्यनीय नरेश मिश्र के सानिध्य में रहकर ये मिश्र द्वय हमें इसी तरह से इतिहास से अवगत करते रहेंगे.

    K M Mishra के द्वारा
    September 26, 2010

    आदरणीय दुबे जी वंदेमातरम ! आपने ठीक कहा कि आज एन सी ई आर टी की इतिहास की किताबों में मध्यकालीन भारत को बहुत ही गरिमामय तरीके से वर्णित किया गया है । मेरे कुछ परिचित इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर हैं । उनसे इधर चर्चा के दौरान पता चला है कि तमाम नये शोधकार्य और इतिहास लेखन का काम औरंगजेब को सेकुलर घोषित करने के लिये किये गये है और किये जा रहा है । उसके द्वारा तोड़े गये मंदिरों का कारण धर्मांधता नहीं बल्कि राजनैतिक था यह सिद्ध किया जा रहा है । इस सबके पीछे आजादी के बाद इतिहास लेखन मे नेहरू जी की सोच काम करती है । आजादी के बाद कम्युनिस्ट विद्वानों को इतिहास लेखन का काम सौंपा गया जिन्होंने ने इतिहास को अपने नजरिये से देखा । यह तो सबको मालूम ही है कि भारतीय कम्युनिस्टों की वफादारी सदैव से ही चीन और सोवियत रूस के साथ रही है । भारत का विभाजन क्यों होना चाहिये इसके लिये भी इनके पास तब एक फुलप्रूफ सिद्धांत था । इनको भारत की अखण्डता से कोई मतलब न था । इनको सोवियत संघ से आयातित अपने सिद्धांतों की पड़ी थी । इसलिये इन्होंने जिन्ना को खुला सर्मथन दिया । इनकी निगाह में कम्युनल सिर्फ हिंदू होता है । नेहरू जी ने इनको इतिहास लेखन क काम सौंप कर बहुत बड़ी गलती की । जिस तरह अंग्रेजों का एक ही लक्ष्य था – भारतीय को उनके गौरवमयी इतिहास की जानकारी न होने दो वही लक्ष्य इनका भी था । अब आप देखें कि भारत का इतिहास प्राचीन इतिहास में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से शुरू होता है । ठीक है । लेकिन यह इतिहास हम पिछले कई दशक से पढ़ते आ रहे हैं । इसमें हाल के वर्षों में हुयी खोजों का कोई जिक्र नहीं है । प्राचीन इतिहास में हमारे गौरवमयी क्षणों को एडिट कर दिया गया लेकिन मध्यकालीन इतिहास को मैग्नीफाई करके वर्णित किया गया । वह भी भारत पर आक्रमण करने वालों का यशोगान करते हुये । मराठों और राजपूतों की वीरता को तुच्छ दिखाया गया लेकिन औरंगजेब महान हो गये । आधुनिक इतिहास में सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस है और गांधी-नेहरू । आधुनिक इतिहास के तामम दूसरे स्वतंत्रता सैनानियों को एक एक पैरे में समेट दिया गया जैसे उनका योगदान कांग्रेस के आगे समुद्र के आगे बूंद । जिन कम्युनिस्टों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कुत्ता कहा हो वे इतिहास लेखन में कितनी ईमानदारी बरतेेंगे इसका अनुमान तो एक बच्चा भी लगा सकता है । इतिहास को लेकर तमाम षडयंत्र रचे गये । एन डी ए की सरकार में जब मानव संसाधन मंत्री डा0 मुरली मनोहर जोशी ने इन सबको इतिहास लेखन के काम से बेदखल कर दिया तब ये माननीय सुप्रीम कोर्ट की शरण में गये और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी इनके तर्कों को नकार दिया था । तब ये मीडिया में भगवा इतिहासकरण का रोना रोने लगे । आज भारत में जो सरकारी इतिहास है वही असली इतिहास है । अगर आप इससे जरा सा भी इधर उधर हुये तो किसी भी प्रतियोगिता में नंबर न पायेंगे । पूरी की पूरी पीढ़ी को भटकाने का प्रयास किया जा रहा है । इतिहास के नाम पर सिर्फ मध्यकाल है और उसके बाद कांग्रेस और गांधी-नेहरू ।

K M Mishra के द्वारा
September 26, 2010

माफी चाहता हूं कि चाह कर भी हाल में आयी टिप्पणियों का जवाब नहीं दे पा रहा हूं । एक रिश्तेदार कई दिनों से आई सी सी यू में भर्ती थीं । कल का सारा दिन उनके ही साथ निकल गया और अभी जब टिप्पणियों का उत्तर देने बैठा हूं तो खबर आयी है कि भोर में उनको देहांत हो गया है । श्री नरेश मिश्र जी का जवाब श्रद्धेय एस पी सिंह की टिप्पणी पर कल ही मिल गया था । लौट कर चस्पा करूंगा ।

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    September 26, 2010

    मिश्रा जी अभिवादन, मिश्रा जी ये जानकर बहुत दुःख हुआ. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे. ईश्वर उनके सभी आत्मीय जनों को इस दुःख से उबरने की आत्मिक और मानसिक शक्ति प्रदान करे.

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 26, 2010

    प्रिय मिश्रा जी अभी यहाँ आया तो यह दुखद समाचार ज्ञात हुआ . भगवान उनकी आत्मा को शांति दे व उनके प्रिय जनों को साहस और सहारा दे दुख की इस घडी में अपनी संवदनाओ सहित हम सब लोग आप लोगो के साथ है .

    kmmishra के द्वारा
    September 26, 2010

    आदरणीय बाजपेई जी और सिद्दिकी जी आप दोनों की संवेदनाओं के लिये आभारी हूं । मरने वाला तो मुक्त हो जाता है पर उसके करीब के लोगों को उसे भुलाने में बहुत देर लगती है । परमपिता उनको अपनी गोद में जगह दे और उनके परिजनों को इस महान दुख को सहन करने की शक्ति दे ।

    ARVIND PAREEK के द्वारा
    September 27, 2010

    मिश्रा जी, यह दूखद समाचार पढ़कर मन अशांत हो गया । जानता हूँ कि इस धरती पर प्रत्‍येक जीव के भाग्‍य में यह बदा है । फिर भी……. भगवान उनकी आत्मा को शांति दे व उनके प्रिय जनों को दुख की इस घडी में साहस और सहारा दे कि वे अपने दुख को सह पाएं । दूख की इस घड़ी में हम सब लोग आप लोगो के साथ है । अरविन्‍द पारीक

chaatak के द्वारा
September 25, 2010

प्रिय मिश्र जी, महान समाज सुधारक मर्यादा पुरुषोत्तम श्री बाबर जी महाराज (मैं ऐसा ये महसूस करने के लिए लिख रहा हूँ ताकि समझ सकूं कि उन लोगों के मन में कौन सा भय छिपा बैठा होता है जिसके कारण वे सच बोलने से कतराते और आताताइयों का पक्ष लेते हैं) के हम बेहद शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने अपने राह में आने वाले सभी मंदिरों को नहीं तोडा और कुछेक मठों को ही तोड़ फोड़ कर हमें अनुग्रहीत किया| ५०००० लोगों ने ५००० सैनिकों का विरोध क्यों नहीं किया सवाल क्या स्वयं अपना जवाब नहीं है? आम आदमी क्या सैनिकों से लडेगा विश्व के किस कोने में जनता ने हथियार बंद सैनिकों से युद्ध किया है ? और अगर किया है तो मैं भी उस इतिहास को जानना चाहूंगा क्योंकि वह इतिहास हमारे वर्तमान कश्मीर के लिए उद्धरण होंगे जहाँ गिनती के भाड़े के टट्टू घुस का लाखों लोगों के सर पर मौत का तांडव करके चले जाते हैं या फिर चन्द अलगाव वादी घाटी में हमारे सैनिकों के लिए चुनौती बन जाते है | गिनती का फर्क कभी भी युद्ध पर नहीं पड़ता | युद्ध पर प्रभाव पड़ता है सिर्फ नेतृत्व का | बाबर के आक्रमण के समय भी यही हुआ था हमारा नेतृत्व या तो भगवान् भरोसे बैठा था या फिर कमजोर था जिसके पास संगठन की क्षमता ही नहीं थी बिलकुल आज के राजनेताओं की तरह जिनके पास न तो संगठन की क्षमता है न सरदार पटेल जैसा चरित्र वर्ना कश्मीर नहीं पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक ही बात कहनी थी- ‘क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा !’ मिश्र जी, श्री नरेश मिश जी को मेरा भी आभार ज्ञापित कीजियेगा| आपकी एक और हुंकार सुनकर अत्यंत हर्ष हुआ| वन्दे-मातरम!

    kmmishra के द्वारा
    September 26, 2010

    महान समाज सुधारक मर्यादा पुरुषोत्तम श्री बाबर जी महाराज । चातक जी वंदेमातरम । आपने सेकुलर इतिहासवेत्ताओं के कानों को मधुर लगने वाला सम्बोधन बाबर को दिया है । हम जो इतिहास पढ़ते हैं उसमें कहीं भी मध्यकालीन युग की बर्बरता पढ़ने को नहीं मिलेगी । मगर अगर उसी वक्त के समकालीन इतिहासकारों ने मुस्लिम इतिहासकारों और यूरोपियन यात्रियों और इतिहासकारों ने इस विध्वंस और बर्बरता का जिक्र किया है । इस्लामिक काल में हजारों हजारों मंदिर तोड़ दिये गये तो कुछ बुरा न माना गया क्योंकि इस्लाम काफिरों का धर्म परिवर्ततन करने की और बुतों को तोड़ने की इजाजत देता है मगर एक बाबरी मस्जिद तोड़ दिये जाने पर हजारों साल से समन्यवादी सहिष्णु हिंदू कौम कम्युनल हो जाती है क्योंकि हमारे यहां किसी भी धर्म के धार्मिक स्थल को तोड़ने की मनाही है । उसके बाद न सिर्फ पाकिस्तान और बंग्लादेश में बल्कि भारत में भी सैंकड़ों की संख्या में मंदिर तोड़ दिये गये तब भी अगला कम्युनल न हुआ । इट्स हैप्पन ओनली इन इंडिया ।

Arvind Pareek के द्वारा
September 25, 2010

प्रिय श्री कृष्‍ण मोहन मिश्र जी, आपका पुरा नाम लिखनें की दृष्‍टता इसलिए कर रहा हूँ क्‍योंकि परम आदरणीय माननीय श्री नरेश मिश्र जी की लेखनी से निकलें शब्‍दों को आपके माध्‍यम से पढ़ पा रहा हूँ व उनके ज्ञान से कुछ अर्जित भी कर रहा हूँ । परम आदरणीय माननीय श्री नरेश मिश्र जी के विचारों पर टिप्‍पणी करने लायक मैं स्‍वयं को नहीं समझता हूँ । हॉं आपकी पोस्‍ट कश्‍मीर भारत का अभिन्‍न अंग है पर टिप्‍पणी पहले ही दे चुका हूँ । और आपकी इस पोस्‍ट के कारण उपेन्‍द्र स्‍वामी जी की पोस्‍ट को भी मेरी दो टिप्‍पणियां मिल गई हैं । गुजरात के नाथ के लिए आपका आभार व साधूवाद । अरविन्‍द पारीक

    kmmishra के द्वारा
    September 26, 2010

    पारीक जी वंदेमातरम ! आप, श्री नरेश मिश्र, रमेश बाजपेई जी और मैं हम सभी व्यंगकार हैं । पिछली दो पोस्टें थोड़ी गरमा गरम हो गयीं थीं लेकिन राष्ट्रहित से समझौता करना मैं सीखना नहीं चाहता हूं । व्यंजना को छोड़ कर अभिदा पर उतर आया था लेकिन अंत में औकात पर ही लौटना है और व्यंगबाजी चालू रखी जायेगी । नरेश जी राष्ट्रीयस्तर के व्यंगकार हैं । उनको खींच कर ब्लाग पर लाने की कोशिश हो रही है । वो 76 साल की उम्र में नेट पर तो नहीं आयेंगे हां उनसे नियमित व्यंग लिखने का निवेदन कर रखा है और जल्द ही वे ब्लाग के लिये अपनी बेबाकी शैली में व्यंग देंगे । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

आर.एन. शाही के द्वारा
September 25, 2010

श्रद्धेय मिश्रा जी, माननीय टिप्पणीकार महोदय की गम्भीरता पर शायद किसी भी पढ़ने वाले का ध्यान नहीं गया है । अपने तर्क़ में भारतीय परम्परागत रीति निभाने के संदर्भ में मायके में प्रथम शिशु के जन्म हेतु उन्होंने माता कौशल्या की जगह माता सीता को भेज दिया है । अब बाद में कहीं उन्होंने खेद प्रकट किया अथवा नहीं, ये मेरी जानकारी में नहीं है । अच्छे प्रस्तुतिकरण के लिये बधाई ।

    Ramesh bajpai के द्वारा
    September 26, 2010

    आत्मीय शाही जी यह तर्क मै आपको बताना भूल ही गया था हसी तो बहुत ही आई पर करता क्या .सुधि पाठको ही बाते तो सुननी ही पड़ती है .

    kmmishra के द्वारा
    September 26, 2010

    आदरणीय शाही जी वंदेमातरम ! अरूण जी ने उपरोक्त टिप्पणी में एक नहीं कई गलत उद्धरण दिये हैं । जैसे ‘विनय चरितावली’ को उन्होंने गोस्वामी जी की आत्मकथा लिखा है जब कि गोस्वामी जी ने न ही अपनी कोई आत्मकथा ही लिखी है और नहीं इस नाम से कोई ग्रंथ । उन्होंने ‘विनय पत्रिका’ और ‘गीतावली’ को मिला कर एक नया ग्रंथ सृजित कर दिया । इसके अलावा न तो कभी गोस्वामी जी को जाति बहिष्कृत किया गया था और न ही उन्होंने किसी मस्जिद में कभी रात बिताई थी । इसके बारे में श्री नरेश जी ने विस्तार से बताया है । गलती अरूण जी की भी नहीं है इतिहास लेखन का काम ही इसी नजरिये से किया गया है ।

Dharmesh Tiwari के द्वारा
September 25, 2010

के एम् मिश्र जी नमस्कार,अलगाववादियों को ललकारना अच्छा लगा,इसमें मै भी आपके साथ हूँ,आखिर कश्मीर भारत का अंग ही नहीं इसका ताज भी तो है,धन्यवाद

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    धर्मेश जी आपके सिंहनाद ने मेरे लेख का उद्देश्य पूरा कर दिया । अब यह आग बुझनी नहीं चाहिये । जय हिंद ।

s p singh के द्वारा
September 24, 2010

प्रिय मिश्र जी रोचक तथ्यों को एक माला में पिरोने के लिए धन्यवाद,——–श्री नरेश मिश्र जी का यह कथन की “महमूद गजनवी ने जब गदा की चोट से सोमनाथ शिवलिंग तोड़ने के प्रयास किया था तब पुजारियों और हिंदू सामंतों ने उससे अनुरोध किया था कि वह शिवविग्रह न तोड़े । इसके बदले में वे गजनवी को मुंह मांगी दौलत देने को तैयार थे । लेकिन गजनवी ने दो टूक जवाब दिया था कि वह तवारीख में बुतों का सौदागर नहीं बुतशिकन कहा जाना पसंद करेगा “——-तथ्यों से परे है क्योंकि जिस समय दिसंबर १०२४ में केवाल पाँच हजार सौनिको के साथ हमला किया था उस समय वहां ५० हजार व्यक्ति थे और उसने इन सब को ही क़त्ल कर दिया था —-ऐसा क्यों हुआ यह सब इतिहास के पन्नो में दर्ज है ——-दूसरी बात यह की नाम को उल्टा सीधा लिखने से कोई फर्क नहीं पड़ता और नहीं इससे उस लुटेरे का अपराध कम होगा, —– वह २ नवम्बर ९७१ में पैदा हुआ था और ३० अप्रैल १०३० में इस दुनिया से बिदा हो गया था उसका पूरा नाम था Yamin-al-Dawalah Abd-al-Mohmad- Ibn-Sebuk Tegin – जो Mahmud Ghazanawi के नाम से मशहूर हुआ – जन्म स्थान GAZANI जो की अफगानिस्तान में स्तिथित है — अब सोचने के बात यह है की क्या उस समय ५०००० लोगों ने विरोध क्यों नहीं किया उन ५००० की फ़ौज से —यह मै नहीं कह रहा हूँ यह सब इतिहास में लिखा है /

    K M Mishra के द्वारा
    September 26, 2010

    इब्न का अर्थ होता है बेटा । महमूद गजनवी सुबुक्तगीन का बेटा था । उसको मुहम्मद गजनवी कहना ठीक नहीं है । टिप्पणीकार ने उसका पूरा नाम लिखा है जो सही है । लेकिन हम मोहम्मद को गजनवी के साथ मिलाना ठीक नहीं समझते । महमूद गजनवी के बारे में ज्यादातर बयान मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखे हैं । वे अपने शासक और इस्लाम की तारीफ में बढ़ा चढ़ा कर लिखने को उत्साहित थे । इसलिये उनके बयानों को पूरी तरह प्रमाणिक मान लेने का कोई मतलब नहीं है । मैंने जिन पुस्तकों का हवाला दिया है (फिरदौसी लिखित ‘शाहनामा’ और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी द्वारा लिखे गये कई खण्ड में ग्रंथ ‘गुजरात के नाथ’ । कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी सिर्फ एक कांग्रेसी नेता ही नहीं थे वे उच्चकोटि के विद्वान और इतिहासवेत्ता भी थे ।) उन्हें पढ़ने पर सोमनाथ विध्वंस के सम्बन्ध में संतुलित जानकारी मिल सकती है । मैं एक और पुस्तक ‘कससे हिंद’ का उल्लेख करना चाहता हूं । इस पुस्तक के लेखक एक मुस्लिम इतिहासकार हैं । उन्होंने कई खण्ड में यह किताब लिखी है । महमूद गजनवी का जो कथन मैंने उद्धृत किया है उसे इस किताब में देखा जा सकता है । मुस्लिम इतिहासकारों का यह विवरण हास्यास्पद है कि मुहमूद गजनवी सिर्फ 5000 सैनिकों के साथ सोमनाथ मंदिर तोड़ने के लिये निकला था और 50000 हिंदुओं ने उसका विरोध नहीं किया । मैं पहले भी निवेदन कर चुका हूं कि आक्रमणकारी गजनवी का विरोध किया गया था और उस दौरान बहुत से हिंदुओं ने अपने प्राणों की आहुति दी थी । अगर कोई मुस्लिम इतिहासकारों के बयानों को हर्फ ब हर्फ मंजूर करने की जेहनियत रखता है तो उसे समझाया नहीं जा सकता है । इस्लामी फौज के अंदर मजहबी जुनून था । जुनून के आगे संख्याबल हमेशा नाकाम साबित होता है । खासतौर से जुनून अगर मजहब से जुड़ा हो तो उसकी ताकत दोबाला हो जाती है । महमूद गजनवी के सम्बन्ध मे इमानदारी से विवेचना करने की जरूरत है । मंदिरों को तोड़ने में आर्थिक लालसा के अलावा उसका मजहबी जुनून एक बड़ा कारण था । नरेश मिश्र

Ramesh bajpai के द्वारा
September 24, 2010

प्रिय मिश्रा जी तमाम तथ्यों को समेट कर इतिहास को प्रस्तुत करती इस पोस्ट का स्वागत है मै परम विद्वान् व इतिहास मर्मग्य आदरणीय श्री नरेश चंद जी के चरण स्पर्श करता हु . एवम उनके सहयोग का आभार व्यक्त करता हु . मिश्रा जी अरुण कान्त जी प्रतिक्रिया मैंने आप के लिए ही छोड़ी थी . मुझे ख़ुशी है की आपने इस दायित्व का निर्वाह बहुत ही कुशलता से किया . आपके लिए बहुत आशीर्वाद

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    बाजपेई जी प्रणाम । नरेश जी तो हमारे प्रेरणास्त्रोत हैं ही । हम सबको मिल कर कम्युनिस्ट इतिहासकारों द्वारा फैलायी गयी गंदगी को साफ करना चाहिये ताकि जनमानस में जो राष्ट्रविराधी भावनाएं फैलाई जा रही हैं उसको रोका जा सके । अभार ।

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
September 24, 2010

रोचक था आपका लेख पर अब कुछ चीज़े पढ़ी सी लगी……………. किन्तु लेखक का नाम लिख कर किसी वरिष्ठ ब्लोगर के लेख की समीक्षा उचित नहीं है…………… ब्लॉग का नाम लिख कर भी काम चल सकता था…………….. हार्दिक बधाई………

    Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
    September 24, 2010

    बाजपाई जी (क्षमा प्रार्थी हूँ नाम लिखने के लिए) के पक्ष को मजबूत करने के लिए बधाई देना भूल गया था………… क्षमा प्रार्थी हूँ…….

    kmmishra के द्वारा
    September 26, 2010

    पियूष जी आपकी बात से सहमत हूं क्योंकि यह वैचारिक द्वंद है । इसमें किसी के नाम का उल्लेख करने या ना करने सा कोई फर्क नहीं पड़ता। आगे से ध्यान रखूंगा । आभार ।

daniel के द्वारा
September 24, 2010

प्रतिक्रिया और प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया पढ़कर मज़ा आया……………… इतिहास का जानकार नहीं हूँ इसलिए ज्यादा कुछ नहीं कह सकता …………………इतना अवश्य कहूँगा कि दोनों ही प्रबुद्ध लेखको ने अपना अपना पक्ष सुंदर,रोचक व् विचारोत्तेजक ढंग से प्रस्तुत किया है …………………….आशा करता हूँ कि भविष्य में भी इसी प्रकार विचारोत्तेजक लेख पढने को मिलेंगे

    kmmishra के द्वारा
    September 26, 2010

    डैनियल जी वंदेमातरम । आप इतिहास के विद्यार्थी नहीं है लेकिन इस चर्चा को पढ़ कर आपने कोई न कोई निष्कर्श अवश्य निकाला होगा । उस निष्कर्श से हमें जरूर अवगत करायें । आभार ।


topic of the week



latest from jagran