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जग बौराना: सियार और मौलाना मुलायम सिंह

Posted On: 5 Oct, 2010 में

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लेखक – नरेश मिश्र

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जंगल में एक शेर और सियार रहते थे । सियार शेर के शिकार का बचा खुचा हिस्सा खा कर खूब मोटा तगड़ा हो गया था । उसकी जवानी बुलन्दी पर थी । एक दिन उसे शेर दिखायी दिया । वह भरपेट शिकार खा कर अपनी गुफा में सोने जा रहा था ।

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सियार ने कुछ फासले पर खड़े हो कर शेर को ललकारा, – लोग तुझे जंगल का राजा कहते हैं । दम खम हो तो मुझसे दो-दो हाथ कर ले । तुझे भी पता चल जायेगा कि जंगल का असली राजा कौन है ?

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शेर ने पलट कर सियार की तरफ देखा । उसे गुस्सा नहीं आया । वह भरपेट खाने के बाद गहरी नींद सोने के मूड में था । उसने जंभाई लेते हुये कहा – मेरे बाप तू अपने रास्ते जा । तू ही जंगल का राजा है । मुझे नींद आ रही है । मैं तुझसे लड़ना नहीं चाहता ।

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सियार तैश में आ कर उछल पड़ा – तू मुझसे डर गया । अब मेरे जैसे सवा शेर से पाला पड़ा है तो तेरी हेकड़ी हवा हो गयी ।

शेर बोला – तू ऐसा ही समझ ले पर मेरे रास्ते से हट जा ।

सियार सीना फुला कर बोला – मैं हटने वाला नहीं । तूने शेरनी मां का दूध पिया है तो मुझसे निबट ले । मैंने कसम खायी है कि आज तुझे छठी का दूध याद दिलाऊंगा ।

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मां की बात सुनते ही शेर की औंघाई हिरन हो गयी । वह अपनी दहाड़ से जंगल को कंपाता सियार पर टूट पड़ा । शेर की दहाड़ सुनते ही सियार का मल-मूत्र  बाहर निकल आया । वह जान बचाने के लिये पलट कर भागा । सियार आगे-आगे शेर पीछे पीछे । सियार को जान बचाने के लिये कोई जगह नहीं मिली तो वह उस खाईं की तरफ दौड़ा जिसमें जंगल के सारे जानवर निबटान मारते थे । वह खाईं गन्दगी और मल से लबालब थी । सियार उसमें कूद गया । उसके बदन में गन्दगी लिपट गयी । उसने फिर शेर को ललकारा, – हिम्मत है तो मेरे पास आ, मैं तुझसे लड़ने को तैयार हूं ।


शेर ने खाईं के किनारे खड़े हो कर सियार को देखा और बोला – मैं तुझसे हार मानता हूं । जिस गन्दगी में तू उतर गया है, वहां जाना मेरे वश की बात नहीं है ।


साहबान, मेहरबान, कद्रदान, अब जरा इधर दीजिये ध्यान !


बंदा जो बयान कर रहा है, उसका ताल्लुक रामजन्मभूमि-बाबरी ढांचा मुकद्दमें के फैसले से है । इस फैसले से सभी सियासी पार्टियों ने माप-तोल कर  बोलने का फैसला किया । ज्यादातर सेकुलर पाखंडी ही जबान खोलने के पहले सौ बार सोचने को मजबूर नजर आये । सिर्फ एक समाजवादी जीव हैं जो साम्प्रदायिक विद्वेष की गन्दी खाईं में कूद कर देश को ललकार रहे हैं । वह इस फैसले को अपने लिये सुनहरा मौका मान कर भुनाना चाहते हैं । वह बहुत साल से सत्ता सुंदरी को गले लगाने के लिये तड़प रहा है । उसने दो टूक बयान जारी कर कहा है – इस फैसले से मुस्लिम खुद को ठगा और मायूस महसूस कर रहे हैं ।

Fox_सोशलिस्ट बन्दे को मुल्क के अमनोअमान से कुछ लेना देना नहीं है । उसे तो मुस्लिम भाइयों को भड़काने का माकूल मौका मिल गया है । उसे पता है कि मुस्लिम वोट बैंक के हाथ से निकल जाने का कैसा खामियाजा  भुगतना पड़ता है । बड़ी मेहनत से वोट बैंक की इस मछली ने कांटे में लगा चारा निगला था । बदकिस्मती से मछली कांटा तोड़ कर निकल गयी वह जब तक दोबारा नहीं फंसती तब तक सत्ता की कुर्सी के वियोग में घड़ियाली आंसू बहाने पड़ेंगे ।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले ने जो मौका दिया है उसे गंवाना सियासी जहालत के सिवा और कुछ नहीं है, कोशिश करके देखने में कोई हर्ज नहीं है । देश का हिंदू-मुस्लिम समुदाय इस फैसले से शांत है । वह जानता है कि यह फैसला आखिरी नहीं है, अभी सुप्रीम कोर्ट से अन्तिम फैसला होना बाकी है । सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम लट्ठ । हजारों पेज में लिखे गये फैसले को पढ़ने की फुसर्त  सबको नहीं मिल सकती । सियासी दुकानदारों को तो मुश्किल से ही मिल सकती है । मुल्क में सियासत ही इकलौता पेशा है जिसमें पढ़ा लिखा होना कतई जरूरी नहीं है । पढ़ाई लिखाई आमतौर पर सियासतबाजों के लिये अपात्रता साबित होती है । बस भड़काऊ नारे लगाओ और अपनी गोट लाल करो ।


मुस्सिम समुदाय को पटाने और भड़काने के लिये कुछ भड़काऊ नारे और बयान सियासत के इस शातिर शतरंज खिलाड़ी के बायें हाथ का खेल है । मुस्लिम भाई नहीं भड़कते तो क्या फर्क पड़ता है । यह मलाल तो नहीं रह जायेगा कि बंदे ने कोई कोशिश नहीं की ।

मुल्क सचमुच नेताओं, सेकुलर पाखंडी मीडिया माहिरों की बनिस्बत ज्यादा समझदार है । वह भड़काने वाले तथाकथित सेकुलरों की चाल समझ गया है । काठ की हांडी दो बार नहीं चढती । लोग जानते हैं कि साम्प्रदायिकता की गंदगी में लिपटा हुआ सियार क्या कह रहा है ।

हमें पहली बार यकीन हो गया कि मुल्क के असली दुश्मन वे सियासतबाज हैं जो समुदायों के बीच तनाव फैला कर, लाशों की सीढ़ी चढ़ कर भी सत्ता की कुर्सी पर बैठना चाहते हैं ।

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49 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Randhil के द्वारा
May 22, 2011

At last, someone comes up with the “right” aneswr!

chaatak के द्वारा
October 8, 2010

प्रिय मिश्र जी, सबसे पहले तो मैं मुलायम सिंह यादव जी को सही उपाधि से अलंकृत करने के लिए आपको धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ | ढीठ सियार से बिलकुल सही तुलना स्थापित करके इस ‘गद्य-गीत’ में आपने मुलायम का नाम हमेशा के लिए अमर कर दिया (या कम से कम तबतक के लिए तो जरूर जबतक सियार खुद आकर चुनौती न दें कि मिश्र जी ने हमारी तुलना मुलायम से करके हमारा मान-मर्दन किया है, भाई हम सियार इतने कमीने तो नहीं हैं!) आदरणीय नरेश मिश्र जी को मेरी ओर से भी कोटिशः बधाइयाँ !

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    प्रिय चातक जी वंदेमातरम ! आपने सियार का पक्ष उठा कर मुझे दुविधा में डाल दिया क्योंकि कि चाहे जो हो इस बेचारे जानवर की रेपुटेशन मुल्ला मुलायम सिंह से तो अच्छी ही है । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

Ghanshyam के द्वारा
October 7, 2010

बहुत खूब िमश्रा जी………..देश के शुभ िचॅतक है आप

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    घनश्याम जी वंदेमातरम । आप ने लेख को पंसद किया और उसके अर्थ तक पहुंच । आप भी देशभक्त है। ।टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

kmmishra के द्वारा
October 7, 2010

आप सभी ब्लागर बंधुओं को यह व्यंग लेख पसंद आया इसके लिये मैं श्री नरेश मिश्र की तरफ से आप सबका आभार प्रकट करता हूं । मुल्ला मुलायम सिंह के सेकुलर पाखंड को जनता भली भांति समझ गयी । साम्प्रदायिक विद्वेष से लबरेज उनकी कथनी और करनी में भारी अंतर साफ नजर आता है । 500 सालों से निरंतर चले आ रहे राममंदिर संघर्ष में हिंदुओं के लहू की अंतिम आहूति मौलाना मुलायम सिंह ने 1990 में ली थी जब उन्होंने निहत्थे कारसेवकों पर गोलियां चलवा दी थीं और सैंकड़ों कारसेवकों की लाशें सरयू में बोरे में डाल कर बहायी गयीं थी । फिर उन्होंने मस्जिद ध्वंस कें मुख्य आरोपी कल्याण सिंह से हाथ मिला लिया था लोध वोट के लिये । आज जब मुस्लिम वोट बैंक उनके हाथों से खिसक गया है तब वे फिर धर्मनिरपेक्षता का पाखंड कर रहे हैं । धर्मनिरपेक्षता का पाखंड मुल्ला मुलायम सिंह के साथ साथ कांगे्रस पार्टी भी कर रही है । अयोध्या फैसले को लटकाये रहने में ही कांग्रेस की भलाई थी । फैसला न आने पाये इस लिये उसने आर सी त्रिपाठी को मोहरा बना कर फैसले को टलवाने में कोयी कसर न छोड़ी । अब इस फैसले से उसको लगता है कि मुस्लिम वोट बैंक हाथ से निकल जायेगा तो उसके तमाम नेताओं को जूड़ी बुखार आने लगा है । फैसले के पहले ही कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का बयान था कि राम मंदिर के लिये आर एस एस और भाजपा किसी भी हद तक जा सकती है । इसके विपरीत फैसला आने पर भाजपा और आर एस एस की टिप्पणियां बेहद संतुलित थी । उन्होंने कहा कि इस फैसले से किसी की हार जीत नहीं हुयी है । लेकिन कांगे्रस का नुकसान हो चुका था । अब कांग्रेस इस नुकसान की भरपाई के लिये मस्लिम समुदाय को कम्पन्सेट कर रही है । कल ही प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह का बयान था कि आउट आफ कोर्ट जा कर (मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिग है) सरकार जामिया मिलिया और अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी का दर्जा देगी । अभी तक ये केन्द्रीय विश्व विद्यालय हैं और इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार खुद ही इसका सैद्धांतिक विरोध कर रही है । दूसरा मामला । कल ही भोपाल में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने राष्ट्रवादी संगठन आर0 एस0 एस0 की तुलना आतंकवादी संगठन सिमि से की है । यह बिल्कुल वैसा ही बयान है जैसा कि मुल्ला मुलायम सिंह ने अभी दो दिन पहले दिया था कि मुसमान अपने को ठगा महूसस कर रहे हैं । इस फैसले से मुलायम और कांग्रेस दोनों की छद्यम धर्मनिरपेक्षता की हांड़ी चूल्हे पर नहीं चढ़ पायी । राहुल गांधी इसके पहले भी कई ऐसे बयान दे चुके हैं जिससे उनके अहंकारी और तानाशाही व्यक्तित्व का पता चलता है । कांग्रेस उनको युवराज मानती है और अगला पी एम बनाने की तैयारी में है पर युवराज की बोली और आचार व्यवहार से लगता है कि उनको भारत देश के इतिहास की अधिक जानकारी नहीं है । भाजपा ने सही ही कहा कि उनको कांग्रेस के साम्प्रदायिक इतिहास पर नजर डालनी चाहिये । कुछ लोगों की यह भी राय है (जिन्हें गांधी नेहरू परिवार की कुण्डली ज्ञात है) कि उन्हें अपने खानदान के इतिहास पर भी नजर डालनी चाहिये । इधर राहुल बाबा के जिगरी उमर अब्दुल्ला इस उमर मंे लौंडहाई से बाज नहीं आ रहे हैं । उनका ताजा बयान है कि कश्मीर का भारत में अधूरा विलय हुआ था । राहुल बाबा की संगत का असर तो पड़ना ही था । न इनको भारत के इतिहास का ज्ञान है और न उनको । कश्मीर का मुख्यमंत्री एक ऐयाश नेता का ऐयाश पुत्र है । इनको इतना भी ज्ञान नहीं है कि अगर भारत सेना कश्मीर में न होती तो ये पिता पुत्र रावलपिंडी या मुल्तान की किसी सैनिक जेल की शोभा बढ़ा रहे होते । मित्रों, देश युवराजों के चक्कर में फंसता जा रहा है । पुराने लंपट जमींदारों के अघाये हुये युवराजों की फौज आज कल सत्ता के गलियारों में घूम रही है । नजरें उठा कर देखिये । चोर का बेटा चोर, भिखारी का बेटा भिखारी, सेठ का बेटा सेठ, आई ए एस का बेटा आई ए एस, डाक्टर का बेटा डाक्टर, विधायक का बेटा विधायक, मंत्री का बेटा मंत्री, सीएम का बेटा सीएम और पीएम का बेटा पीएम बन रहा है । बिहार चुनाव में टिकट भी वंशवाद के आधार पर बांटे गये हैं । संविधान में लोकतंत्र की जो परिभाषा दी गयी है वह सिर्फ चुनाव की डेट घोषित होने से चुनाव के नतीजे घोषित होने तक ही फलीभूत होती है । उसके बाद भारत में फिर वही सामंतयुग प्रभावी हो जाता है । अगर यकीं न आये तो वर्तमान स्थिति और 100 साल पहले की स्थिति दोनो की तुलना करके देख लीजिये । आम आदमी पहले की तरह ही मंहगाई, गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी से त्रस्त है । कभी किसी अफसर से, पुलिस वाले से, मंत्री से वर्तमान में पाला पड़े तो पहले की जमीदारी व्यवस्था आंखों के सामने घूम जायेगी । थाने और कचहरी का चक्कर अगर शुरू हुआ तो आपका भगवान ही मालिक है । अब आप कहेंगे कि क्या किया जा सकता है । बहुत आसान काम है । बंदूक उठा कर किसी लाम पर नहीं जाना है । वही तरीका अपनाईये जो गांधी जी ने अपनाया था । शांति पूर्वक विरोध करिये । अपनी बात कहने से झिझकिये नहीं । जो गलत है उसकी शिकायत करिये । संपादक के नाम पत्र, आर टी आई, ब्लाग पर अपनी आवाज बुलंद कीजिये और जो सो रहे हैं और सोचते हैं कि देश ऐसा ही चलने दो उनको जगाईये । धीरे धीरे माहौल बदलने लगेगा । जय हिंद ।

    Rumor के द्वारा
    May 21, 2011

    YMMD with that awnser! TX

Tafhim Khan के द्वारा
October 7, 2010

बहुत खूब भाई केएम मिश्रा जी, इतनी सटीक उप्मा के लिए बहुत भूत बधाई।

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    फहीम जी वंदेमातरम ! लेख आपको पसंद आया इसके लिये आभार ।

kajalkumar के द्वारा
October 6, 2010

सबकी अपनी-अपनी ढपली है अपना-अपना राग. पर तान एक ही है..’अपना उल्लू सीधा करने की बिसात’

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    काजल जी वंदेमातरम ! सही कहा आपने अपना उल्लू सीधा करने की बिसात । जनता सब समझ रही है लेकिन अयोध्या मामले में कांग्रेस अंदर अंदर ही गोट खेल रही है । टिप्पणी के लिये आभार ।

sunilrathore के द्वारा
October 6, 2010

mijshra g agar desh men jaativaad aur arakchan jaise system na hote to ye mulla g yadav karhal ke inter college men ped ke neeche lakdi ki kursi par(,jisme do char keele kapde phadne wali hoti hai)baithkar ladko ke saath baitkar time pass kar rahe hote .khair yeh to woh barsaati mendhak hai jo jaane kab kya tarrane lage aur kab koun se gaddhe men kood jaaye pata nahi.vaishyao se bhi giri aur koi neeti hoti hai to woh mulyam jaiso ki raajneeti hoti hai.is desh men reservation (jaati based) kaise khatam hoga par ? is par kuch jaroor likhe.dhanyavad

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    सुनील जी वंदेमातरम ! टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

    Geralynn के द्वारा
    May 21, 2011

    Hey, good to find someone who areges with me. GMTA.

swatantranitin के द्वारा
October 6, 2010

नमस्कार मिश्र जी ! अयोध्या मसले में सबको लगता था की बबाल होगा लेकिन कुछ नहीं हुआ ये हमारी खुदनसीबी है लेकिन शायद कुछ लोगो को देश में शांति अच्छी नहीं लगती और इसीलिए वो लोग इस प्रकार के भाषण देते है कि कुछ भी हो हमे तो वोट से मतलब है | लेकिन अब देश की जनता समझदार हो चुकी है उसको मजहव के नाम पर शायद ही लड़ाया जा सके| जय हिंद जय भारत |

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    वंदेमातरम स्वतंत्रनितिन जी । टिप्पणी के लिये और समर्थन के लिये आभारी हूं ।

Ramesh bajpai के द्वारा
October 6, 2010

मुल्क में सियासत ही इकलौता पेशा है जिसमें पढ़ा लिखा होना कतई जरूरी नहीं है । पढ़ाई लिखाई आमतौर पर सियासतबाजों के लिये अपात्रता साबित होती है । बस भड़काऊ नारे लगाओ और अपनी गोट लाल करो । प्रिय मिश्रा जी इस बार जनता सतर्क है इन पाखंडी सियारों को हुवा हुवा में नहीं फासी . . इनको किसी सत्ता मिलनी चाहिए बहाना कोई भी चलेगा . बहुत बहुत बधाई बंदेमातरम

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    आदरणीय बापजपेई जी सादर वंदेमातरम ! टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

    Gina के द्वारा
    May 21, 2011

    Thanks for sharing. Alyaws good to find a real expert.

atharvavedamanoj के द्वारा
October 5, 2010

आदरणीय मिश्रा जी सादर वन्देमातरम आपने बहुत ही नायाब तरीके से मुलायम की नकली धर्मनिरपेक्षता को निशाने पर लिया है…इस पोस्ट के लिए आपका कोटिशः आभार .. सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम लट्ठ । हजारों पेज में लिखे गये फैसले को पढ़ने की फुसर्त सबको नहीं मिल सकती ।…. बहुत खूब ,”लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर फिर भी मुगले आजम ” नेताओं को किताबों से क्या काम? वे आँखें जो खोलती हैं और नेतागण अगर आँखें बंद नहीं करेंगे तो जनता की आँखे बंद करने कौन आएगा? लेकिन इन्ही दुर्दांत नेताओं में कम्युनिस्ट भी हैं और यकीं जानिये वे न सिर्फ फैसले को पढेंगे बल्कि कुछ ही दिनों में उसको ऐसा तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करेंगे की जनता फिर गुमराह होने लगेगी..और वैसे भी देश की ८०% मीडिया पर इनलोगों का एकक्षत्र आधिपत्य है…इन दुराग्रहियों के दुराग्रह को फुकने के लिए जिस मशाल की आवश्यकता है…वह आपकी लेखनी में प्रचुर मात्रा में विद्यमान है..जय भारत जय भारती

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    आदरणीय मनोज जी सादर वंदेमातरम ! टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

parveensharma के द्वारा
October 5, 2010

मिश्र जी, लाजवाब लिखा है आपने. सच में अयोध्या का फैसला आने से मुलायम सिंह जैसे नेताओं की हवा खराब हो गयी है. धन्य है, इस देश की जनता जिसने नेताजी के इस भड़काऊ प्रयास को सिरे से ख़ारिज कर दिया

    K M Mishra के द्वारा
    October 9, 2010

    प्रवीनजी सादर वंदेमातरम ! टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 5, 2010

आदरनीय मिश्रा जी सादर प्रणाम,जैसे आपने पहले ही दर्शा दिया है कि शेर सियार की चाल समझ कर रुक गया और उसे बोलने दिया,शायद जनता को भी ऐसा ही करने में भलाई है,धन्यवाद

    K M Mishra के द्वारा
    October 10, 2010

    धर्मेश जी वंदेमातरम ! टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 5, 2010

आदरणीय भ्राता श्री को प्रणाम …….. क्या उदाहरण दिया है और किस अंदाज में दिया है वह जबरदस्त है.. काश एक बार सारे सियार इसे देख लेते तो उन्हें खाई में गिरना नहीं पड़ता .. पर क्या करे उन्हें वही अच्छा लगता है …लेकिन एक बात सुकून देने वाली है की हम सभी सतर्क है..अब.. बेहतरीन पोस्ट हमेशा की तरह

    K M Mishra के द्वारा
    October 10, 2010

    निखिल जी वंदेमातरम ! टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

    Augustina के द्वारा
    May 22, 2011

    Your aenswr was just what I needed. It’s made my day!

Satish Mishra के द्वारा
October 5, 2010

मिश्रा जी मुलायम सिंह उन नेताओं में से एक हैं जो अपने लाभ के लिए किसी की भी लाश पर से गुजरने को तैयार रहते हैं। इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि प्रदेश या देश का क्या होगा। इन्हें तो सिर्फ वोट बैंक कब्जिआने से ही मतलब है। लेकिन आप देखें कि अब पीढ़ी बदल चुकी है। अदालत का फैसला आने पर बता दिया है कि अब यह देश कितना परिपक्व हो गया है। मुलायम का यह दिखावटी मुस्लिम प्रेम तब कहां चला गया था जब ये कल्याण सिंह को माला पहनाते घूम रहे थे? इन जैसे नेताओं को इस देश की शांति, सांप्रदायिक सौहार्द, विकास अथवा सम्मान से कोई वास्ता ही नहीं है। बातें बहुत बड़े-बड़े सिद्घांतों की करते हैं लेकिन सच सिर्फ इतना है कि कैसे भी कुर्सी मिल जाए।

    K M Mishra के द्वारा
    October 10, 2010

    सतीश जी वंदेमातरम ! टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

    Belle के द्वारा
    May 21, 2011

    That’s not just the best asnwer. It’s the bestest answer!

आर.एन. शाही के द्वारा
October 5, 2010

श्रद्धेय मिश्रा जी, प्रणाम! मुलायम जी शेर हैं या सियार, इसपर तो टिप्पणी नहीं कर सकता, लेकिन बूढ़े हो चले हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है । जब सही तरीक़े से शिकार हाथ आता नहीं दिख रहा है, तो दलदली धार में खड़े होकर सोने के कंगन दिखा कर लुभा रहे हैं । लेकिन अब पब्लिक सब जान चुकी है । साधुवाद ।

    K M Mishra के द्वारा
    October 10, 2010

    शाही जी वंदेमातरम ! आपने सही कहा । जनता सब जानती है । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

R K KHURANA के द्वारा
October 5, 2010

प्रिय मिश्र जी, मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूँ ! आपने बहुत सही कहा है ! जनता को शांत करने वाले कम है लड़ने वाले ज्यादा ! वरना उनका खीर-हलवा कैसे चलेगा ! राम कृष्ण खुराना

    R K KHURANA के द्वारा
    October 5, 2010

    कृपया लड़ने की जगह लडाने पढ़ें ! गलती से लड़ने बन गया ! खुराना

    K M Mishra के द्वारा
    October 10, 2010

    काका वंदेमातरम ! टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

Aakash Tiwaari के द्वारा
October 5, 2010

आदरणीय मिश्रा जी, बहुत खूबसूरत तरीके से बेइज्जत किया है आपने नेताओं को….धन्यवाद……….. आकाश तिवारी

    K M Mishra के द्वारा
    October 10, 2010

    आकाश जी वंदेमातरम ! टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।


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