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जग बौराना : विधवा रोवे सेर सेर.......

Posted On: 29 Oct, 2010 में

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लेखक: श्री नरेश मिश्र

.

कांग्रेस के चुनाव का एक माहौल जाना माना है । कांग्रेस जब चुनाव हारती है तो एक सिर का बलिदान मांगती है । गुजरात मे नगरमहापलिका से पंचायत चुनाव तक कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया । बलि का बकरा बनने के लिये सिद्धार्थ पटेल को आगे आना पड़ा । बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले । सिद्धार्थ पटेल ने हार की जिम्मेदारी सिर माथे लेते हुये इस्तिफा दे दिया । इस चुनाव में हारने के बाद पहले दौर में पटेल ने इवीएम मशीन पर आरोप लगाये थे । उन्होने कहा कि भाजपा ने इवीएम में गड़बड़ी कर दी है । पहली बार किसी कांग्रेसी के मुंह से यह सचाई सुन कर हमारी अक्ल शीर्षासन करने लगी । यही बात तो बहुत दिनों से विरोधीदल के लोग कह रहे थे । कांग्रेस इसे मानने को तैयार नहीं थी । केन्द्र की सत्ता पकार कांग्रेस सदा सुहागिन है, अब उसे इवीएम पर रूलाई क्यों आ रही है । अवधी की एक कहावत है -


विधवा रोवे सेर सेर । सुहागिन रोवे सवा सेर ।



कांग्रेस के दिन तब बहुरे जब मुख्य चुनाव आयुक्त जनाब नवीन चावला हुये और एकाएक बाजी पलटने लगी । अब उसी कांग्रेस को इवीएम पर शिकायत
क्यों हो रही है । यह बात देशवासियों को समझनी चाहिये ।


कांग्रेस का तरीका जानामाना है । हारने पर यह पार्टी किसी को बलि का बकरा बनाती है । जो नेता नाकामयाब होते हैं, पस्त होते हैं उन्हें कुछ दिन तक कूड़े, गोदाम में रहना होता है, बाद में वो राज्यपाल बना दिये जाते हैं । उनके लिये एक अच्छी कुर्सी की तलाश जारी रहती है और लोग भूल जाते हैं । शिवराज पाटिल को लोग भूले न होंगे । गृहमंत्री थे तो देश का बंटाधार कर दिया था । आज बड़ी शान से, मंछों पर ताव देकर कांग्रेस के मंच पर जलवा अफरोज हैं और उनका साज श्रंगार भी बदस्तूर जारी है ।


इन दिनों बिहार में विधान सभा चुनाव चल रहे हैं । राहुल गांधी दौरे पर हैं । कांग्रेस बहुत उत्साहित है । राहुल गांधी भाषण देने से पहले, भाषण देने के बाद आस्तीन चढ़ाते हैं । पता नहीं वो किसे चुनौती देते हैं । अभी शरद यादव ने उनकी नकल उतारी और जोश में कुछ ऐसी बाते कह गये जो नहीं कहनी चाहिये ।


यह बांह चढ़ाने की राजनीति समझ में नहीं आती । जनता समझती है कि उनके युवानेता हमलावर हो रहे हैं । समझ में नहीं आती कि ये कौन सी अदा है । हमने हिटलर की अदा के बारे में सुना था । जब वह मंच पर आता था तो एक खास स्टाईल का इस्तेमाल करता था । लेकिन राहुल गांधी भाषण देने के पहले, भाषण देने के बाद । किसी से मिलने के पहले, किसी से मिलने के बाद । खुश होने से पहले, खुश होने के बाद । काम पूरा होने के पहले, काम पूरा होने के बाद, वह बांह चढ़ान नहीं भूलते । इस बांह में क्या करिश्मा है, यह समझने की जरूरत है ।


वैसे कुल मिलाकर राहुल बाबा की कामयाबी अमेठी और रायबरेली तक ही महदूद है । आगे की राम जाने । तकदीर में होगा तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल ही जायेगा । कम से कम कांग्रेसी तो यही समझते हैं कि उनसे ज्यादा काबिल प्रधानमंत्री कोयी हो ही नहीं सकता,  ठीक वैसे ही जैसे जम्मु कश्मीर का मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से ज्यादा काबिल कोयी हो नहीं सकता । जवानी का जोश है, लहर बहर है । जवानी दीवानी होती है । क्या कर डाले । अल्लामियां को भी पता नहीं होती । कहावत भी है अल्ला मेहरबान तो …………………….।


हमें इस बात से कोयी फर्क नहीं पड़ता कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन जायेंगे । उनका स्वागत है । इस देश के करोड़ों जवान बेरोजगार हैं, सड़कों पर चप्पलें घिस रहे हैं । किसी एक जवान को (अगर42 वर्ष की उम्र में आप उसे जवान कह सकते हैं) मौका तो मिलेगा ।


उनके पिता स्व0 राजीव गांधी भी जवानी में प्रधानमंत्री बने थे और उन्होंने अपनी माता जी के दुखद निधन पर कहा था कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती है । धरती कांप गयी , सिखों का नरसंहार हो गया । इसके आलावा उन्होंने पंचायत चुनाव की शुरूआत की । ग्रासरूट लेवल तक उन्होंने लोकतंत्र को पहुंचा दिया । संसद में जो रिश्वतखोरी होती है, वह अब गांव में भी हो रही है । उसके साथ-साथ हत्याएं हो रही हैं, लाठियां चल रही हैं, अपहरण हो रहा है, लोग पीटे जा रहे हैं । बापू जी की आत्मा स्वर्ग से यह ग्रामस्वराज्य देख रही होगी । वो सोच रहे होंगे कि हमने क्या सोचा था और हमारे नाम पर 2 अक्टूबर को हमारी समाधि पर जाकर हुकूमत करने का लाईसेंस लेने वाले क्या कर रहे हैं । किसी महापुरूष के नाम का इससे ज्यादा बेजा इस्तेमाल इतिहास में देखने को नहीं मिलता है। कांग्रेस की करनी, चाल, चरित्र देख कर वही शेर याद आता है कि

शैख ने मस्जिद बना मिस्मार बुत खाना किया ।

पहले एक सूरत भी थी अब साफ वीराना किया ।

Big Bus Busin


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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Aakash Tiwaari के द्वारा
November 1, 2010

आदरणीय मिश्रा जी, मै तो बस इतना कहूँगा \"मुझे कांग्रेस पसंद नहीं\’ आकाश तिवारी http://aakashtiwaary.jagranjunction.com

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 30, 2010

आदरणीय भ्राता श्री …… कोंग्रेस पार्टी आजादी के बाद एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह बन चुकी है और उसके नेता (नेता तो कोई है नहीं ..कार्यकर्ता कह सकते है क्योकि वे बेचारे स्वयं ही खुद को नेता नहीं मानते ..) वे लगातार कंपनी के प्रमोशन में लगे रहते है ..और उत्तराधिकारियों के महिमामंडन ..गलतियों के खंडन में में लगे रहते है…. व्यंग में ही बहुत सटीक बात कह दी है आपने…

Raj के द्वारा
October 30, 2010

आदरणीय मिश्रा जी, अंत में जो शेर है कृपा करके उसका अर्थ समझा दें. राज

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 30, 2010

आदरनीय मिश्र जी,आदरनीय श्री नरेश मिश्रा जी के माध्यम से एक बहुत ही आवस्यक मुद्दे पर एक बयंग पढने का मौका मिला,धन्यवाद!

R K KHURANA के द्वारा
October 30, 2010

प्रिय मिश्र जी, श्री नरेश मिश्र जी का एक और सशक्त व्यंग देकर आपने हम सबका मनोरंजन किया है ! धन्यवाद ! यह आज की राजनीती का कच्चा चिटठा है ! इससे कोइ भी इंकार नहीं कर सकता ! अच्छी रचना के लिए धन्यवाद खुराना

parveensharma के द्वारा
October 30, 2010

मिश्र जी, इस व्यंग्य में कही एक-एक बात सही है. लेकिन एक पार्टी विशेष पर टारगेट करना………कहीं लोग ये न समझे की मिश्र जी विशुद्ध रूप से राजनीतिक हो गये हैं हैं..

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
October 30, 2010

आदरणीय श्री नरेश मिश्र जी व प्रिय श्री के एम मिश्र जी, सादर प्रणाम व नमस्‍कार । यह इस देश के मीडिया की फितरत है कि जो एक बार मन में बैठ गया उसके सारे दूर्गुण छूपा कर केवल गुणगान ही किया जाता है । राज तंत्र की आदत भी हमारी जीन से मिटी नहीं है । इसलिए राजा की हजार गलतियां माफ हो जाती है लेकिन दरबारी या प्रजा का सर कलम कर दिया जाता है । गांधी जी को जितना कांग्रेस ने लूटा-खसोटा है उतना किसी और पार्टी ने नहीं । उनके नाम की आड़ में वे कर्म भी किए गए हैं जो स्‍वयं गांधी जी होते तो शायद आत्‍महत्‍या कर लेते । अरविन्‍द पारीक

October 29, 2010

मिश्रा जी…………….आपने सही कहा है की………… कांग्रेस जब चुनाव हारती है तो एक सिर का बलिदान मांगती है । और उससे भी अफ़सोस की बात है की ये चुनाव जीतने पर सेहरा गाँधी परिवार एक सर और हरने पर किसी और का सर …………… अच्छे लेख के लिए हार्दिक बधाई……………..

Ramesh bajpai के द्वारा
October 29, 2010

प्रिय   श्री मिश्रा जी हमरे हिय यह कहावती दुहरी तरह कही जाति है ” कहुरे लागि सत भतरी रोवै ” . तो सब करम करि कै अब ये लोग गंगा नहा रहे है [सत्ता कै गंगा ] राम भला करै . आदरणीय दद्दा को चरण स्पर्श पहुचादे .

आर.एन. शाही के द्वारा
October 29, 2010

श्रद्धेय मिश्रा जी, प्रणाम! यही ईवीएम है, जिसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाने वाले दक्षिण के एक शख्स पर कांग्रेस ने गलत सलत आरोप लगाते हुए कई मुक़दमें थोप दिये, और आज खुद स्वीकार कर रही है कि इसमें छेड़-छाड़ संभव है । यही दोहरी नीति दोहरे चरित्र वाली कांग्रेस की खासियत रही है । राहुल बाबा को यदि कांग्रेस के सत्तासीन रहते चुनाव हुए, तो प्रधानमंत्री के रूप में तो हमें देखने के लिये तैयार ही रहना चाहिये । बाक़ी देश का जो होता रहा है, वही होना है । साधुवाद ।

ashvinikumar के द्वारा
October 29, 2010

परम आदरणीय श्री नरेश मिश्र जी एवं बन्धु मिश्रा जी (एक कहावत आपने भी सुनी होगी जब हो साठा तभी बनेगा पाठा ) जवानी की शुरुवात तो पता है लेकिन बुढ़ापे की कब होती है ? हम बांह चढ़ा कर कहते हैं ,दे दो वरना पछ्तावोगे , ताल ठोंक कर पटकेंगे,तब बाप बाप चिल्लाओगे,, कुछ दिन पहले उपवाश पर थे,तुम ना समझो कमजोर है हम , अब खूब मलाई खा खाकर , फिर मोटे तगड़े कंग्रेश हैं हम ,,

Tufail A. Siddequi के द्वारा
October 29, 2010

मिश्रा जी अभिवादन, “विधवा रोवे सेर सेर । सुहागिन रोवे सवा सेर ।” बधाई स्वीकारिये.


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