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जग बौराना - कश्मीर में यूपीए का सिजदा

Posted On: 29 Sep, 2010 में

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लेखक – नरेश मिश्र


जवानी में एक अंग्रेजी साइलेन्ट फिल्म देखी थी । उसके मुख्य पात्र दो ऐसे हास्य अभिनेता थे जिनकी लम्बी हैट, तलवारनुमा मूंछे और चपल आंखे देख कर हंसी का फौव्वारा छूट पड़ता था । दोनों बेहद बेवकूफ लेकिन खुद को हर धन्धे में माहिर मानते थे । दोनों ने घड़ीसाज की दुकान खोली।


एक ग्राहक अपनी टेबिल क्लाक लेकर उस दुकान में आया । दोनो ने हैट उतार कर, सिर झुका कर ग्राहक का स्वागत किया । उनकी दुकान पर बड़ी मुश्किल से पहला ग्राहक आया था । ग्राहक ने अपनी घड़ी दिखा कर इशारा किया – क्या इसकी मरम्मत हो सकती है ।


दोनों घड़ीसाजों ने इशारे से बताया – यकीनन इसकी मरम्मत हो सकती है । दोनों घड़ीसाज मिलकर टेबिलक्लाक खोलने लगे । उन्होंने एक-एक कर घड़ी के सारे पुर्जे खोल कर टेबिल पर फैला दिये । खोलने के दौरान घड़ी के कुछ पुर्जे टूट भी गये ।


ग्राहक बड़े गौर से घड़ीसाजों की महारत देख रहा था । दोनो घड़ीसाज एक एक पुर्जा उठाते, उसे गौर से देखते, अपना सिर खुजलाते और एक दूसरे से सलाह करते । ग्राहक बेचैनी से घड़ी की मरम्मत पूरी होने का इंतजार कर रहा था ।


आखिरकार दोनों घड़ीसाजों ने आपस में इशारेबाजी की । उन्होंने ग्राहक से उसका लम्बा हैट मांगा । ग्राहक ने अपना हैट उन्हें दे दिया । दोनों घड़ीसाजों ने घड़ी के अंजर पंजर हैट मे भर दिये । उन्होंने हर एक कील कांटा हैट में रख दिया । उन्होंने हैट ग्राहक को दिया और शालीनता से अपना हैट उतार कर ग्राहक को इशारा किया – इसकी मरम्मत नहीं हो सकती । इसे किसी दूसरे घड़ीसाज के पास ले जायें ।


कश्मीर का हाल बेहाल देखकर हमें दोनों अंग्रेज हास्य अभिनेताओं की याद आती है । फिर हमें उन दोनों की जगह कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेस की शक्ल दिखाई देती है । इन दोनों महान देशभक्त सेकुलर पार्टियों ने कश्मीर के पुर्जे पुर्जे अलग कर देश के सामने पेश कर दिया । देश वह ग्राहक है जो इन दोनों घड़ीसाजों को हैरत से निहार रहा है ।


अब कश्मीर का क्या करें । वह चीनी का खिलौना तो है नहीं कि कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस जैसे बच्चे उससे जब तक चाहें खेलें और जब चाहें खा लें ।

देश के पहले प्रधानमंत्री, पंचशील के प्रचारक, दुनिया के परदे पर महापुरूष की तरह अपनी पहचान बनाने के लिये उधार खाये बैठे पण्डित नेहरू ने पहले ही अपने समकालीन महान नेताओं को आगाह कर दिया था – खबरदार ! नेहरू के आड़े मत आना । मैं कश्मीरी, सारे कश्मीरी मेरे भाई-बन्धु ! कश्मीरियों के बीच कोई तीसरा नहीं आयेगा ।


ललकार सुनकर सरदार पटेल जैसा नेता खामोश रह गये । उन्हें नेहरू की आवाज में मुगले आजम शहंशाह  अकबर के दरबार में तैनात नकीब की आवाज सुनायी दी – खबरदार, होशियार, जुम्बिश न कुन्द होशियारबाश  (जुम्बिश मत करना, होशियार रहना) । शहंशाहे हिन्द, आलमपनाह, महाबली तख्त पर जलवा अफरोज हो रहे हैं ।


कश्मीर की फुंसी नेहरू जी की विरासत है जो अब  कांग्रेसियों को जहरबाद की शक्ल में हासिल हुयी है । सरदार मनमोहन सिंह लाचार हैं । चिदंबरम बेजार हैं । कश्मीर पर पाकिस्तानी एजेंटों और दहशतमन्दों की हुकूमत बरकरार है । हिन्दुस्तानी फौज छावनी में हाथ मल रही है । अर्धसैनिक बलों के जवान पत्थर की चोट खा कर बिलबिला रहे हैं ।


सरकार ने कश्मीर के उफनते दूध में पानी डालने के लिये एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजा था । इसके मेम्बरों में कम्यूनिस्ट सीताराम येचुरी, गुरूदास दास गुप्त जैसे कम्युनिस्ट नेता शामिल थे । याद रहे, ये वही कम्युनिस्टहैं जिन्होंने देश के दो टुकड़े कर पाकिस्तान बनाने के लिये जमीन आसमान का कुलाबा मिला दिया था । अब कम्युनिस्ट बिल्लियां सत्तर चूहे खाकर हज करने का मंसूबा बना रही हैं । कम्युनिस्ट नेताओं ने पासवान के साथ मिलकर अलगाववादी हुर्रियत लीडरों के घर जाने का फैसला किया । वे भारत सरकार के नुमाइन्दे थे । किसी को यह मानने में हिचक नहीं होनी चाहिये कि भारत सरकार अलगाववादियों के सामने सिर झुकाने उनके घर गयी । दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र देशद्रोहियों के सामने सिर झुका रहा था और किसी को शर्म नहीं आयी । मीडिया माहिरों ने बेहद बेशर्मी से मुल्क को बताया कि लोकतंत्र में बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रहता है । बात करने में क्या हर्ज है । गांठ से कुछ जाता नहीं ।


समय बिताने के लिये हमारे बचपन में बच्चे हरि का नाम लेकर अनत्याक्षरी खेलते थे । पोलिटिकल बच्चे भी अनत्याक्षरी खेलते हैं तो कौन सा गुनाह करते हैं । कश्मीर के हालात जस के तस बने रहेंगे । सरकार स्कूल खोलेगी, हुर्रियत सिविल र्कयू लागू करेगा । सरकार कश्मीर पर पानी की तरह पैसे बहायेगी । अलगाववादी एक हाथ से पैसे लेगें और दूसरे हाथ से पत्थर फैंकेगें । सेकुलर को मुस्लिम वोटबैंक आसानी से हासिल नहीं होता । उसके लिये देश को दांव पर लगाना पड़ता है ।


सीताराम येचुरी ने फरमाया कश्मीर में एक खिड़की तो खुली । जनाब खिड़की तो यकीनन खुली । अब देखना है कि उसमें से पत्थर बरसते हैं या आग के शोले ।

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36 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
October 2, 2010

सर ! बिल्कुल सही कहा आपने कश्मीर में फैले हिंसा का एक मात्र कारण है सरकार का अलगाववादियों के सामने बार – बार नत हो जाना, सरकार समाधान नहीं ढूँढना चाहती नहीं तो समाधान शीघ्र ही हो जाता … वंदेमातरम !!!

    K M Mishra के द्वारा
    October 2, 2010

    प्रिय शैलेष जी सरकार कश्मीर समस्या को इस लिये हल नहीं कर पा रही है क्योंकि वह इसे नेहरू के चश्मे से देख रही है जिस दिन इसे लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल के नजरिये से देखा जाने लगेगा उस दिन इस समस्या की जड़ ही समाप्त हो जायेगी । टिप्पणी के लिये आभारी हूं । जय हिंद ।

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
October 1, 2010

समय बिताने के लिये हमारे बचपन में बच्चे हरि का नाम लेकर अनत्याक्षरी खेलते थे । पोलिटिकल बच्चे भी अनत्याक्षरी खेलते हैं तो कौन सा गुनाह करते हैं । बहुत सही कहा आपने………हार्दिक बधाई……

    K M Mishra के द्वारा
    October 2, 2010

    प्रिय पंत जी वंदेमातरम ! ये नपुंसक नेता कश्मीर मुद्दे पर अन्तयाक्षरी खेल रहे हैं और अलगाववादियों और पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली भी बनते जा रहे हैं । जितनी देर करेंगे समस्या और गंभीर होती चली जायेगी । टिप्पणी के लिये आभारी हूं । जय हिंद ।

NIKHIL PANDEY के द्वारा
September 30, 2010

“”खिड़की तो यकीनन खुली । अब देखना है कि उसमें से पत्थर बरसते हैं या आग के शोले”", आदरणीय मिश्र जी सही बात कही है कश्मीर जिसे देश का नेतृत्व अपने आत्मबल से सुलझा सकता है उसे जानबूझकर यक्ष प्रश्न बनाकर लटकाने का काम हुआ है … ये अलगाववादी पत्थर तो कांग्रेस ने ही उनके हाथ में पकडाए है उनके सामने बार – बार गिडगिडा कर ..और जिस खिड़की की बात हो रही है वो तो हमेशा से हमने खोले रखी थी … पर उधर से तो केवल आग और पत्थर ही बरसते रहे… ..ये सोचना चाहिए था हमें की खिड़की को खोलने से पहले पत्थर बाजो को किनारे कर दिया जाये क्योकि वे बात से नहीं मानते . जब ये बात समझ में नहीं आ रही है तो सर तो फूटेगा ही …….. आज ये गाना क्यों गा रहे है……… “”जबसे हम तबाह हो गए . तुम जहापनाह हो गए “” जब ये राग अलापेंगे तो सजदा तो करना ही पड़ेगा भले बार बारे पीछे से लात पड़े … हमेशा की तरह आपका जबरदस्त लेख है

    kmmishra के द्वारा
    September 30, 2010

    निखिल जी वंदेमातरम ! आपकी टिप्पणी पढ़ कर मुझे बहुत खुशी हो रही है । जिस कश्मीर मुद्दे को मानवाधिकार बनाम देश बना दिया गया था उसे मैंने आप लोगों के समर्थन से देश बनाम आंतकवाद बना दिया । आज आप सब लोग एक स्वर कह रहे हो कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और यूपीए सरकार को अगर मुट्ठीभर पाकिस्तान परस्त अलगाववादी झुका सकते हैं तो हम भारत के सवा अरब लोग भी अब चुप नहीं बैठेगें । देश की अखण्डता, एकता और सम्प्रभुता के लिये हम कुछ भी करेंगे ।

Arvind Pareek के द्वारा
September 30, 2010

प्रिय श्री के.एम. मिश्रा जी, आपका कोटिश: आभार की आपनें परम आदरणीय माननीय श्री नरेश मिश्र जी की रचना हमारें लिए इस मंच पर प्रस्‍तुत की । परम आदरणीय मिश्र जी ने ठीक ही कहा है कि जो खिड़की खुली हैं उससे पत्‍थर बरसते है या आग के शोले । यह हमारे देश की नियति रही हैं कि कार्यवाही करने में सक्षम हमारे राजनेता व सरकार फूंसी को फोड़ा व फिर नासूर की शक्‍ल अख्तियार करने देते है । और अंत में चाहते हैं कि मात्र ठंडे पानी के छींटों से यह उफनता दूध शांत हो जाएं । लेकिन भूल जाते हैं कि कभी-कभी उफनतें दूध को आग को बुझा कर ही शांत करना पड़ता है । अरविन्‍द पारीक

    kmmishra के द्वारा
    September 30, 2010

    पारीक जी सादर वंदेमातरम ! आपने बिल्कुल ठीक कहा कि कभी कभी उफनते दूध को आग को बुझा कर ठंडा करना पड़ता है । यूपीए सरकार पैकेज के ठंडे छींटे मार रही है इससे आग शांत नहीं होगी । आम कश्मीरी अमन पसंद है । जिन सड़ती हुयी लाशों ने कश्मीर की आबोहवा को गंदा किया हुआ है उन्हें डिस्पोज करने की जरूरत है बस । कश्मीर अपने आप खुशहाल हो जायेगा ।

AJAI KUMAR AGNIHOTRI के द्वारा
September 30, 2010

भाई मिश्र जी आप का लेख एक कडवी सच्चाई है. आज की वास्तविकता यह है कि कोई भी ईमानदारी से प्रयास करना ही नहीं चाहता है. नहीं तो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल कश्मीरी पंडित समुदाय से क्यों नहीं मिला. उन्हें तो महज मुस्लिम वोटों कि चिंता है. आपने सही कहा कि यह फुंसी नेहरु कि दी हुयी है जो आज जहरवाद और नासूर का रूप ले चुकी है. आज इस समस्या से इतना विकराल रूप ले लिया है कि छोटी मोती गोलिओं और इंजेक्शन से काम नहीं चलने वाला है. सिवाय ऑपरेशन के कोई चारा नहीं. देर सवेर यह कठोर कदम तो उठाना ही परेगा.

    kmmishra के द्वारा
    September 30, 2010

    अजय जी सादर वंदेमातरम ! आपने ठीक कहा सिवाय ऑपरेशन के कोई चारा नहींण् देर सवेर यह कठोर कदम तो उठाना ही परेगाण् अब सर्जरी में कुछ तो खून बहेगा ही । आज श्रीलंका को देखिये । लिट्टे कई दशकों से लंका में गृहयुद्ध की स्थिति बनाये हुये थे । महेन्द्रराजपक्षे ने देखा कि कोई भी देश उनकी मदद को तैयार नहीं है । सब लंका की आग में हाथ ताप रहे थे । तब महेन्द्रराजपक्षे सरकार ने अपने ही खून से महावर रची और पूरी फौज लगाकर लिट्टे को नेस्तनाबूद कर दिया । आज लंका में शांति है । यही काम भारत सरकार को भी करना चाहये । सरकार ने किया भी है, पंजाब सबसे बड़ा उदाहरण है । शांति की बात उससे जो शांति की भाषा समझे जो न समझे वो उसकी भाषा में समझाईये ।

y.dubey के द्वारा
September 30, 2010

पूज्यनीय नरेश मिश्र जी, चार्ली चापलिन की फिल्म हास्य फिल्म है लेकिन यहाँ की परिस्थित तो हास्यास्पद है . जहा तक की मेरी नादाँ सोच का सवाल है तो इसका हल गिल जैसी प्रतिबधता से ही संभव है मुझे लगता है की पंजाब की समस्या इससे भी गंभीर थी डंडा राज ही सही समाधान है , और एक महत्वपूर्ण कदम ये होना चाहिए की हिन्दू को वोट बैंक में बदलो फिर देखो कैसे तलवे चाटते है कांग्रेस और वामपंथी

    kmmishra के द्वारा
    September 30, 2010

    दुबे जी वंदेमातरम ! अपनी उम्दा सोच को नादान मत कहिये । वास्तव में लातों के भूत बातों से नहीं सुधरने वाले और तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों से भी सवाल जवाब करना होगा ।

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
September 30, 2010

प्रिय मिश्रा जी, सही ही कहा है आप ने – हिन्दुस्तानी फौज छावनी में हाथ मल रही है । अर्धसैनिक बलों के जवान पत्थर की चोट खा कर बिलबिला रहे हैं । और सरकार सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेज कर केवल बातचीत में ही लगी। यदि यह मुद्दे बातचीत से ही सुलझते तो आज यह मामला नशतर की शक्‍ल न इखतियार करता। हर कुर्सी पर बैठने वाली सरकार का पहला मक्‍सद होता है मेरी कुर्सी बची रहे और आग जलती रहे और हम कहते रहेंगे की भई बुझाने की कोशिश जारी है। पर यह कोई नही कहता है लो यह आग बुझा दी। मिश्रा जी, यह एक एक बाल्‍टी पानी से बुझने वाली आग नही है यहा तो जब तक सौलाब न छोड़ा जाएगा यह आग न बुझेगी। दीपकजोशी63

    kmmishra के द्वारा
    September 30, 2010

    जोशी जी सादर वंदेमातरम ! आज आम भारतीय यही सोच रहा है जो आप सोच रहे हैं । कब तक हमारे जवान कश्मीर में पाकपरस्त अलगाववादियों के पत्थर खाते रहेंगे । कब तक सरकारें तुष्टिकरण की नीति पर चलती रहेंगी । कब तक ये बिना रीढ के केचुए अलगाववादियों के घर जा कर सिजदा करते रहेगें । अब हमें यह सवाल राहुल बाबा और उनकी पार्टी से पूछना चाहिये साथ ही पूछना चाहिये पासवान और गुरूदास दास गुप्त जैसे सांप्रदायिक नेताओं से भी ।

chaatak के द्वारा
September 29, 2010

प्रिय मिश्र जी, श्री नरेश मिश्र जी के विचारों को मंच पर रकने का कोटिशः धन्यवाद ! यहाँ मैं श्री नरेश मिश्र जी का आभार भी प्रकट करना चाहूंगा जो वे हमारे लिए इतिहास में कालापानी की सजा काट रहे तथ्यों पर प्रकाश डाल कर हिन्दुस्तानियों को आज़ादी के समय से लेकर आज तक की राजनैतिक लिप्सा और कमजोर चरित्र वाले नेताओं की करतूत बता रहे हैं | सच तो ये है कि कुछेक बुद्दिजीवियों को दर से आज भी इतिहास से कुछ पन्ने सुरक्षित बचे हैं वर्ना कांग्रेस कब की दीमक बनकर उन पन्नो को भी चाट जाती | काश्मीर कभी भी समस्या का सबब रहा ही नहीं काश्मीर को तो समस्या बनाया गया नेहरु ने फुंसी को जन्म दिया और उनके उत्तराधिकारियों ने उसे नासूर बना दिया | एक तरफ ये मुसलमानों के जज़्बात से खेलते रहे और उन्हें महज़ वोट बैंक बना कर रखा और दूसरी तरफ हिन्दुओं की सहिष्णुता का फायदा उठाते हुए नेहरु ने अपने नाम के आगे आजन्म पंडित लगा कर उनकी जड़ों में भी मट्ठा डालने का काम किया| ऐतिहासिक तथ्यों के साथ कश्मीर मुद्दे पर सरकार की कलुषित मानसिकता को उजागर करने के लिए आप को व श्री नरेश मिश्र जी को हार्दिक धन्यवाद!

    chaatak के द्वारा
    September 29, 2010

    को दर * = के डर

    kmmishra के द्वारा
    September 30, 2010

    चातक जी सादर वंदेमातरम ! जिन नेहरू की बचकाना नीतियों ने कश्मीर को आज नासूर बना दिया है उनके जीजा और विजय लक्ष्मी पंडित के विद्वान पति स्व0 रणजीत पंडित ने ही सबसे पहले राजतरंगिणी का अंग्रेजी में अनुवाद किया था (वह एक बड़ा मजेदार किस्सा है) फिर उसके हिंदी और दूसरी भाषा में अनुवाद हुये । बड़ी जल्दी ही कश्मीर का लंबा इतिहास आप सभी को पढ़ने को मिलेगा ।

atharvavedamanoj के द्वारा
September 29, 2010

वन्देमातरम मिश्रा जी फारसी में एक कहावत है….एकाएक ही याद हो आया ..दरमियाने कअरे दरिया,तख्ताबंदम कर दइ..वाज मी गोई की दामन तर मकुन हुशियार वाश..अर्थात ये नाविक तूने मुझे नदी के बीच लाकर पटक दिया है..और कहता है देख हुशियार रहना तेरा दामन गीला न होने पाए …कश्मीर की यही स्थिति हो गयी है की लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई..वन्देमातरम …एक बेहतरीन लेख

    kmmishra के द्वारा
    September 30, 2010

    वंदेमातरम ! मनोज जी । आपकी यह फारसी की कहावत जब श्री नरेश मिश्र को सुनायी तो वो बहुत खुश हुये और कहने लगे कि ब्लागिंग की दुनिया में प्रबुद्ध लोगों की कमी नहीं है । उन्होंने आप सब को आशीर्वाद भेजा है ।

Anil Gupta के द्वारा
September 29, 2010

मिश्र जी नमस्कार आपका लेख पढ़ कर हर देशवासी मैं गुस्सा हैं पासवान ,येचुरी आदि लीडर को सिर्फ मुस्लिम अलगाववादी लोगो की चिंता हैं .देशभगत कश्मीरी हिन्दू से कोई मिलने कोई नहीं गया .कश्मीर मैं असली मुद्दा कश्मीरी पंडित को वापस कश्मीरी घाटी भेजना होना चाहेही

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    प्रिय अनिल जी वंदेमातरम ! आज यूपीए सरकार की कश्मीर नीति देख कर आम भारतीय गुस्से से उबल रहा है । आपका बहुत बहुत धन्यवाद कश्मीरी पंडितों की याद दिलाने के लिये । आज एक लाख कश्मीरी पण्डित घाटी में अपना घर बार छोड़ कर भारत और दुनिया के दुसरे हिस्से में बंजारों की जिंदगी बसर कर रहे हैं । मुस्लिम वोटों पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों को उनकी जरा भी याद नहीं आयी और वे कश्मीरी पण्डितों को बेघर करने वालों के घर उनकी चरणधूल सिर पर लगाने बड़े उत्साह से चले गये । अब वक्त आ गया है राजनीति के इन असली सांप्रद्रायिक नेताओं से सवाल जवाब करने का । टिप्पणी के लिये बहुत बहुत आभार ।

Aakash Tiwaari के द्वारा
September 29, 2010

आदरणीय मिश्रा जी…. कश्मीर इन राजनेताओं की करतूत से हमारे हाथों से निकल जाएगा और हम कुछ भी नहीं कर सकेंगे…. बहुत ही अच्छा लेख बधाई हो…. आकाश तिवारी

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    प्रिय आकाश वंदेमातरम ! कश्मीर भले ही मुश्किल दौर में हैं लेकिन उसे हम तश्तरी में सजा कर पाकिस्तान को भेंट नहीं करने देंगे । जिस तरह मुंबई हमले के दौरान भारतीय जनमानस ने सरकार पर दबाव बनाया था वैसा ही दबाव सरकार पर फिर बनाने का समय आ गया है । हम सब को एक स्वर में कहना होगा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है । अगर कांग्रेस इसे साल्व नहीं कर सकती है तो सत्ता छोड़ दे । आज कश्मीर को उमर और राहुल जैसे नौसिखियों के हवाले कर दिया गया है । इनके दादा नाना ने कश्मीर समस्या पैदा की ये उसमें और पेट्रोल छिड़क रहे हैं ।

R K KHURANA के द्वारा
September 29, 2010

प्रिय मिश्र जी, इस लेख से यही शिक्षा मिलती है की समय रहते एक कील जो काम कर सकता है समय गुजर जाने के बाद उसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ती है ! आज कश्मीर का भी यही हल हो गया है ! खुराना

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    काका प्रणाम । सही कहा आपने । जिस समस्या को आसानी से 48, 65, 71 में सुलझाया जा सकता था आज उसकी हम भारी कीमत चुका रहे हैं । पाकिस्तान भी अच्छी तरह जानता है कि भारत से सीधा युद्ध लड़ा तो एक पखवाड़े में ही काम तमात हो जायेगा इसीलिये वह हमें कश्मीर में और मुंबई हमले जैसे जख्म देता रहता है । लातों के भूत को बातों से मनाने की कोशिश हो रही है । कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी हमेशा वार्ता की भाषा बोलते रहते हैं । अगला वार्ता करना ही नहीं चाहता । यह आप कब समझेंगे । सांप पालेंगे तो दिन प्रति दिन उसका जहर बढ़ता जायेगा और एक दिन वह डसे का प्रयास भी करेगा । ये सांप तो रोज डस रहा है पर जिनकी आंखों पर शांति की पट्टी चढ़ी है उन्हें न मुंबई हमला याद आता है, न कश्मीर, न भारत में फैलते सिमि और इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठन ।

nishamittal के द्वारा
September 29, 2010

काश्मीर का हल क्या हो सकेगा?यद्यपि भविष्यवाणी तो नहीं की जा सकती और वैसे भी राजनीती में कुछ भी स्थाई नहीं.फिर भी हमारे कर्णधारों को पहले मामले उलझाने होते हैं,फिर वो अनसुलझे विषय उनकी पकड़ से बाहर हो जाते हैं.

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    निशा जी वंदेमातरम ! कश्मीर अभी इतना नहीं उलझा है कि हम हताश होने लगें । अगर इन नपुंसक सत्ताधारियों से कश्मीर मसला सुलझ नहीं रहा है तो सब कुछ भारतीय सेना पर छोड़ दें । वह कश्मीर समस्या की जड़ (पाकिस्तान) ही काट डालेगी । हमें सरकार पर कश्मीर को लेकर दबाव बनाने की जरूरत है । इन काले अंग्रेजों को यह नहीं लगना चाहिये कि भारतीय जनमानस कश्मीर को लेकर गहरी नींद में है और वे शांति की बात करते करते कश्मीर से हाथ ही धो बैंठे । हमें सरकार पर दबाव बनाना होगा कि वह मुट्ठी भर अलगाववादियों के सामने घुटने न टेके बल्कि उनके घुटने तोड़ दे ।

daniel के द्वारा
September 29, 2010

जागरण मंच के प्रबुद्ध पाठकों ! राजनीति मेरा विषय कभी नहीं रही , फिर भी कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अपने विचार रखने की हिमाकत कर रहा हूँ…………. अगर कोई गलती हो जाय तो क्षमा करें !! कश्मीर के अधिसंख्य मुसलमान भारत के साथ भावनात्मक रिश्ता नहीं रखते, वही आम भारतीय कश्मीर के प्रति बहुत ही भावनात्मक विचारों / संवेदनाओ से ओत प्रोत है और वे इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ कर देखते है ! अब जबकि कश्मीर के मुसलमानों में भारत से अलग होने की जो भावना बैठ चुकी है, उसे कोई नहीं निकलनहीं पायेगा !! कश्मीर पर कितना ही धन खर्च कर दिया जाये, कोई भी अर्थ्रिक योजना लागू की जाये, उससे कोई फायदा होने वाला नहीं ! कश्मीर हमरे गले में हड्डी तरह फंस गया है जो न निगलते बनता है न उगलते……….

    daniel के द्वारा
    September 29, 2010

    अंतिम लाइन छूट गई है कृपया इसे भी पढ़ें “क्योकि संकीर्ण राजनैतिक हितों के चलते हमारी सरकार कभी भी अलगाव वादियों पर निर्णायक कार्यवाही नहीं कर पायेगी”

    kmmishra के द्वारा
    September 29, 2010

    डैनियल जी वंदेमातरम ! आपकी तरह ही अब भारत के कुछ लोग और सोचने लगे हैं । इसमें आप की कोई गलती नहीं है । पिछले 6 साल से सरकार की कश्मीर पर जो नीति रही है उसके कारण ही कश्मीर आज जल रहा है । आम भारतीय शांति चाहता है । यूपीए सरकार एक नपुंसक सरकार है ऊपर से उसके साथ रहने वाली पार्टियों की विचारधारा भी कायरतापूर्ण है । अभी कश्मीर में गये प्रतिनिधिमण्डल में शामिल कुछ लोग तो मात्र बिहार और बंगाल चुनाव में मुस्लिम मतों को समेटने के लिये वर्ता से इंकार कर चुके अलगाववादियों के घर पर सिजदा करने चले गये। पाकिस्तान बनाने के लिये जिन्ना को समर्थन देने वाले कम्युनिस्ट तो आज भी कश्मीर पाकिस्तान को भेंट करने को आतुर हैं । ये लोग ईंट का जवाब पत्थर से न देकर शांति का राग अलापने लगते हैं और जनमानस में यह संदेश जाता है कि कश्मीर कभी साल्व नहीं हो पायेगा । पर ऐसा है नहीं । कश्मीर गले की हड्डी नहीं है भारत मां का मुकुट है और यह बात भी सरासर गलत है कि वहां के मुसलमान भारत के साथ नहीं रहना चाहते हैं । अगर ऐसी बात है तो दो साल पहले उन्होंने चुनाव में हिस्सा क्यों लिया था । 60 प्रतिशत वोटिंग हुयी थी कश्मीर में । फिर कश्मीर घाटी जम्मू कश्मीर का मात्र 20 प्रतिशत हिस्सा है । 80 प्रतिशत भाग तो जम्मू और लद्दाख है । मात्र 1 या 2 प्रतिशत अलगाववादियों के भौंकने पर सरकार ने उनके सामने घुटने टेक दिये । आपके घर में मच्छर अधिक हो जाते हैं तो आप क्या करते हैं । पहले फिनिट छिड़कते हैं और घर के दरवाजों और खिड़कियों में जाली लगाते हैं ताकि अंदर वाले खत्म हो जायें और बाहर से दूसरे न आयें । कश्मीर में भी यही करने की जरूरत है । आम कश्मीरी अमन पसंद है और वह भारत को अपना देश मानता है । आप निराश न होईये । जरूरत है हम सब को सरकार पर दबाव बनाने की जैसे मुंबई हमले के वक्त बनाया गया था । लोकतंत्र में लोक की आवाज को दबाया नहीं जा सकता है ।

आर.एन. शाही के द्वारा
September 29, 2010

श्रद्धेय मिश्रा जी, प्रणाम! वर्तमान ज्वलन्त समस्या पर एक और ध्यानाकर्षण के लिये बधाई । कश्मीर ने भारत को पूर्व में जो ज़ख्म दिये, और आजतक देता आ रहा है, उसका कोई अंत दिखाई नहीं दे रहा । हर बार वही होता है । वे आग लगाते हैं, हम पानी फ़ेंकते हैं । ऊपर से तुर्रा यह कि मानवाधिकार का उल्लंघन भी सरकार ही कर रही है अपनी सेना के माध्यम से । अब तो समझने वालों को समझ ही लेना चाहिये कि घुटने टेकने वाले मानवाधिकार के लिये चुनौती नहीं बन सकते, क्योंकि दोनों अलग-अलग प्रवृत्तियां हैं ।

    kmmishra के द्वारा
    September 30, 2010

    आदरणीय शाही जी सादर वंदेमातरतम ! कश्मीर भारत का मुकुट है । हम सब को अब सरकार से सवाल करना होगा कि कश्मीर पर आपकी कोई नीति है कि नहीं । या नीति के नाम पर सिर्फ घाटी के मुट्ठीभर अलगाववादियों की चरणधूल अपने माथे लगाते रहना ही है । कब तक अनु0 370 के नाम पर देशवासियों के खून पसीने से दिये टैक्स को तुम तुष्टीकरण की आग में झोकते रहोगे । साफ करो इन मच्छरों को । न सरदार पटेल याद आते हों तो इंदिरा गांधी को ही याद करलो, उनसे कुछ प्रेरणा क्यों नही लेतो हो ।

rkpandey के द्वारा
September 29, 2010

सेकुलर को मुस्लिम वोट बैंक आसानी से हासिल नहीं होता । उसके लिये देश को दांव पर लगाना पड़ता है । परम आदरणीय मिश्र जी, उपरोक्त वाक्यांश को कोट करने का कारण स्पष्ट है. राजनीति का विद्रूपतम रूप उसकी वोटपरस्ती में दिखता है. कश्मीर संकट हो या नक्सली आतंकवाद ये सभी उसी स्वार्थपरक राजनीति के परिणाम हैं. और इनकी चालबाजी देखिए कि कैसे बड़े आराम से ऐसे मुद्दों को आराम से मानवाधिकार, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला दे के अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं. एक सशक्त जनजागरुकता की जरूरत अपरिहार्य है और राष्ट्र की आत्मा का और चीरहरण हो इससे पूर्व ही आंखें खोलना लेनी होंगी. यकीनन दुश्मन बाहरी नहीं बल्कि ये भितरघाती ही हैं जिनसे प्रत्यक्ष खतरा है. देश रो रहा है और ये तबाही का उत्सव मना रहे हैं.

    kmmishra के द्वारा
    September 30, 2010

    पाण्डे जी सादर वंदेमातरम ! आपने सही कहा आज लोकतंत्र, मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी इन आधुनिकयुग के सिद्धांतो का प्रयोग मध्युगीन मानसिकतावादी तथाकथित बुद्धिजीवी हथियार की तरह धड़ल्ले से कर रहे हैं । जरूरत है इनको इन्हीं के हथियार से मात देने की । मैं आवाहन करता हूं विधि, समाजशास्त्र, इतिहास और समाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों को कि वे आयें और इस बहस में अपने ज्ञान की धारदार तलवार से इनके कुतर्कों के चिथड़े उड़ा दें । देश पहले आता है सिद्धांत बाद में आते हैं । आपको जान कर हैरानी होगी कि जिन कम्युनिस्टों ने जिन्ना का सर्मथन किया था उनके पास भी देश के बंटवारे के लिये एक सिद्धांत था । जय हिंद ।

Ramesh bajpai के द्वारा
September 29, 2010

कश्मीर के हालात जस के तस बने रहेंगे । सरकार स्कूल खोलेगी, हुर्रियत सिविल र्कयू लागू करेगा । सरकार कश्मीर पर पानी की तरह पैसे बहायेगी । अलगाववादी एक हाथ से पैसे लेगें और दूसरे हाथ से पत्थर फैंकेगें । सेकुलर को मुस्लिम वोटबैंक आसानी से हासिल नहीं होता । उसके लिये देश को दांव पर लगाना पड़ता है । प्रिय श्री मिश्रा जी कश्मीर की हकीकत को दर्शाती इस पोस्ट के लिए बहुत बहुत शुक्रिया बिल्लियों की रोटी का बन्दर बटवारा कर रहा है .

    kmmishra के द्वारा
    September 30, 2010

    बाजपेई जी सादर वंदेमातरम ! कश्मीर पर सांप्रदायिक यूपीए सरकार की नीतियां देश खूब देख रहा है । जल्द ही इन्हें बिहार चुनाव में इसका जवाब देना होगा ।


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