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अयोध्या फैसला दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है

Posted On: 4 Oct, 2010 में

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यह लेख श्रद्धेय अरूण कांत जी की पोस्ट ” देश में अमन.चैन बनाए रखने की कीमत मत मांगो  “ जिसमें अयोध्या राममंदिर विवाद को लेकर उच्च न्यायालय के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया गया है, में दिये तर्कों का विनम्रता के साथ उत्तर देने का छोटा सा प्रयास है । इस लेख में लाल रंग से लिखी गयीं पंक्तियां अरूणकांत जी के तर्क हैं और नीले रंग वाली पंक्तियों मेरा जवाब है ।

देश के अमन.चैन में सेंध लगाने वाले अमन.चैन बनाए रखने की कीमत के रूप में देश के संविधान, धर्मनिरपेक्ष चरित्र . न्याय प्रणाली और क़ानून व्यवस्था की कुर्बानी माँग रहे हैं ।

आपने बिल्कुल ठीक कहा मुल्ला मुलायम सिंह का बयान – ‘मुसलमान अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं ।’ आपके कथन को सत्य साबित कर रहा है । जब कि अब तक किसी भी मुस्लिम धार्मिक नेता की टिप्पणी इस प्रकार नहीं आयी है । हां धर्मनिरपेक्षता का पाखंड करने वालों की तमाम टिप्पणियां इस मुद्दे पर आ चुकी हैं जिनके पेट पर इस फैसले से लात पड़ी है ।

दुर्भाग्य से अयोध्या में विवादित स्थल के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का फैसला  ।

पहली बार सुन रहा हूं कि अयोध्या मामले पर उच्च न्यायालय के फैसले को किसी ने दुर्भाग्यपूर्ण कहा है । अगर फैसला मस्जिद के पक्ष में आता तब यह दुर्भाग्यपूर्ण न होता । किसी भी मुस्लिम धार्मिक नेता ने कोर्ट के फैसले पर ऐसी टिप्पणी नहीं की पर धर्मनिरपेक्षता का पाखंड करना कुछ लोगों का मौलिक अधिकार है ।

हमारे देश में धर्मस्थल क़ानून है जो 15 अगस्त 1947 की स्थिति को मान्यता देता है ।

इस देश में कानूनों को संसद ने किस तरह से ताक पर रखा है उसके सैकड़ों उदाहरण है । शाहबानों मामला आप अभी तक न भूले होंगे । कानूनो का संशोधन तो हजारों बार इस संसद में हुआ है । अपने राजनैतिक लाभ के लिये सौ बार संविधान का संशोधन कांग्रेस ने किया है । संविधान संशोधनो पर नजर डालें ।

मंदिर टूटे ए मस्जिद टूटे . गिरजा और मठ भी टूटे हैं . लेकिन  इस टकराहट ने गंगा.जमुनी संस्कृति और धार्मिक सहिष्णुता वाले समाज को भी जन्म दिया है,  उसे आगे बढ़ाया है .


आप का कथन सही है । इस देश ने 30000 मंदिरों को टूटते देखा है लेकिन अपनी गंगा जमुनी संस्कृति के लिये और धार्मिक सहिष्णुता के लिये वह इन सब को याद नहीं करता है । करीब 3000 मस्जिदें जो मंदिरो के अवशेषों से ही बनी है आज भी देखी जा सकती हैं । लेकिन हिंदू पिछले 500 साल से अपने आराध्य श्री राम की जन्मभूमि के लिये खून बहा रहा है तो इसलिये क्योंकी वह पिछले 2500 साल से उसे रामजन्मभूमि मानता आ रहा है । ए एस आई की रिपोर्ट जो कि उच्चन्यायालय के फैसले में एनेक्स है उसको पढ़ने की जहमत उठायें ।

राम मिथकीय पुरुष हैं , न कि ऐतिहासिक ।

ऐसा एक षडयंत्र के तहत जयचंद इतिहासकारों की फौज कहती आयी है । रामजन्मभूमि संघर्ष का इतिहास 500 वर्ष पुराना है लेकिन क्या इसका जिक्र किसी एन सी ई आर टी की किताब या आजादी के बाद लिखी कम्युनिस्ट इतिहासकारों की किताब में मिलता है । नहीं मिलता है । इसीलिये देश चकित है ए एस आई की खोज जिस पर न्यायालय का निर्णय आधारित है । इसके आलावा कोर्ट ने नीचे दी गयी समकालीन इतिहास की किताबो को साक्ष्य माना है जिसमें राममंदिर ध्वंस का जिक्र आता है । जबकि जयचंद कम्युनिस्ट इतिहासकार इन तथ्यों को बड़ी खूबसूरती से छिपा गये ।

1.         बाबरनामा

2.         हुमायंनामा

3.         तुजुक ए जाहांगीरी

4.         तारीख ए बदायुनी

5.         तारीख ए फरिश्ता

6.         आईना ए अकबरी

7.         तकवत ए अकबरी

8.         वाकियात ए मुस्तकी

9.         तरीख ए दाऊदी

10.       तारीख ए शाही

11.       तारीख ए स्लाटिन ए अफगान

12.       स्तोरिया दो मोगोर डेल – विलियम फिन्च तीर्थयात्री का सफरनामा ।

उपरोक्त समकालीन ऐतिहासिक किताबों में मंदिर ध्वंस का जिक्र आता है ।

1.         अथर्ववेद

2.         स्कंद पुराण

3.         न्रसिंह पुराण

4.         वाल्मीकि रामायण

5.         रामचरित मानस

6.         केनोपनिषद

7.         गजेटियर्स आदि

उपरोक्त किताबों में अयोध्या में राममंदिर का जिक्र किया गया है ।

अब रही बात कि राम मिथकीय पुरूष हैं या ऐतिहासिक तो राम के होने के प्रमाण पूरे भारत में और श्रीलंका में मिलते हैं । वह एक ऐसी शख्सीयत हैं जिनकों न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के दर्जनों देशों में पूजा जाता है । जब राम मंदिर के प्रमाण ए एस आई ने 2500 साल पुराने दिये हैं तो जाहिर है कि राम उससे बहुत पुराने हैं । अगर कम्युनिस्ट इतिहासकार राम को मान लेते तो राममंदिर ध्वंस को  भी मानना पड़ता इसलिये उन्होंने बड़ी चतुराई से राम को ही मिथकीय बना दिया और राम मंदिर को इतिहास से मिटा दिया । कोर्ट का पूरा फैसला पढ़े बिना कोई राय मत बनाईये । ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों को अब नकारा नहीं जा सकता है ।

कोर्ट के सामने विवाद भूमी के स्वामित्व निर्धारण का था न कि इसका कि राम कहाँ पैदा हुए थे । वैसे भी पैदाइश स्थल का स्वामित्व से सीधा संबंध नहीं होता ।

सुन्नी वक्फ बोर्ड कोर्ट के सामने यह साबित करने मे असफल रहा कि यह वक्फ बाबर ने बनाया था या किसी और व्यक्ति ने । इसके अलावा सुन्नी वक्फ बोर्ड इस मामले में 1961 में आया जब कि मामला 1949 से चल रहा था । इसलिये कोर्ट ने कानून के अनुसार ही उनकी सूट को टाईमबार्ड घोषित कर दिया । इसमें कोई अवैधानिक बात नहीं है ।

मस्जिद का वह गुंबद जहां पर रामलला विराजमान हैं वही जगह है जहां पर पिछले 2500 साल से किसी महत्वपूर्ण पवित्र देवता के स्थापित होने का प्रमाण ए एस आई ने दिया है । इसके अलावा हिंदू मंदिरध्वंस के बाद से भी उसी जगह को जन्मस्थान मानता आ रहा है । इसी आधार पर अदालत ने बहुमत से अपना फैसला दिया है । इसमें कोई अवैधानिक बात नहीं है ।

कोर्ट को 1949 में दायर शिकायत का फैसला करना था । यह फैसला 1949 की स्थिति पर ही हो सकता था , ना कि 2010 की स्थिति पर ए जैसा कि कोर्ट ने किया है । इस फैसले में सबसे ज्यादा आपत्तिजनक बात यह है कि ये हिंसा , अराजकता और साम्प्रदायिक राजनीति करने वाली आक्रांता ताकतों के राजनीतिक उपद्रव फैलाने के बाहुबल को कानूनी मान्यता देता है ।

बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आपको हिंदूओं की 500 साल की पीड़ा का जरा भी अनुमान नहीं है । अगर आजभी जरूरत पड़ेगी तो कम

से  कम दस करोड़ हिंदू अयोध्या पहुंच जायेगा । आर एस एस के हस्ताक्षर अभियान में दस कराड़ हिदुओं ने राममंदिर अभियान के लिये हस्ताक्षर किये हैं । कम से कम उन दस करोड़ हिंदुओं की आस्था का तो सम्मान करिये । हिंदू अपने 30000 हजार मंदिरो को भूल गया लेकिन वह अपने तीर्थस्थान रामलला की जन्मभूमि को पिछले 500 साल से नहीं भूला जबकि उसको छिपाने की कम्युनिस्ट इतिहासकरों ने भरसक कोशिश की है । अगर हिंदू 500 साल से रामजन्मभूमि के लिये लड़ रहा है तो अगले 500 साल तक और लड़ सकता है । अदालत ने हिंसा, अराजकता और साम्प्रदायिक राजनीति करने वाली पार्टी के पक्ष को ही सत्य माना है क्योंकि इसके समकालीन ऐतिहासिक साक्ष्य हैं और ए एस आई ने इसकी सैंकड़ों साक्ष्यों के साथ पुष्टि की है जिसे षडयंत्र के तहत जयचंद कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने आजादी के बाद से आज तक भारतीय जनमानस से छिपाया और अब कोर्ट द्वारा साबित हो जाने पर कुर्तक कर रहे हैं जबकि मुस्लिम समुदाय ने बड़े ही शांति और धैर्य का परिचय दिया है । पाखंडी सेकुलर मीडिया और कम्युनिस्ट इतिहासकार ही वास्तव में साम्प्रदायिक हैं जिन्होंने हिंदू जनमानस के साथ आजाद भारत में इतना बड़ा धोखा किया । क्या भारत में अब भी मध्ययुगीन शासन व्यवस्था है ।

कोर्ट ने मान्यता के आधार पर भूमी का बटवारा कर दिया । मालिकाना हक के मामले में मान्यता की दलील को मानकर , उस आधार पर फैसला देना क़ानून और निष्पक्षता के सभी सिद्धांतों के खिलाफ है ।

कोर्ट ने कानून के अनुसार ही बहुमत से फैसला दिया है । शरीयत के अनुसार कब्जे की जमीन पर मस्जिद नहीं बनायी जा सकती है । साक्ष्यों से साबित हो गया है कि मस्जिद के नीचे विभिन्न कालखण्ड में मंदिर रहे हैं । यह कोर्ट ने बहुमत से माना है । इसके आलावा सुन्नी वक्फ बोर्ड उस विवादित ढांचे के मालिकाना हक को भी कोर्ट के सामने साबित नहीं कर पायी इसलिये उसके सूट को बहुमत से कोर्ट ने खारिज कर दिया ।

कोर्ट के फैसले से ऐसा लगता है कि कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ;एएसआईद्ध की रिपोर्ट को अहं महत्त्व दिया है । पर  यह जगजाहिर है कि जिस दौरान याने 5 मार्च 2003 से 5 अगस्त 2003 के मध्य एएसआई ने विवादग्रस्त स्थल की खुदाई की , केंद्र में भाजपानीत गठबंधन की सरकार थी , जिसने इस संस्था के साम्प्रदायिकीकरण में कोई कसर नहीं छोड़ी थी । देश के जाने माने इतिहासकारों ने 28 अप्रैल 2003 को कोर्ट के सामने पेश की गई एएसआई की पहली रिपोर्ट पर ही अपनी आपत्तियां जता दी थीं ।

आप जो कह रहे हैं यह तो किसी मुस्लिम धर्मगुरू ने भी नहीं कहा है । यह कह कर आप देश की शांति व्यवस्था से खेल रहे हैं और एक पक्ष को उकसा रहे हैं और देश को दंगों की आग में झोकने की तैयारी कर रहे हैं ।

रही बात इतिहासकारो की आपत्तियों की तो ये वही जयचंद इतिहासकार हैं जिन्होंने रामजन्मभूमि मंदिर के 500 साल के इतिहास को कभी भारतीय जनमानस के सामने आने नहीं दिया क्योंकि इससे उनकी काली करतूतों की पोल खुल जाती ।

ए एस आई ने विवादित जगह की खुदाई कोर्ट के आदेश से की थी एन डी ए सरकार के कहने से नहीं । (अब आप कोर्ट को साम्प्रदायिक घोषित कर सकते हैं क्योंकि इससे आपके धर्मनिरपेक्षता के पाखंड की दाल नहीं गल रही है ।) ए एस आई ने विवादित जगह के खुदाई के पहले जापान और कनाडा की कंपनियों से संयुक्त रूप से ग्राउन्ड पेनेट्रेटिंग राडार सिस्टम की मदद से पहले विवादित क्षेत्र का सर्वे किया था जिसमें उन्हें उस जगह भारी स्ट्रक्चर के मौजूद होने का प्रमाण मिला था । उसके बाद ए एस आई ने विवादित क्षेत्र में  82  जगह खुदाई की और उन्हें अलग अलग कालखण्ड में तीन मंदिरो के अवशेष मिले थे । सबसे पुराना मंदिर गुप्तकालीन था । ए एस आई की इस रिपोर्ट को ही आधार बना कर कोर्ट ने बहुमत से माना कि उस जगह पर पहले से मंदिर था ।

हाल ही में फैसले के परिप्रेक्ष्य में देश के जाने माने 61 नामचीन इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों ने बयान जारी कर कहा है कि फैसले में कई ऐसे साक्ष्यों का जिक्र नहीं है जो फैसले के विरोध में पेश किये गए थे । फैसले में शामिल तीन जजों में से दो ने कहा है कि बाबरी मस्जिद एक हिंदू ढाँचे के गिराने के बाद बनाई गई । लेकिन ए इन इतिहासकारों का कहना है कि इस मत के विरोध में एएसआई ने जो साक्ष्य प्रस्तुत किये , उन्हें दरकिनार किया गया है । खुदाई में मिलीं जानवरों की हड्डियां और इमारत तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली सुर्खी और चूना से मुसलमानों की उपस्थिति साबित होती है और ये भी साबित होता है कि वहाँ मस्जिद से पहले मंदिर था ही नहीं , जैसे सभी तथ्यों को कोर्ट ने इग्नोर कर दिया है । इन इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों के अनुसार एएसआई की उस विवादित रिपोर्ट को फैसले का आधार बनाया गया है जिसमें खुदाई में खम्बे मिलने का उल्लेख है , जबकि खम्बे कभी मिले ही नहीं थे ।

कोर्ट का निर्णय आने के बाद बेशर्म कम्युनिस्ट जयचंद इतिहासकारों को अब भी अपने किये पर कोई पछतावा नहीं है । और वे अपने समर्थन में उल जलूल बाते बक रहे हैं । ऊपर दी गयीं समकालीन एतिहासिक किताबों में दिये गये राममंदिर ध्वंस और ए एस आई की विशद रिपोर्ट से   पूरी तरह से साबित हो जाता है कि वहां पर हजारों साल से मंदिर था और उसको तोड़ कर मस्जिद का निमार्ण किया गया । इन इतिहासकारों ने  हुमांयुनामा, तुजुक ए जाहांगीरी, बाबरनामा, तारीख ए बदायुनी, तारीख ए फरिश्ता, आईना ए अकबरी, तकवत ए अकबरी, वाकियात ए मुस्तकी, तरीख ए दाऊदी में दिये गये तथ्यों को भारतीय जनमानस से छिपाया और अब भी अपनी काली करतूत पर पर्दा डालने के लिये उल जलूल बक रहे हैं और भारत की न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं जिससे यह साबित होता है कि उनका भारत की न्यायपालिका में कोई आस्था नहीं रही और वह मध्युगीन अरब के कबीलों की तरह ही बर्ताव कर रहे हैं । सही मायने में ये ही लोग मध्ययुगीन तालिबानी हैं ।

रही बात खुदाई में मिले खंभों की तो तालिबानी इतिहासकारों को पूरा जजमेंट पढ़ना चाहिये जो कि नेट पर भी उपलब्ध है । दिये गये एनेक्सचर में खुदाई में पाये गये खंभो के भी चित्र दिये गये हैं ।

यदि एकबारगी मान भी लिया जाए कि बाबरी मस्जिद के निर्माण में उपयोग की गई सामग्री में किसी हिंदू ढाँचे के अवशेष हैं भी तो इसमें अजूबा क्या है । हमारे देश में अनेक इमारतें हैं , जिनमें मुस्लिम , इंग्लिश , फ्रेंच , हिंदू स्थापत्य कला का उपयोग किया गया है ।

यानी की आप चुपके से यह भी स्वीकार करते हैं कि वहां पर हजारों साल पुराना राममंदिर स्थित था । आप बाबरी मस्जिद कभी नही गये हैं इसलिये ऐसा कह रहे हैं । क्या किसी मस्जिद में कमल के फूल, स्वास्तिक के निशान और देवी देताओं के चित्र भी होते हैं । बाबरी मस्जिद नहीं रही लेकिन उसके चित्र अभी सलामत हैं । इसके अलावा कभी ज्ञानवापी मस्जिद बनारस में जाने का साहस कीजियेगा । उस मस्जिद में भी पौराणिक चित्र और मूर्तियां आज भी लगी हुयीं हैं । इस्लाम में मूर्तिपूजा मना है तब किसी मस्जिद में हिंदू देवी देवताओं की मूर्ति कैसे आ गयी । भारत में आज भी 3000 मस्जिदें ऐसी हैं जो कि किसी न किसी मंदिर के तोड़े हुये भाग से बनी हुयी है । उनमें आपको तमाम हिंदू मंदिरों के भाग मिल जायेंगे । बहुत सी मस्जिदों में तो ऐसे संस्कृत के शिलालेख तक लगे हुये हैं जो किसी देवी देवता की स्तुति में कहे गये हैं । मैं यहां सिर्फ एक ही उदाहरण दे रहा हूं ।

जौनपुर की लाल दरवाजा मस्जिद 1447 ई0 में बनी । इसमें बनारस के पद्मेश्वर मंदिर के 1296 ई0 के एक पत्थर का एक लेख मिला जिससे पता चलता है कि 1447 के पहले ही पद्मेश्वर मंदिर को तोड़कर लाल दरवाजा मस्जिद बनी । लेख इस प्रकार है :

तस्यात्मजः शुचिर्धीरः पद्मसाधुरयं भुविए काश्यां विश्वेश्वर द्वारि हिमाद्रिशिखरोपमं ।

पद्मेश्वरस्य देवस्य प्राकारमकरोत्सुधीःए ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे द्वादश्याम्बुधवासरे ।

लिखिते में सदा जाति प्रशास्त्रि प्लववत्सरे संवत् 1353 ।

इस तरह के सैकड़ों सैकड़ों उदाहरण हैं । जिनके न सिर्फ पुरातात्विक साक्ष्य मौजूद है बल्कि समकालीन अंग्रेज और मुस्लिम इतिहासकारों ने भी उनका जिक्र किया है पर साम्यवादी इतिहासकारों को यह सब दिखाई नहीं देता । और दिखाई भी क्यों देगा जिन्होंने जिन्ना का पक्ष लिया था पाकिस्तान निमार्ण के लिये और जो 1962 में चीनी हमले को भारत सरकार द्वारा फैलायी गयी अफवाह कहते हों ऐसे लोगों के लिये राष्ट्रहित में सोचना एक भंयकर पाप है ।

कोर्ट ने एक सैकड़ों साल से जीवित खड़ी ऐतिहासिक इमारत को तरजीह न देकर , 1992 के बाबरी मस्जिद को ढहाने के आपराधिक कृत्य को ही मान्यता देने जैसा काम किया है ।

कोर्ट ने किसी आपराधिक कृत्य को मान्यता नहीं दी है बल्कि 500 साल से षडयंत्र के तहत छिपाये गये सत्य को मान्यता दी है ।

बड़ा दुख होता है देख कर कि अधिक्तर जयचंद कम्युनिस्ट इतिहासकार हिंदू हैं । इन्हें देश के साथ गद्दारी करते कभी शर्म महसूस नहीं हुयी । इनकी सारी धर्मनिरपेक्षता हिंदू धर्म को गरियाने, उसके इतिहास को दबाने, छिपाने, कुलचने और झूठा साबित करने में लगी हुयी है । ये वही लोग हैं जो आज औरंगजेब को महान सेकुलर शासक कहते हैं, जिसने सबसे ज्यादा हिंदू मंदिरों को तोड़ा । इनकी धर्मनिरपेक्षता हमेशा से मुगलों और गांधी नेहरू परिवार के साथ रही है । इतिहास के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ देश और देशवासियों के प्रति एक बहुत बड़ा गंभीर अपराध है लेकिन क्या करें इस देश में देशभक्तों से ज्यादा देशद्रोहियों की तादत हमेशा से ज्यादा रही है नहीं तो भारत वर्ष सदियों गुलामी की बेड़ियों में न जकड़ा रहता । आज भी ये जयचंद इतिहासकार एक विदेशी षडयंत्र के तहत देश के विभाजन में लगे हुये हैं ।

मुझे लगता है कि ऊपर दिये तथ्यों से आपके मन में जयचंद कम्युनिस्ट इतिहासकारों द्वारा फैलाये गये कलुषित इतिहास की मोटी गर्द कुछ हद तक साफ हुयी होगी । जय श्री राम ।

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30 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Chamomile के द्वारा
May 22, 2011

Walking in the presence of giants here. Cool thniknig all around!

chaatak के द्वारा
October 8, 2010

प्रिय मिश्र जी, श्री अरुण कान्त जी की उलझन और उसपर आपके द्वारा दिए गए तथ्यपरक समाधान को पढ़ कर एक बात बिलकुल स्पष्ट हो जाती है कि हिन्दू-मुस्लिम एकता के बीच जो सबसे बड़े रोड़े हैं वो यही लतखोर कमुनिस्ट इतिहासकार हैं जिनका आभारी हमेशा दोगला नेहरु परिवार रहा है | भारत के विभाजन से लेकर लाल बहादुर शास्त्री जी की ह्त्या करवाने तक का श्रेय इसी दोगले वंश को है जिसने हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियों को अपनी जागीर समझ रखा है| गांधीजी, सुभाष चन्द्र बोस और शास्त्री जी की लाशों पर सत्ता की दावतें उड़ाने वाले इन लालची भेडियों ने कभी भी इन महापुरुषों की हत्याओं की फोरेंसिक जांच की शुरुवात नहीं होने दी | जबकि दुसरे देशों में राष्ट्राध्यक्षों और महापुरुषों की हत्याओं और सहज मृत्यु पर तक भी हज़ारों एजेंसियां सैकड़ों साल गुजर जाने के बाद भी पूरे मनोयोग से तथ्यों को खोज खोज कर सामने ला रही हैं ये कांग्रेसी भेडिये और कमुनिस्ट चाटुकार वास्तविक इतिहास को चाटकर छद्म इतिहास का भूसा देश के नौकरशाहों, बच्चों और पत्रकारों के दिलो दिमाग में ठूंसने में लगे हैं ताकि इनकी कारगुजारियों पर हमेशा के लिए धूल पड़ जाए | ये इस बात को भूल रहे हैं कि परिवर्तन की आंधी चलने पर धूल मिटटी उड़ जायेगी और सत्य सके सामने आ जायेगा | अच्छे लेखन द्वारा भटकी पत्रकारिता को सही राह दिखाने पर बधाई!

    K M Mishra के द्वारा
    October 10, 2010

    प्रिय चातक जी सादर वंदेमातरम ! आपने भारत के अंतर्राष्ट्रीय स्तर के गद्दारों की पर्तें उधेड़ कर रख दीं । वास्तव में अगर ये कौम भारत में न होती तो आज न पाकिस्तान होता, न कश्मीर, चीन समस्या होती और न ही नक्सली होते । भारत को कमजोर करने में पिछले 63 सालों से इनका अद्भुत परिश्रम रहा है । इतिहास को मिटाया, हजार झूठ को हजार बार हजार तरीके से लिखा और देश के दुश्मनों को हमेशा प्रश्रय दिया । इनकी यही कहानी है । हमें इनके झूठ को तथ्यों द्वारा और इनकी कथनी और करनी को जनता के सामने लाना चाहिये । जय हिंद ।

Ramesh bajpai के द्वारा
October 5, 2010

प्रिय श्री मिश्रा जी सारे प्रश्नों को समेत कर ब्योरे वार उनका तथ्यों सहित समाधान दिया है आपने . आशा है आदरणीय अरुण कान्त जी को सारी जानकारी मिल गयी होगी . यदि अब भी कही कुछ संसय हो तो उनका स्वागत है वह समाधान भी दिया जायेगा . ऐतिहशिक भ्रांतियों की जगह सत्य को सामने लाने के लिए आपको बधाई बन्दे मातरम

    K M Mishra के द्वारा
    October 10, 2010

    आदरणीय बाजपेई जी । सादर वंदेमातरम ! अयोध्या हमेशा सुलगती रहे इसके कम्युनिस्ट जयचंद इतिहासकार ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं । एसे समय में जनता को इनके दुष्कर्मों से परिचित करवाना पड़ेगा । जय हिंद ।

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
October 4, 2010

आदरणीय मिश्र जी ! मुझे समाचार पत्र में मुलायम सिंह का बयान देखकर उनपर इतना क्रोध आया की क्या बताऊँ….. मुलायम सिंग अभी से अपनी रोटी सेंकने के लिए जनमानस को दिग्भ्रमितकर समाज को दंगो में धकेलने के पूरे प्रयाश में दिखे ………. अब उनकी विचार धारा के अनुसरणकर्ताओं का ख्याल भी वही है, वो स्वयं स्वार्थसिद्धि के लिए देश को किसी भी गर्त में फेंक सकते हैं, वो न समाज और व्यवस्था को उचित दिशा में जाते देखना चाहते हैं | ये आते गोलियों में उलझाकर मचलियाँ मारने वाले मछुवारे हैं ……… आपके तथ्यपरक लेख के बाद हो सकता है उनको अच्छा न लगे……. परन्तु आपका लेख जनमानस की आवाज है ……. आपके राष्ट्रवादी लेख के आपका आभार वन्देमातरम ………… की भाषा

    K M Mishra के द्वारा
    October 4, 2010

    पाण्डेय जी वंदेमातरतम ! मुल्ला मुलायम सिंह के बारे में आई बी और इंटेलीजेंस की रिपोर्ट है कि सपा को मिडिल ईस्ट के देशों से बहुत सा धन हवाला के जरिये प्राप्त होता है ताकि वो सिमि जैसे संगठनों के लिये ढाल का काम करते रहें । अयोध्या मुकद्दमें में एक गुप्त पक्षकार मुल्ला मुलायम सिंह भी थे । माननीय जजेज के सामने जब इनकी दाल नहीं गली तो इन्होंने वह करूणामय बयान दिया । वास्तव में मुस्लिम समुदाय नहीं मुल्ला मुलायम सिंह इस फैसले से ठगे गये हैं । हिंदू मुसलमान सभी को धर्मनिरपेक्षता का पाखंड करने वाले इन सभी पाखंडियों को पहचान लेना चाहिये । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

    Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
    October 4, 2010

    सर ! मुलायम सिंह को मैं ‘मुल्ला’ जैसे आदर्श सूचक शब्द देने के पक्ष में ही नहीं हूँ मैं तो उनको कत्लेयाम पसंद लुटेरा भी कहूं तो लुटेरों की अवमानना होगी ….. बस अब ज्यादा नहीं कहना चाहता ….. उनके लिए (तैमूर द्वितीय मुलायम सिंह) ही उपयुक्त समझता हूँ …

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 4, 2010

आदरणीय मिश्र जी दिन में ही इस पोस्ट को देखा मैंने पर बहुत आकस्मिक वजह से जाना पड़ा अतः देर से पढ़ा मैंने… अरुणकांत जी मुलायम सिंह की ही भाषा बोल रहे है….,उन्हें कांग्रेस प्रवक्ता रशीद अल्वी साहब का वक्तव्य पढना चाहिए था जहा वे कहते है … की वह ईमारत मुसलमानों के लिए इतनी महत्वपूर्ण नहीं थी ,,बल्कि केवल उनके लिए महत्वपूर्ण थी जो उस ईमारत के नाम पर रोजी रोटी चला रहे थे , जब वह मस्जिद थी ही नहीं तो बार बार मस्जिद ढहाने की बात कह कर तो ये लोग शायद भड़काने की ही शाजिश कर रहे है…. और मै ये कहना चाहता हु की इतिहास की अल्प जानकारी रखने वाला भी ये जानता है की कैसे मध्यकालीन इस्लामिक आतंकवाद ने हिन्दू मानबिदुओ को अपना निशाना बनाया … लेकिन भारत की सनातन परंपरा इतिहास बनाती है इतिहास में जीती नहीं है… ये पूरा विश्व जानता है ………….. कमुनिश्तो ने सनातन परंपरा की जो तस्वीर प्रचारित की है इसके लिए तो वे राष्ट्र द्रोह के अपराधी है… उनपे राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लग्न चाहिए… ये छद्म सेकुलर वादियों ने तो आजादी के बाद से सँभालने नहीं दिया…. एक बात समझ में क्यों नहीं आती… इन बरसाती मेढ़को को.. की वह ढाचा एक धार्मिक ईमारत नहीं था .. 500 वर्षो से हिन्दुओ ने अपने सनातन परंपरा के आराध्य पुरुष आदर्श पुरुष राम के स्थल के रूप में मान्यता दिलाने की लडाई लड़ी है… तो वह कौन सी कोर्ट हो सकती है कौन सा कानून हो सकता है जो देश के 90 करोण लोगो की भावना को लात मार दे .. अगर कोई कानून ऐसा करता है.. तो वह कानून नहीं जंगल राज है… मै दावा कर सकता हु… की कोई भी कोर्ट इससे बेहतर निर्णय दे ही नहीं सकती थी… यद्यपि यह एक समझौता है .. लेकिन फिर भी अगर बात दिलो को जोड़ने की है तो हिन्दू हमेशा आगे आकर हाथ बढ़ता है.. अब फिर गेंद दुसरे पक्ष के हाथ में है… वो कोर्ट के इस आदेश के भाव को समझते हुए .. किस हद तक निर्णय ले सकता है……………… क्योकि कोर्ट का निर्णय तो स्पष्ट रूप से हिन्दू भावनाओं की ही बात कर रहा है… ?

    K M Mishra के द्वारा
    October 4, 2010

    पाण्डेय जी वंदेमातरम ! बेशक इस फैसले से बेहतर दूसरा फैसला नहीं हो सकता है । 500 साल से चला आ रहा यह संघर्ष अगर किसी समझौतेनुमा फैसले से हल हो जाता है तो इसमें बुराई क्या है । यह फैसला इतना बुरा भी नहीं है क्योंकि दोनो ही समुदायों ने शांत रह कर इसे अपनी मौन स्वीकृति दी है । लेकिन धर्मनिरपेक्षता का पाखंड करने वालों की दुकान इस फैसले से बंद होती नजर आ रही है और पिछले 63 सालों से कम्युनिस्ट इतिहासकार जो झूठ का मायाजाल फैलाये हुये थे वह भी साफ हुआ है इसलिये इनको एका एक बावासीर हो गयी है । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

atharvavedamanoj के द्वारा
October 4, 2010

आदरणीय मिश्रा जी, सादर वन्दे मातरम आपके इस तथ्यपरक पोस्ट को पढने के बाद न जाने कितने कुतर्की कम्युनिस्टों की नीद उड़ गयी होगी..लेकिन ये कम्युनिस्ट इतने दुराग्रही जीव होते हैं की अगर इनकों लतियाया भी जाय तो बेशर्मों की तरह अपनी ही ही करने और राष्ट्र और राष्ट्रीयता का मखौल उड़ने फिर चले आते हैं..तर्कों और तथ्यों के विरुद्ध कुतर्क गढ़ना कोई इन जयचंदों से सीखे…लेकिन इतना तो है की अब वे दो चार दिनों तक खामोश रहेंगें…सच पूछिए तो कभी-कभी हमें इनके बचकाने कुतर्कों से हंसी भी आती है और सोचता हूँ की शायद इनका मानसिक स्तर jean piaget द्वारा बताये गएँ sensorymotor स्तर से अधिक नहीं हो पाया है…बेहतरीन पोस्ट के लिए आभार …एक व्यंगकार का रौद्र रूप अब दिखने को मिला है…बधाई हो…जय भारत…जय भारती

    atharvavedamanoj के द्वारा
    October 4, 2010

    हाँ..इन राक्षसों से पूछियेगा की १९९२ से पहले ५०० वर्षों का इतिहास अगर दरकिनार भी कर दिया जाय तो १९९० में निहत्थे कारसेवकों पर गोलीबारी करवाना किस शौर्य का प्रदर्शन था? क्या यह एक मानवतावादी घटना थी,जिसके लिए मौलाना मुलायम सिंह यादव (मुझे लगता है,रामभक्त यादवों का नाम जोड़कर मैंने कुछ धृष्टता की है,जिसके लिए अपने यादव भाइयों से क्षमाप्रार्थी हूँ) को नोबेल शांति पुरस्कार के नामित किया जाना चाहिए?

    K M Mishra के द्वारा
    October 4, 2010

    मनोज जी सादर वंदेमातरम ! आपने इन जयचंद कम्युनिस्ट इतिहासकारों के लिये बिल्कुल ठीक कहा है । पर क्या करें हिंदू धर्म में जिस तरह नास्तिकों तक को मान्यता दी गयी है उसी तरह भारत के संविधान से देश के इन गद्दारों को भी संरक्षण मिल जाता है । मौलिक अधिकारों का जितना दुरूपयोग इन गद्दारों ने किया है उतना किसी आतंकवादी संगठन ने भी नहीं किया है । देश में फैले 90 प्रतिशत आतंकवाद के पोषणकर्ता यही कम्युनिस्ट हैं । चाहे पाकिस्तान के लिये जिन्ना का समर्थन हो या 62 में चीन युद्ध में चीन का एजेंट बनना हो या कई करोड़ बंग्लादेशियों को भारत मंे घुसा कर उन्हें भारतीय नागरिक बनाना हो या नक्सलियों का उत्पादन हो या फिर कश्मीर के अलगाववादियों को सीने से लगाना हो । जब से ये पैदा हुये हैं भारत को तोड़ने का ही काम किया है इन्होंने । भारत सरकार को अब वन्यजीव अधिनियम में से इस हिंसक और जहरीले जानवर को संरक्षित प्रजाति से बाहर कर देना चाहिये । आपकी जोशीली टिप्पणी के लिये आभारी हूं । जय हिंद ।

आर.एन. शाही के द्वारा
October 4, 2010

श्रद्धेय मिश्रा जी, प्रणाम! आपने बड़े विद्वतापूर्ण अकाट्य तर्क़ों से श्री अरुणकांत जी के भ्रमित विचारों का जवाब दिया है, जिसको पढ़ने के बाद लग रहा है कि इसप्रकार का जवाब निहायत ज़रूरी था । मैंने भी उनका लेख पढ़ा , और अज़ीब लगा था कि जहां एकतरफ़ पूरे देश में हर समुदाय सम्प्रदाय द्वारा इस फ़ैसले का स्वागत किया जा रहा है, अरुण जी के ये विरोधाभासी विचार कहां से आ गए? छोटी टिप्पणी में समझाने का प्रयास किया था, लेकिन आपका जवाब परिपूर्ण, तर्क़संगत और अकाट्य है । बहुत-बहुत बधाई ।

    K M Mishra के द्वारा
    October 4, 2010

    शाही जी प्रणाम । मैं अरूणकांत जी का बहुत आदर करता हूं पर मुझे लगता है कि हिंदू धर्म, इतिहास के बारे में उनका कान्सेप्ट गड़बड़ है । मुझे लगता है कि वे धर्मनिरपेक्षता का पाखंड करने वाली मीडिया के तर्कों को सच मान रहे हैं और उसकी वजह से भ्रमित हैं । तथाकथित सेकुलर मीडिया और कम्युनिस्ट इतिहासकारों की वफादारी भारत देश के प्रति हमेशा से ही संदिग्ध रही है । इसके तमाम प्रमाण हैं । ऐसी ही लोगों ने बहुत से भारतीयों को बरगलाया है । अब आप देखिये कि इस फैसले पर जब हिंदू और मुसलमान शांति और धैर्य से काम ले रहे हैं तब धर्मनिरपेक्षता की तिजारत करने वालों के द्वारा उच्च न्यायालय के फैसले पर उंगली उठायी जा रही है । फैसला आने के पहले तक ये भारत की न्यायपालिका का गुणगान करते न थकते थे । फैसला जब इनके देशद्रोही सिद्धांतों के अनुसार नहीं आया तो ये न्यायापालिका पर ही उंगली उठाने लगे जबकि मैं जोर देकर कहता हूं कि ना तो इनको विधि की जानकारी है और न ही सच्चे इतिहास की । अरूणकांत जी जैसे लोगों को इस सेकुलर मीडिया ने मिस्मेराईज किया हुआ है । आप देखिये उनका लेख पूरा का पूरा मुल्ला मुलायम सिंह के बयान (जो कि साम्प्रदायिकता से लबरेज था) का ही एडवांस वर्जन है । अब अगर मैं उनके लेख के उत्तर में यह लेख न लिखता तो बहुत से लोग उनके ही पक्ष को सत्य मान लेते । इस लेख को लिखने के 24 घंटे बाद मैं मानता हूं कि मेरी भाषा में तल्खी थी लेकिन ये तल्खी करन थापर, अर्णव गोस्वामी आदि की बकवास सुन सुन कर बढ़ी थी और जब यही भाषा मैंने अरूणकांत जी के लेख में पढ़ी तब फिर रहा नहीं गया । मैंने इस लेख में विस्तार से न्यायालय का ही पक्ष रखा है ताकि अगर किसी को कोई गलत फहमी हो तो वह दूर हो जाये । आप प्रबुद्धजनों की टिप्पणी से मेरे पक्ष का दृढता मिली इसके लिये आभारी हूं ।

RASHID के द्वारा
October 4, 2010

कोर्ट का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण नहीं बल्कि सौभाग्यपूर्ण है जो दर्शाता है की इस देश को राम रहीम के साथ रहने में कोई एतराज़ नहीं है !! जहाँ भगवन राम के वस्त्र एक मुस्लिम सिलता हो , जहाँ मुहर्रम का ताज़ा हिन्दू उठाते हो, जहाँ मंदिर की घंटी का मेहनताना न लिया जाता हो,, जहाँ मंदिर मस्जिद एक परिसर में हो ( कानपूर में टाटमिल चौराहे पर), जहाँ स्वर्गी रामचंद दास परमहंस और हाशिम अंसारी साथ साथ कोर्ट जाते हो, जहाँ मंदिरों में रोज़ा अफ्तार कराया जाता हो वह देश धन्य है और यह मेरा सौभाग्य है की मैंने इस पावन भूमि पर जनम लिया… राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    K M Mishra के द्वारा
    October 4, 2010

    राशिद भाई वंदेमातरम ! भारत देश जितना हिंदुओं का है उतना ही मुसलमानों का है । राम और रहीम में कोई फर्क नहीं है । मेरा गुस्सा देश के इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश करने वाले गलीज कम्युनिस्ट इतिहासकारों और धर्मनिरपेक्षता का पाखंड करने वाले नेताओं और बुद्धिजीवीयों पर है । आपकी यह टिप्पणी पढ़ कर आंखे गीली हो गयीं । अगर आप सामने होते तो दौड़कर गले लगा लेता । आपकी टिप्पणी से मेरा उत्साह दूना हो जाता है । बहुत बहुत शुक्रिया ।

    Cathleen के द्वारा
    May 22, 2011

    Kudos! What a neat way of tinhinkg about it.

R K KHURANA के द्वारा
October 4, 2010

प्रिय मिश्र जी, आपका लेख बहुत महत्वपूरण है ! आपने सरे तथ्य सही दिए है ! आप आहत हुए इसमें कोइ आश्चर्य नहीं है ! फिर भी कुछ लोग ऐसे है जो शांति नहीं चाहते और आग को भड़का कर अपनी रोटियां सेकना चाहते हैं ! ऐसे लोगो को हमें नकारना है और हर हाल में शांति बनाये रखनी है ! बहुत सुंदर लेख राम कृष्ण खुराना

    kmmishra के द्वारा
    October 4, 2010

    काका वंदेमातरम ! आज देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा है । हिंदू मुसलमां दोनों ही इस बात को समझ रहे हैं लेकिन पाखंडी धर्मनिरपेक्षवादियों से रहा नहीं जा रहा और वे ऊल जलूल तर्क करके एक तो न्यायालय के निर्णय की धज्जियों उड़ा रहे हैं दूसरी तरफ देश को आग में झोंकने की तैयारी कर रहे हैं । मुल्ला मुलायम सिंह और सेकुलर मीडिया इस देश को अपना देश नहीं मान रहे हैं नही तो वे ऐसे भड़काऊ बयान और तर्क न देते । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

roshni के द्वारा
October 4, 2010

मिश्र जी आपका लेख सब हिंदूंऔ के लिए राहत देने वाला है… अपने बहुत विस्तार से सब जानकारी दी है … अयोध्या फैसला दुर्भाग्यपूर्ण कहने वाले देश में शांति और प्यार नहीं देख सकते.. तबी तो ऐसा कहते है … यहाँ पर मै एक टी.व् चैनल की बात करना चाहगी की जब अयोह्या का फैसले का सब को इंतज़ार था तो एक रिपोर्ट ने कहा की हिन्दू राम मंदिर ले लिए लड़ रहे है मगर ये नहीं देखते की बाबर ने अयोध्या में कितने मंदिरों का निर्माण किया था ……. क्या ये कहना हिन्दुओं की भावना से खिलवाड़ नहीं ? क्या इससे हमे उनका शुकार्गुज़र होना चाहिए??? एक बहार का राजा हमारे देश में हमारी ही भूमि में हमारा ही मंदिर तोड़ क्र एक मस्जिद खड़ी करता है … और बदले में कही और मंदिर बना देता है तो वोह महान हो गया ….. जो भी हो मुग़ल अपने साथ जमीं लेकर नहीं आये थे …… ये हमारा देश है हमारी राम भूमि है ……. फिर चाहे कितने विदेशी आ जाये …. हम अपना मान उन्हें नहीं दे सकते…… ये देश ये लोग ये सब हम भारतवासियों का है तो भारती बन कर सोचा जाये न की पाखंडी सेकुलरवादियों की तरह अच्छे लेख पर बधाई

    kmmishra के द्वारा
    October 4, 2010

    रोशनी जी वंदेमातरम ! आपकी जोशिली टिप्पणी पढ़ कर बहुत से गलीज देश द्रोही बुद्धिजीवियों को अपने गिरेबां में झांकने की प्रेरणा मिलेगी । अब भी नहीं झांकेगें तो एक दिन लोगों के हाथ इनके गिरेबां तक पहुंच जायेंगे । टिप्पणी के लिये आभार ।

daniel के द्वारा
October 4, 2010

आदरणीय मिश्रा जी ! आपके दिए हुए प्रमाणों /तर्कों में यह बहुत सटीक लगा :~ जौनपुर की लाल दरवाजा मस्जिद 1447 ई0 में बनी । इसमें बनारस के पद्मेश्वर मंदिर के 1296 ई0 के एक पत्थर का एक लेख मिला जिससे पता चलता है कि 1447 के पहले ही पद्मेश्वर मंदिर को तोड़कर लाल दरवाजा मस्जिद बनी । लेख इस प्रकार है : तस्यात्मजः शुचिर्धीरः पद्मसाधुरयं भुविए काश्यां विश्वेश्वर द्वारि हिमाद्रिशिखरोपमं । पद्मेश्वरस्य देवस्य प्राकारमकरोत्सुधीःए ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे द्वादश्याम्बुधवासरे । लिखिते में सदा जाति प्रशास्त्रि प्लववत्सरे संवत् 1353 । अरुण कान्त जी की पोस्ट का जवाब देने में आपने जो मेहनत की है इसकी जितनी भी सराहना की जाए कम है । लेकिन एक बात मैं आपसे कहना चाहूँगा कि अपनी पोस्ट में आपने अरुण कान्त जी के लिए बहुत कठोर शब्दों का प्रयोग किया है, यदि आप इन शब्दों के बिना भी लिखते, तो भी आपकी बात के असर में कोई कमी नहीं आती । मैं जानता हूँ कि आपकी भावनाओं को ज़रूर ही भारी ठेस पहुंची है तभी आपके शब्दों में इतनी कठोरता है:~ १.धर्मनिरपेक्षता का पाखंड करना कुछ लोगों का मौलिक अधिकार है । २.यह कह कर आप देश की शांति व्यवस्था से खेल रहे हैं और एक पक्ष को उकसा रहे हैं और देश को दंगों की आग में झोकने की तैयारी कर रहे हैं । यदि इस लेख को लिखने के बाद आपका मन शांत हो गया हो ,तो कृपया अपने लेख से तीसरे शब्द श्रद्धेय को हटा दीजिये । क्योंकि आपका लेख इस शब्द का कुछ और ही अर्थ प्रस्तुत कर रहा है । ***आपका मन शांत हो इस शुभकामना के साथ ***

    kmmishra के द्वारा
    October 4, 2010

    डैनियल जी सादर वंदेमातरम ! आपनेे लेख में दिये गये तर्कों को सराहा इसके लिये आभारी हूं । आदरणीय अरूणकांत जी का मैं बहुत आदर करता हूं । आपकी यह बात भी सही है कि मेरी भावनाओं को ठेस पहुंची है । लेकिन इसके साथ साथ करोड़ों हिंदुआंे की भावनाओं को भी ठेस पहंुची है । मुल्ला मुलायम सिंह का बयान था कि मुस्लिम ठगा महसूस कर रहे हैं । 85 करोड़ हिंदू जब अपने आपको ठगा महसूस करते तब इनकी छाती को ठंडक पहुंचती । मेरा यह आक्रोश उन सभी पाखंडी सेकुलरवादियों के प्रति है जिन्होंने न कभी राम को माना है और न रामजन्मभूमिमंदिर के 500 वर्षों के संघर्ष को । अब जब कोर्ट ने बहुमत से ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर मुहर लगा दी है तब इनकी छाती पीटन रूदन को देख कर स्वंय मुस्लिम समुदाय भी चकित हैं कि क्या वास्तव में औरंगजेब की जायज संतान यही हैं । मैं सभी पाखंडी धर्मनिरपेक्षवादियों को आमंत्रित करता हूं कि वो आयें और तर्क करें । मैं उन्हें गलत साबित कर दंूगा । जय हिंद ।

    samta gupta kota के द्वारा
    October 4, 2010

    डेनिएल जी और मिश्र जी[प्रबुद्ध जन],आम आदमी हिन्दू हो या मुसलमान शांति चाहता है चूँकि वह रोजी-रोटी की समस्या से रोज दो-चार होता है और विकास भी शांति से होता है ,अयोध्या मुद्दे पर उच्च-न्यायलय की लखनऊ बेंच द्वारा दिए गए फैसले से आम आदमी और हिन्दू-मुसलमान सभी संतुष्ट हैं चूँकि इसने न तो मुसलमानों और न ही हिन्दुओं को निराश किया है,फैसला आने के पहले और बाद में मुस्लिम और हिन्दू नेताओं की प्रतिक्रिया भी परिपक्व रही जिन्होंने भावनाओं को भड़काने की बजाय उन्हें शांत करने का ही कार्य किया और सरकारों ने स्थानीय शरारती तत्वों से निबटने के माकूल इंतजाम किये वैसे भी जनता ने तो दंगों की विभीषिकाओं से काफी कुछ सीखा है लेकिन तथाकथित छद्म-धर्मनिरपेक्ष कचरे ने न तो कुछ सीखा है और न ही ये जनता के बदलते मूड को समझ पा रहे हैं,और इसीलिए सत्ता से बहार होने की खीझ उन्हें भड़काऊ भाषण देने को बाध्य करती है लेकिन इस तरह ये नेता अपनी जमीन और खोते चले भी जायेंगे और खोते जाना भी चाहिए,मुलायम सिंह के बयान पर फिरंगी महली मदनी ने उन्हें लताड़ भी पिलाई,वैसे हासिम अंसारी जी सुलह की जो कोशिश कर रहे हैं वह सफल होनी चाहिए,लेकिन वह तभी सफल हो सकती है जब उसे राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाकर सिर्फ उदार धार्मिक लोग उसकी ईमानदार कोशिश करें ,शिया टाइगर फोर्स ने मंदिर निर्माण के लिए धन देने की बात कही तो दिल खुश हुआ, वैसे मेरा मानना है हमें इतिहास के दुखद अध्यायों को भूलकर भविष्य का सोचना चाहिए,अगर इतिहास से सीखना है तो जोडनेवाली चीजें सीखें जैसे फ्रांस में पुनर्जागरण के समय हुआ था,हम भारतीयों के लिए मंदिर और मस्जिद का निर्माण कितना भी जरूरी हो लेकिन भारत का निर्माण सबसे ज्यादा जरूरी है,क्या अच्छा हो कि अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए मुसलमान भाई तन-मन धन से सहयोग करें और मस्जिद निर्माण के लिए हिन्दू भाई फिर उसी तरह कि कारसेवा करें जिसने मुसलमान भाइयों के जख्म हरे किये थे,में कहती हूँ भारत निर्माण कि दिशा में यह मील का पत्थर साबित होगा और मैं स्वयं मस्जिद निर्माण के लिए सहयोग करने को तैयार हूँ,कल मैं आरती की घंटी सुधरवाने एक मुसलमान मिश्त्री के पास ले गयी,घंटी ठीक करके उसने मेहनताना लेने से यह कहकर मना कर दिया कि यह पूजा [इबादत] की चीज है,दिल धन्य हुआ,मंदिर-मस्जिद की बजाय भारत बनाओ,

    daniel के द्वारा
    October 4, 2010

    समताजी ! आपके विचार जान कर बहुत अच्छा लगा !! वास्तव में आप जैसी सोच रखने वाले व्यक्तियों की ही आज आवश्यकता है! जिस तरह दीप से दीप जलता है आपके विचार भी उसी तरह फैलते जाएँ !! ***शुभकामनाओं सहित ***

    K M Mishra के द्वारा
    October 4, 2010

    हम भारतीयों के लिए मंदिर और मस्जिद का निर्माण कितना भी जरूरी हो लेकिन भारत का निर्माण सबसे ज्यादा जरूरी है,क्या अच्छा हो कि अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए मुसलमान भाई तन-मन धन से सहयोग करें और मस्जिद निर्माण के लिए हिन्दू भाई फिर उसी तरह कि कारसेवा करें समता जी हिंदू-मुसलमां इस देश में सदियों से साथ रहता आया है और उसे एक दूसरे से कोई परेशानी नहीं है । परेशानी इनको साथ देखकर धर्मनिरपेक्षता का पाखंड करने वालों को होती है । आपकी टिप्पणी एक आम भारतीय क्या सोचता है उसे दर्शाती है । आपका बहुत बहुत आभार ।


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