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जग बौराना: लिव इन रिलेशन के सदके ।

Posted On: 27 Oct, 2010 में

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लेखक: श्री नरेश मिश्र


साधो, सुप्रीम कोर्ट में नारी शक्ति की बिजली चमकी । हमारी आंखें डर के मारे बन्द हो गयीं । गनीमत हुयी कि हम अंधे नहीं हुये । आंखों की रोशनी चली जाती तो हम बुढ़ापे में ठोकर खाते । हमें कौन सहारा देता । हमारी नारी बेचारी तो हमारा साथ छोड़कर अल्ला मियां को प्यारी हो गयी । वह सचमुच बेचारी थी । उसने हमारे जैसे बेपरवाह, गरीब, कलमकार के साथ लड़ते झगड़ते, रूठते मनाते जिन्दगी के पचास बरस गुजार दिये । पता नहीं किस पोंगा पण्डित ने उसके जेहन में यह जहर भर दिया था कि पति को फैशन के मुताबिक हर रोज बदला नहीं जा सकता है । पति का चीर एक बार पहना तो उसे मरने तक उतारने की मनाही है ।


साधो, हमारे मुल्क में करोड़ों ऐसी अन्धविश्वासी, गयी गुजरी, गलीज दिमाग औरतें हैं जो एक ही मर्द के साथ सारी जिंदगी गुजार देती हैं । लगता है इस मुल्क का यह प्रदूषण कभी दूर नहीं होगा ।


ये अनपढ़ नारियां कुछ नहीं जानतीं । इन्हें इक्कीसवीं सदी की बयार छू कर भी नहीं निकली, ये लिव इन रिलेशन से महरूम हैं । इन्होंने वह क्लब कभी नहीं ज्वाइन किया जिसमें वाइफ, हस्बेण्ड की अदला बदली होती है । नया मर्द, नयी औरत का जायका काबिले बयान नहीं । इस जायके को वही जानता है जिसने कभी इसका सुख उठाया हो ।


इक्कीसवीं सदी के माहौल में हजारों बरस पुरानी लीक पर चलना कौन सी समझदारी है । इस तरह मुल्क तरक्की की सीढ़ियों पर चढ़ कर विकास के शिखर पर कैसे पहुंचेगा ।


मामला काबिले फिक्र है इसीलिये एक सम्मानित महिला वकील ने यह सवाल सुप्रीमकोर्ट में उठाया है । मामला एक फैसले से जुड़ा है जिसमें न्यायमूर्ति ने एक रखैल के लिये ‘कीप’ शब्द का इस्तेमाल किया । महिला वकील ने पूछा है कि क्या कोई औरत किसी मर्द को रखैल रख सकती है ।


सवाल मौजूं, पेचीदा और दिलचस्प है । महिला वकील के सवाल में नाराजगी भरी आधुनिकता है लेकिन उन्होंने खुद को अतिआधुनिक होने से बचा लिया । वकील की दलील बेहद शातिर होती हैं । हम तो पुरातनपंथी, खण्डहरों में विचरने वाले जिंदा प्रेत माने जाते हैं लेकिन हमें भी मालूम है कि बहुत सी अतिआधुनिक महिलाएं मर्दों को रखैल रखती हैं । उन्हें अंग्रेजी में ‘जिगालो’ कहा जाता है । मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों में जिगालो पैसे पर अपनी सेवाएं देते हैं । थोड़ा कहा बहुत समझना, चिट्ठी को तार समझना । बात को अफसाना और घास को दाना बनाना वाजिब नहीं है । इशारों को अगर समझो, राज को राज रहने दो ।


साधो, वकील साहिबा को ‘कीप’ शब्द पर एतराज है । ‘कन्कोबाइन’ पर उन्हें नाराजगी है । रखैल लफ्ज पर उनका भड़कना लाजिमी है । जजों की लाचारी है कि उन्हें जजमेंट लिखने के लिये डिक्शनरी में दर्ज शब्द ही इस्तेमाल करने पड़ते हैं । इस मर्ज का क्या इलाज है । संसद में कानून पास कर डिक्शनरियों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिये । कानून पास करने में देर हो तो आरडिनेन्स लागू कर देना चाहिये । सुप्रीम कोर्ट ये दोनो काम नहीं कर सकती । शिकायत संसद पर है तो गुस्सा सुप्रीम कोर्ट पर कैसे उतारा जा सकता है ।


सम्मानित वकीलसाहिबा को लिव इन रिलेशन पर कोई एतराज नहीं है । इस रिलेशन पर तो सुप्रीम कोर्ट पहले ही मोहर लगा चुकी है । इस रिलेशन का दायरा बताने का काम बाकी था । कोर्ट ने अपनी समझ से यह जिम्मेदारी निभा दी ।


मामला दक्षिण भारत की एक फिल्म अभिनेत्री खुश्बू से जुड़ा था । इस मामले पर फैसला देते हुये कोर्ट ने कहा था कि बालिग मर्द और औरत अपनी सहमति से साथ रह सकते हैं । फैसला लिखते वक्त एक माननीय न्यायधीश ने अपनी सारी हदें तोड़ दीं । उन्होंने लिखा कि भगवान श्री कृष्ण और भगवती राधा के बीच लिव इन रिलेशन था । यह मिसाल देने की कोर्ट को कोयी जरूरत नहीं थी । इस मिसाल के बिना भी कोर्ट का फैसला अधूरा न रहता लेकिन माननीय न्यायधीश को करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर चोट करनी थी । वे अपना काम कर गये । उन्हें माननीया वकील साहिबा बेहिचक अति आधुनिकों की जमात में शामिल करेंगी । उन्होंने यह जजमेंट जरूर पढ़ा होगा, पढ़ा नहीं होगा तो सुना जरूर होगा । करोड़ों हिंदुओं के कलेजे पर घाव करने वाला यह जजमेंट आज भी जस का तस है । इसकी भाषा में सुधार करने पर किसी ने नहीं सोचा । इस मिसाल से बेजबान हिंदुओं के दिल पर क्या गुजरी होगी जिनका सवेरा श्री राधा के नामजप से होता है, जो जय श्रीराधे कह कर एक दूसरे का अभिवादन करते हैं ।


गरज ये कि हिंदू तो जन्म से ही साम्प्रदायिक होता है । सेकुलर होने के लिये उसे बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है । जो जितना पढ़ा लिखा है उतना अधिक सेकुलर है । ऐसे ही पढ़े लिखों के बारे में जनाब अकबर इलाहाबादी ने फरमाया था -


हम ऐसी कुल किताबों को काबिले जब्ती समझते हैं ।

जिनको पढ़ कर लड़के बाप को खब्ती समझते हैं ।


बात निकलेगी तो बहुत दूर तक जायेगी । रखैल, कीप या कन्कूबाईन शब्द बदबूदार हैं लेकिन रखैल या कीप होना उससे ज्यादा अफसोसजनक है । यह समाज पुरूष प्रधान रहा था, रहा है, आगे क्या होगा राम जी जाने । चंद महिलाओं के अतिआधुनिक हो जाने से समाज की स्त्रियों में रातों रात कोई बदलाव नहीं आ सकता । मजबूरी में पैसे के बदले जिस्म बेचने वाली बेबस औरतों को सेक्सवर्कर का नाम देने से समाज की कालिख नहीं धुल सकती । कोई महिला अपनी इच्छा से जिस्म बेचने का धंधा नहीं करती, रखैल, कीप नहीं बनती । वकील साहिबा पेड़ की पत्तियां तोड़ना चाहतीं हैं, जहरीले पेड़ को जड़ से उखाड़ना नहीं चाहतीं । यह जड़बुद्धि कलमकार उनसे क्या गुजारिश करे । जजों पर खीज उतारने के बजाये उन्हें सजामसुधार पर अपना कीमती वक्त खर्च करना चाहिये ।

La =>जज साहेब ये बेचारी रखैल नहीं है ये तो बस एक शादीशुदा  मर्द के साथ लिवइन रिलेशन में है । इस बेचारी का क्या पता कि ये किसी दूसरी औरत का घर/मर्द तोड़ रही है ।

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आर.एन. शाही के द्वारा
November 13, 2010

श्रद्धेय मिश्र जी, चाहे कुछ भी कह लिया जाय, लेकिन भारतीय शब्दकोष तो रखैल ही समझेगा । हां, जैसे गंजे को गंजा कहना एक गाली जैसा ही लगता है, अत: आपत्ति भी उचित ही है । साधुवाद ।

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
October 29, 2010

प्रिय श्री के एम मिश्र जी, एवं श्री नरेश मिश्र जी, रचना के हिसाब से तो संबोधन तो श्री नरेश मिश्र जी का ही होना चाहिए पर आप सूत्रधार है इस लिए आप को ही संबोधित कर रहा हूं। एक आप से अर्ज है कृपया श्री नरेश मिश्र जी का परिचय हमें भी बताऐं क्‍योंकि मै तो नया रीडर हूं और आप की पुरानी पोस्‍टों को अभी नहीं पढ़ पाया हूं शायद आप ने कहीं उल्‍लेख किया हो। मुद्दा तो वही है पर जो मै एक साधारण बोलचाल की भाषा में कह चुका पर श्री नरेश मिश्र जी ने एक सुलझे हए प‍िरिपक्‍व लेखक की तरह उस अवेदना को ब्‍यां किया है जो कि काबिले तारिफ है और हम सिखाडुओं को कुछ शिक्षा भी देता है। सलाद की प्‍लेट वही है पर उस को सजा कर परोसने का तरीका कोई प्रोवेशनल ही जानता है। एक अच्‍छा लेख जिस को बार-बार पढ़ने को मन करे। धन्‍यवाद। सादर प्रणाम व नमस्‍कार ।

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
October 28, 2010

आदरणीय श्री नरेश मिश्र जी व प्रिय श्री के एम मिश्र जी, सादर प्रणाम व नमस्‍कार । साथ रहने का संबंध या दीपक जोशी जी के शब्‍दों में बिन फेरे हम तेरे का संबंध है ही ऐसा की बार-बार अनेकों सवाल खड़ें करे । वकील साहिबा को किसी शब्‍द विशेष पर आपत्ति हैं लेकिन उन्‍होंनें यह स्‍पष्‍ट क्‍यों नहीं किया कि इस संबंध पर आपत्ति है या नहीं । आप दोनों का आभार की आपनें निर्णय के उस पहलू को भी लोगों के सामनें रखा जिसे मीडिया ने ज्‍यादा तव्‍वजों ना दी थी । भगवान श्री कृष्ण और भगवती राधा के बीच का संबंध का उल्‍लेख अपने मनोभावों में करने वाले माननीय न्‍यायाधीश महोदय की शिक्षा-दीक्षा संभवत: केवल अंग्रेजी पुस्‍तकें व अंग्रेजी साहित्‍य के माध्‍यम से हुई होगी । अन्‍यथा वे ऐसी अनावश्‍यक टिप्‍पणी कदापि ना करते । चलिए इस बहानें संबंधों की व्‍याख्‍या का नया दौर तो चला है और भारतीय संस्‍कृति व संबंधों पर भी कुछ चर्चा तो हुई । अरविन्‍द पारीक बीमारी की वजह से काफी समय से इस मंच से दूर था अत: आपके लगभग 5-6 लेख नहीं पढ़ पाया हूँ । उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ । अरविन्‍द पारीक

s.p.singh के द्वारा
October 28, 2010

प्रिय मिश्र जी प्रणाम , लगता है की सम्मानित वकीलसाहिबा को लिव इन रिलेशन पर कोई एतराज नहीं है । इस रिलेशन पर तो सुप्रीम कोर्ट पहले ही मोहर लगा चुकी है । इस रिलेशन का दायरा बताने का काम बाकी था । कोर्ट ने अपनी समझ से यह जिम्मेदारी निभा दी ।तो अब वकीलसाहिबा को तो केवल \"रखैल \" नाम पर एतराज क्यों है उन्होंने गनीमत तो या की किसी नए नाम का सुझाव नहीं दिया जो की उन्हें अपनी विद्द्वता की हिसाब से देना चहिये था – पहले तो केवल नेताओं में ही \"छपास\" और \"दिखास\" की बीमारी ग्रस्त थे अर्थात अखबार में छपने की और टी वी में दिखने की परन्तु यह बिमारी अब देश के हर आम और खास लोगों में होने लगी है – आगे क्या होगा ऊपर वाला ही जाने —–!!!!!!!!!!

ashvinikumar के द्वारा
October 27, 2010

भाई मिश्रा जी एवं परम आदरणीय श्री नरेश मिश्र जी( लिवइन रिलेशन) से भी कहीं अधिक देश का विकाश हो चुका है ,पहले देश में (औरतों को सेक्सवर्कर) हुआ करती थीं ,हालाँकि पुरुष प्रधान समाज ने ही उन्हें (सेक्सवर्कर) बनने पर विवश किया था ,,लेकिन आज का दौर कुछ अलग है ,,आज अच्छी जींस या ब्रांडेड लिपस्टिक किस किस नाम का उल्लेख करूं (वैसे भी सौन्दर्य प्रसाधन के विषय में मेरा ज्ञान सीमित है ) की खातिर इस प्रवित्ति को अपना रही हैं,,और आज का पुरुष भी कुछ कम नही है (पुरुष वेश्या ) यह शब्द भी आपने सुना होगा ,,पुरुष की मर्यादा की बात ही छोडिये ऐसा पुरुष तो गिर ही चुका है ,,लेकिन उनकी मांग करने वाली हमारी भारतीय नारी जो कभी घर की मर्यादा कही जाती थी,,******प्रसंग को विराम दे रहा हूँ क्योंकि भावावेश में जब उँगलियाँ चलने लगतीं हैं तो कोई न कोई आहत अवश्य हो जाता है ,,शायद यहाँ भी महिला स्वतंत्रता का कोई पैरोकार निकलकर सामने आ जाये *………..आपका

atharvavedamanoj के द्वारा
October 27, 2010

आदरणीय नरेश जी द्वारा लिखित यह व्यंग्य पढ़ कर आपके और शाही जी के व्यंग्यों की याद ताज़ा हो गयी…सामयिक घटनाक्रम पर आधारित बहुत ही उम्दा लेख…अभी अभी मैंने इसी बात की चर्चा की है…संयोग से करवा चौथ का पवन पर्व भी है…राखी सावंत ने तो पूरा एक स्वयंबर ही रच दिया था…हस्र क्या हुआ सबको पता है…आजकल तो मर्यादा के भी उदहारण अमर्यादा के साथ दिए जा रहे है और यदि यह साम्य भी है…तो बड़ा ही विद्रूप साम्य है…नारी शक्ति का तो मैं हमेशा से ही पुजारी रहा हूँ लेकिन अगर दुर्गा की शूर्पनखा से तुलना होगी.तो ..क्या कहा जायेगा?

October 27, 2010

मिश्रा जी……….. ये भी बड़ी अजीब बात है कभी ये कोर्ट राम जन्म भूमि पर मालिकाना हक तय करने के लिए मंदिर परिसर को खोदने को कहती हैं…….. और रामायण और अन्य धर्मग्रंथों में लिखे सबूतों को पर्याप्त नहीं मानती ………….. और कभी बिना समझे और बिना जाने राधा और कृष्ण के रिश्ते पर अपनी घटिया टिपण्णी दे देती हैं…………. अच्छे लेख के लिए हार्दिक बधाई……….

rajkamal के द्वारा
October 27, 2010

जिसको हमने साथ में रखा ..अगर ज़रा सा उसका ख्याल रख लिया तो उसको आप लोगो ने रखैल की संज्ञा दे दी …बहुत नाइंसाफी है…. बाकि जिस किसी ने भी भगवान के पावन अध्यात्मिक रिश्ते का इस सन्दर्भ में कोई हवाला दिया है …..वोह तो कोई नास्तिक ही हो सकता है …विषैली और दूषित मानसिकता वाला …. और इस से ज्यादा आपके पूज्यनीय गुरु जी के लेख पर मैं नाचीज क्या कह सकता हूँ … आदर सहित ….एक पाठक

Aakash Tiwaari के द्वारा
October 27, 2010

आदरणीय श्री मिश्रा जी, लगता है वो जज जिसने ये लिखा की ” भगवान श्री कृष्ण और भगवती राधा के बीच लिव इन रिलेशन था “..एक बाह घटिया मानसिकता के घटिया कालेज के घटिया पाधाई करके वकील बन गए जिन्हें ये नहीं पता की भगवान श्री कृष्ण और राधा का रिश्ता क्या था…कितने दूषित विचार हो गए है लोगों के…..जो अपने पापों को छुपाने के लिए भगवान का साथ ले लेते है…. आकाश तिवारी

Rashid के द्वारा
October 27, 2010

मिश्रा जी,,, अकबर इलाहाबादी का शेर देख कर उनकी एक कविता याद आ गई नाम है ” ज़माना अ नव” इस की एक पंक्ति लिखना चाहूँगा !! “नया काबा बनेगा मगरीबी पुतले सनम होंगे” मगरीबी पुतले से तात्पर्य है वेस्टर्न लोग,, और आज समाज में यही हो रहा है !! हम बस किसी तरह से अँगरेज़ हो जाना चाहते है.. राशिद

parveensharma के द्वारा
October 27, 2010

मिश्रा जी, लिव इन रिलेशनशिप पर उम्दा व्यंग्य. एक बात और यह सही है की न्यायपालिका का स्थान बहुत ऊँचा है हमारे देश में. लेकिन यदि न्यायपालक अगर राधा-कृष्ण के भागवत और शाश्वत प्रेम को लिव इन रिलेशनशिप की संज्ञा दे तो इसे हम क्या समझें……..हे कृष्ण! इन्हें माफ़ करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कह रहे हैं.

Ramesh bajpai के द्वारा
October 27, 2010

वकील साहिबा पेड़ की पत्तियां तोड़ना चाहतीं हैं, जहरीले पेड़ को जड़ से उखाड़ना नहीं चाहतीं । यह जड़बुद्धि कलमकार उनसे क्या गुजारिश करे । प्रिय श्री मिश्रा जी ये जमाना ही अजब है . जो गजब हो जय थोडा है जहा तक श्री कृष्ण व राधा जी की बात है वह तो वासना रहित दिब्य लीला थी . आदरणीय दद्दा को मेरा चरण स्पर्श पंहुचा दे .

Abhishek Awasthi के द्वारा
October 27, 2010

प्रिय मिश्र जी सादर प्रणाम, आपने बहुत सही लिखा है, एक तरफ ये बोलती हैं की अगर कोई स्त्री किसी पुरुष को रखे तो, और दूसरी तरफ ये गुजरे भत्ते की मांग सिर्फ पति से ही करती है. क्या कोई पति अपनी पत्नी से गुजरे भत्ते की मांग नहीं कर सकता क्या? तब इन लोगो को आपत्ति हो जाएगी और तब पता नहीं क्या बोलेंगी. अब इनके वचन ये ही जाने. धन्यवाद

sdvajpayee के द्वारा
October 27, 2010

भाई श्री मिश्र जी,   रखैल शब्‍द सामंतवादी सोच-व्‍यवस्‍था का है। इसमें समानता नहीं है। संस्‍कारी समाज के लिए तो लिव इन रिलेशन भी स्‍वीकार्य नहीं है।ऐसे ‘रिश्‍ते’ समाज को कमजोर ही करते हैं।

jalal के द्वारा
October 27, 2010

आधुनिकता और स्त्री के आजादी के नाम पर देश में जिस तरह से live in relation और वेश्यावृति को स्वीकृति मिली हुई है उसमें देश की खुशहाली या मुक्त जीवन तो किसी भी तरह नहीं है, हाँ यह तो तय है की अब इस की आड़ में लोग जो चाहे करेंगे. और पुरे समाज और संस्कृति की इज्ज़त इन लोगों ने दांव पर लगा दिया है. अब कोई माँ बाप अपने बच्चो से अच्छे संस्कार के उम्मीद ना करे, कोई पत्नी अपने पति पर भरोसा न करे, कोई पति अपने पत्नी का विश्वाश न करे क्यूंकि यही रहा तो ऐसा ही हो जायेगा. आज इसके साथ तो कल उसके साथ. यह रोज़गार का हिस्सा बना दिया गया है. और तो और कुछ कह भी नहीं सकते. और नपुंसक होते पुरुषों ने अपनी नपुंसकता इसमें छुपा ली है.

R K KHURANA के द्वारा
October 27, 2010

प्रिय मिश्र जी, हम आपके धन्यवादी हैं की आप श्री नरेश मिश्र जी के इतने अच्छे व्यंग हम तक पहुंचा रहे है ! नरेश जी ने एक बहुत ही अच्छा मुद्दा उठाया और उसके बारीक पहलुयों पर अपनी पैनी नज़र दौड़ा कर अपनी कलम का जादू बिखेरा है ! उनकी यह लाइन : इस मिसाल से बेजबान हिंदुओं के दिल पर क्या गुजरी होगी ….बहुत सार्थक लगी ! यह सिद्ध करता है की हिन्दू सिर्फ चिल्ला सकते है (कई बार वो भी नहीं) कर कुछ नहीं सकते ! और रखैल शब्द पर इतराज़ करने वालियां रखैल बनने-बनाने में इतराज़ नहीं करती ! क्या खूब व्यंग है ! मेरी और से आप दोनों को बधाई ! आपके पिताश्री को नमस्कार राम कृष्ण खुराना

nishamittal के द्वारा
October 27, 2010

मिश्राजी,आँखें खोलने वाला पैना व्यंग्य.ये हमारे देश,समाज के लिए विडंबना ही है कि भावनाओं पर आघात करने वालों के लिए कोई सजा नहीं और लोगों की बात छोड़ दें उनमेसे भी कोई नहीं आवाज उठाता जिनके आराध्यों से सम्बंधित विवादित उदाहरण जान बूझ कर दिए जाते हैं.

chaatak के द्वारा
October 27, 2010

आदरणीय श्री नरेश मिश्र जी, आपके पोस्ट पर कोई कमेन्ट करना सूरज को दीपक दिखाने जैसी बात है| आधुनिक होती नारियां एक तरफ तो समाज के पुरुषवादी होने का रोना रोती हैं और दूसरी तरफ उन्ही की कीप और लिव-इन-(पता नहीं क्या) कहलाने के लिए इस ‘पता नहीं क्या की तरफदारी करती हैं’ के तरफ कहती हैं कि कोई महिला रखैल रखे तो कैसा लगेगा और दूसरी तरफ जिगोलो की तादात बढती जाती है| अब महिला जिगोलो रखे या पुरुष कीप फर्क क्या पड़ता है ‘छुरी खरबूजे पर गिरे या खरबूजा छुरी पर’ कटेगा कौन? इस मामले में भी नारियां एक बार फिर आधुनिक तरीके से पुरुषों द्वारा छली ही जा रही है पहले यही बात समाज ने कही तो एक व्यक्ति के हाथों शोषण का रोना था, अब अदालत कह रही है शोषण करने का अधिकार एक को नहीं कई को दो, शोषण रुके न रुके टेस्ट तो बदलता रहेगा| हो गई न पुरुषों की बराबरी! कवियित्री कमला दास के जीवन पर नज़र डालें और देखें उन्हें हर बार क्या मिला? वे इससे अच्छी और लोकप्रिय कवियित्री हो सकती थीं और उनके पति के द्वारा दिए गए दर्द उनकी कविताओं में सदियों तक पढ़े जाते और बदतमीज़ पति को रहती दुनिया तक गालियाँ मिलती लेकिन उन्होंने अपनी सेक्स लाइफ को कविताओं में डाल कर साहित्य का भी तिया-पांचा कर डाला| क्या कभी उन्हें दुनिया कीट्स जैसे प्रेमी कवि की श्रेणी में स्वीकार करेगी? क्या कमला दास के पति को वो ज़िल्लत उठानी पड़ेगी जो कीट्स की प्रेमिका को हर रोज़ पाठकों की नज़रों में गिर कर उठानी पड़ती है? इन सवालों का जवाब कोई महिला ही महिलाओं के लिए दे तो शायद ज्यादा हितकारी होगा| सिर्फ पुरुषों को गरियाने उनकी निंदा करने या उनकी कीप बनकर उनकी और अपनी वासनाओं की तृप्ति करने से नारी उत्थान नहीं होगा| नारी उत्थान नारी की अपनी गरिमा और अपनी मेधा को चरम विकास की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति से होगा| श्री मिश्र जी का आभार जो उन्होंने इस विषय पर एक अच्छे लेख के माद्यम से चेतना लाने का प्रयास किया!


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