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धर्मनिरपेक्षता का असंवैधानिक पक्ष

Posted On: 11 Nov, 2010 में

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हिंदू धर्म और हिंदू के मूल में धर्मनिरपेक्षता हजारों साल रही है । यह एक ऐसा तत्व है जिसके बारे में किसी हिंदू को बताने की जरूरत नहीं है । हमारे मूल में वसुधैव कुटुबकंम… सभी प्राणियों में एक परमतत्व को देखने की भावना… सत्य के प्रति जबरदस्त आग्रह और सभी प्राणियों के कल्याण की भावना हमेशा से रही है । विश्व भर में मानवाधिकार पर बहस मैग्नाकार्टा 1215.. पीटिशन ऑफ राइट्स 1628… हैबियस कारपस एक्ट 1679…. बिल ऑफ राइट्स 1689… अमरीकी स्वतंत्रता की घोषणा 1776 से शुरू हुयी । लेकिन इसके विपरीत 5000 साल पहले से ही हमारे यहां -

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत् ।।

(सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े ।)

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की भावना काम कर रही थी । हम सभी प्राणियो के कल्याण की भावना रखते हैं । सभी प्राणियों में मानव भी आता है । मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता इस महान विचारधारा का मात्र एक छोटा सा हिस्सा है ।

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जहां एक तरफ हम पूरी सृष्टि को एक निगाह से देखते हैं उसके विपरीत इस्लाम में मूर्तिपूजकों और स्त्रियों के प्रति एक नकारात्मक विचारधारा है । वह उन्हें मानवाधिकार.. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र जैसे मूलभूत सिद्धांतों को भी न मानने के लिये प्रेरित करता है ।

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यही कारण था कि संविधानसभा ने एक लंबी बहस के बाद मूल संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द को जगह नहीं दी । हिंदू हजारों साल से धर्मनिरपेक्ष रहा है । धर्मनिरपेक्षता उसके खून में है । उसे धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाने की संविधानसभा ने कोयी जरूरत महसूस नहीं की । इसके विपरीत संविधान के मूलाधिकारों में धर्म की स्वतंत्रता को अनु0 25.. 26.. 27.. 28 में जगह दी गयी है ।

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धर्मनिरपेक्षता शब्द को संविधान में न रखने का एक और कारण था धर्म के नाम पर भारत का विभाजन । इतनी बड़ी त्रासदी अगर देश को झेलनी पड़ी तो उसके पीछे भी एक आक्रामक धर्म था । सन 46….47 के दंगों ने महात्मा गांधी समेत बहुत से राजनैतिक नेताओं की सोच बदल दी थी ।


मोहनदास करम चन्द्र गांधी -

मेरा अपना अनुभव है कि मुसलमान कूर और हिन्दू कायर होते हैं मोपला और नोआखली के दंगों में मुसलमानों द्वारा की गयी असंख्य हिन्दुओं की हिंसा को देखकर अहिंसा नीति से मेरा विचार बदल रहा है ।

गांधी जी की जीवनी.. धनंजय कौर पृष्ठ ४०२ व मुस्लिम राजनीति श्री पुरूषोत्तम योग

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: -


मैं अब देखता हूं कि उन्हीं युक्तियों को यहां फिर अपनाया जा रहा है जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था । मुसलमानों की पृथक बस्तियां बसाई जा रहीं हैं । मुस्लिम लीग के प्रवक्ताओं की वाणी में भरपूर विष है । मुसलमानों को अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन करना चाहिए । मुसलमानों को अपनी मनचाही वस्तु पाकिस्तान मिल गया हैं वे ही पाकिस्तान के लिए उत्तरदायी हैं , क्योंकि मुसलमान देश के विभाजन के अगुआ थे न कि पाकिस्तान के वासी । जिन लोगों ने मजहब के नाम पर विशेष सुविधांए चाहिंए वे पाकिस्तान चले जाएं इसीलिए उसका निर्माण हुआ है । वे मुसलमान लोग पुनः फूट के बीज बोना चाहते हैं । हम नहीं चाहते कि देश का पुनः विभाजन हो ।


संविधान सभा में दिए गए भाषण का सार ।


: -


हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही एक हल है । यदि यूनान तुर्की और बुल्गारिया जैसे कम साधनों वाले छोटे छोटे देश यह कर सकते हैं तो हमारे लिए कोई कठिनाई नहीं । साम्प्रदायिक शांति हेतु अदला बदली के इस महत्वपूर्ण कार्य को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा । विभाजन के बाद भी भारत में साम्प्रदायिक समस्या बनी रहेगी । पाकिस्तान में रुके हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं की सुरक्षा कैसे होगी ? मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर सम्मान के योग्य नहीं है । मुसलमान की भातृ भावना केवल मुसमलमानों के लिए है । कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का विरोधी है , इसीलिए हिन्दू सिर्फ घृणा और शत्रुता के योग्य है । मुसलामनों के निष्ठा भी केवल मुस्लिम देश के प्रति होती है । इस्लाम सच्चे मुसलमानो हेतु भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट संबधी मानने की आज्ञा नहीं देता । संभवतः यही कारण था कि मौलाना मौहम्मद अली जैसे भारतीय मुसलमान भी अपेन शरीर को भारत की अपेक्षा येरूसलम में दफनाना अधिक पसन्द किया । कांग्रेस में मुसलमानों की स्थिति एक साम्प्रदायिक चौकी जैसी है । गुण्डागर्दी मुस्लिम राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है । इस्लामी कानून समान सुधार के विरोधी हैं । धर्म निरपेक्षता को नहीं मानते । मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती । वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद का संकोच नहीं करते ।


डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय , खण्ड १५१


उपरोक्त पंक्तियों को पढ़ते वक्त याद रखिये की इनमें से एक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हैं जिनका भारत की आजादी में योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है । दूसरे लौहपुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल हैं जिन्होंने भारत की 550 रियासतों को एक करके भारत देश को एक नया स्वरूप दिया और तीसरे संविधानसभा की प्रारूप समीति के अध्यक्ष डा0 भीमराव अंबेडकर हैं । इन तीनों महान नेताओं का योगदान भारतवर्ष के इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकता है ।


तीनों महान नेताओं की उपरोक्तपंक्तियां इतना समझने के लिये काफी हैं कि क्यों संविधानसभा ने धर्मनिरपेक्षता को संविधान में जगह नहीं दी । वे जातने थे कि धर्मनिरपेक्षता एक ऐसा जहरीला बीज है जो भविष्य में दुबारा भारत का विभाजन करा सकता है ।

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फिर धर्मनिरपेक्षता शब्द संविधान में कब आया । भारत में इमरेजेंसी का पीरियड । इंदिरागांधी की तानाशाही । संविधान का 42वां संशोधन । 42 वां संशोधन अब तक का सबसे बड़ा संशोधन रहा है । इसके द्वारा संविधान में व्यापक स्तर पर संशोधन किये गये । यह संशोधन तब किये गये जब समूचा विपक्ष जेल की सलाखों के पीछे था । संसद खाली पड़ी थी । 42 वां संशोधन एक फर्जी संविधान संशोधन था । इसी संविधान संशोधन के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ”धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और राष्ट्र की अखंडता“ शब्द जोड़ा गया जनता पार्टी की सरकार ने 44 वें संविधान संशोधन 1978 के द्वारा 42 वें संविधान संशोधन द्वारा आपातकाल में इंदिरागांधी द्वारा किये गये तमाम फर्जी संशोधनों को निरस्त कर दिया । लेकिन वे संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गये ..धर्मनिरपेक्ष.. समाजवादी.. शब्द के दुरगामी प्रभाव का विश्लेषण नहीं कर पाये और ये शब्द बने रहने दिये गये ।

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केशवानंद भारती.. इंदिरागांधी बनाम राजनारायण.. मिनर्वा मिल आदि महत्वपूर्ण वादों ने संविधान के आधारभूत ढांचे को मान्यता दी । इस ढांचे में शामिल है -

1.    विधि का शासन

2.    समता का अधिकार एवं शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत

3.    संविधान की सर्वोच्चता

4.    परिसंघवाद

5.    धर्मनिरपेक्षता

6.    देश का प्रभुत्वसम्पन्न… लोकतांत्रिक ढांचा

7.    संसदीय प्रणाल की सरकार

8.    न्यायापालिका की स्वतंत्रता

9.    उच्चतम न्यायालय की अनु0 32,136,141 और 142 के अधीन शक्ति

10.   कतिपय मामलों मे मूलअधिकार

11.   संसद की संविधान संशोधन की सीमित शक्ति ।

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धर्मनिरपेक्षता को विभिन्न महत्वपूर्ण वादों में उच्चतम न्यायालय ने संविधान के आधारभूत ढांचे का हिस्सा माना है । संविधान संशोधन अनु0 368 के तहत आधारभूत ढांचे में संशोधन की प्रक्रिया अत्यंत कठिन है जिसके लिये संसद के प्रत्येक सदन के 2/3 सदस्यों का बहुमत और उसके बाद 50 प्रतिशत राज्यों की विधानमण्डल का समर्थन भी जरूरी है ।

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जनतापार्टी की सरकार धर्मनिरपेक्ष… समाजवादी… इन दो शब्दों के भारतीय राजनीति में दूरगामी प्रभाव का आकलन नहीं कर सकी और 44 वें संविधान संशोधन में इन शब्दों को हटाने के लिये उसने कोयी प्रयास नहीं किया ।

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जिस तरह से भारतीय समाज हजारों साल से धर्मनिरपेक्ष रहा है उसी तरह से वह समाजवादी रहा है । हमें विदेशी समाजवाद की जगह गांधी के समाजवाद को अपनाना चाहिये थे । धर्मनिरपेक्ष… समाजवादी.. यह दो शब्द अनु0 14 समता के मूलाधिकार का उल्लंघन करते हैं । इन दो शब्दों की वजह से भारतीय राजनीति में कुछ राजनैतिक पार्टियों को वीटो अधिकार प्राप्त हो जाता है । आप देखें कि भारत में पिछले दो दशक में हुये चुनावों में बहुत सी अलग अलग विचारधारा की पार्टियां अपनी असफलता को छिपने के लिये और जनता के मत से विपरीत जाकर मात्र धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर अपने सारे गुनाह छिपा लेती हैं और एक पार्टी के खिलाफ…जनता के मत के विपरीत जाकर सब एक हो कर खड़े जाते हैं । चाहे चुनाव में वे एक दूसरे के खिलाफ ही क्यों न खड़े हुये हों । यह साफ साफ जनता के मत के साथ बलात्कार है और लोकतंत्र के सिद्धांत का मजाक उड़ाना है ।

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इसी के साथ समाजवाद शब्द कुछ पार्टियों की बपौती बन गया है । समाजवादी पार्टी और बंगाल और केरल के कम्युनिस्टों ने इस शब्द का पेटेंट करा रखा है और चुनावों में वे इसे एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं जबकि  समाजवाद के वास्तविक अर्थ से ये पार्टियां कोसों दूर हैं ।

इस तरह हम देखते हैं कि इन दोनों शब्दों का भारतीय राजनीति में घोर दुरूपयोग किया जा रहा है जिससे कि राजनैतिक असमानता को अनैतिक और असंवैधानिक रूप से बढ़ावा मिल रहा है । यह दोनो हीशब्द अनु0 14 के तहत समता के मूलाधिकार का सरासर उल्लंघन करते हैं इसलिये इन्हें असंवैधानिक मानते हुये निरस्त कर देना चाहिये ।

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41 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 16, 2011

बड़े भईया, देर से ब्लॉगर हुआ इस लिए देर से ही सब कुछ जान पाया। आपका यह लेख पढ़ कर कैसा लगा ये बताना असंभव है हां जो प्रेरणा इस लेख से मिली वह कर्तव्य भाव जगाती है और एक नवशक्ति का संचार करती है| धन्यवाद सहित प्रणाम,

    kmmishra के द्वारा
    March 17, 2011

    प्रिय वाहिद, सादर वन्देमातरम, यह सेकुलरवाद भारत में असंवैधानिक तुष्टिकरण का कारण है. यह एक तथ्य है. कोई इसे गलत साबित कर देगा तो में यह लेख हटा दूंगा. भारत में सभी धर्मों में प्रेम सौहार्द बना रहे लेकिन उसके लिए ढोंग करने की क्या आवश्यकता है. सादर आपका.

siddhant के द्वारा
December 14, 2010

नमस्कार मिश्रा जी सादर चरण स्पर्श बहुत ही उत्कृष्ट कोटि का सारगर्भित ,यथार्थपरक और सार्वभौमिक तथ्य प्रस्तुत किया आपने.मैं अपने लेख क़तरनाक आतंकवादी एम्.ऍफ़.हुसेन लेख के साथ आपके लेख को अपने प्रिय पाठको के लिए लिंक करना चाहता हु अगर अनुमति हो बड़ा आभारी हूँगा. पुनः नमस्कार.

    K M Mishra के द्वारा
    December 14, 2010

    प्रिय सिद्धांत भाई सादर वंदेमातरम । मुझे खुशी होगी अगर मेरा कोयी लेख सत्य को उद्धाटित करने में सफल होता है । मुझे खुशी होगी अगर आप इस लेख का लिंक अपने लेख के साथ लगायेंगे । सादर आपका के एम मिश्र

HIMANSHU BHATT के द्वारा
November 19, 2010

मिश्राजी, आपका यह लेख बहुत ही तथ्यपरक एवं सारभूत है…… श्रेष्ठ लेखन के लिए साधुवाद.

    K M Mishra के द्वारा
    November 20, 2010

    हिमांशु जी सादर वंदेमातरम ! धर्मनिरपेक्षता के एक ऐसे पक्ष को लिखने का प्रयास किया जिस पर लोग बात नहीं करना चाहते या फिर उस तरफ उनका ध्यान नहीं जाता है । आपकी टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

s p singh के द्वारा
November 15, 2010

आदरणीय मिश्र जी, आपका लेख बहुत ही सुन्दर, तथ्यों से परिपूर्ण, ज्ञानवर्धक, एवं कानून की बारीकियों से भरा है /परन्तु जब आपने यह लिखा —–आप देखें कि भारत में पिछले दो दशक में हुये चुनावों में बहुत सी अलग अलग विचारधारा की पार्टियां अपनी असफलता को छिपने के लिये और जनता के मत से विपरीत जाकर मात्र धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर अपने सारे गुनाह छिपा लेती हैं और एक पार्टी के खिलाफ…जनता के मत के विपरीत जाकर सब एक हो कर खड़े जाते हैं । चाहे चुनाव में वे एक दूसरे के खिलाफ ही क्यों न खड़े हुये हों । यह साफ साफ जनता के मत के साथ बलात्कार है और लोकतंत्र के सिद्धांत का मजाक उड़ाना है । ——तो ऐसा लगा कि यह एक समीक्षक का लेख न होकर एक हारे हुए किसी मंत्री या किसी राजनितिक पार्टी का विचार हो ?दूसरा कथन यह कि—–” इस तरह हम देखते हैं कि इन दोनों शब्दों का भारतीय राजनीति में घोर दुरूपयोग किया जा रहा है जिससे कि राजनैतिक असमानता को अनैतिक और असंवैधानिक रूप से बढ़ावा मिल रहा है । यह दोनो ही शब्द अनु0 14 के तहत समता के मूलाधिकार का सरासर उल्लंघन करते हैं इसलिये इन्हें असंवैधानिक मानते हुये निरस्त कर देना चाहिये”—— इससे तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि अगर कोई राजनितिक पार्टी अगर जोड़ तोड़ करने के बाद भी सत्ता में नहीं आती तो इसमें संविधान का क्या दोष , दोष तो संविधान के निर्माताओं का ही होना चाहिए, शायद यह इस लिए भी कि आज कि परिस्थिति का आकलन उस समय के राजनेताओं के विचार में नहीं आया होगा, वैसे भी जब से राजनीती एक व्यसाय बन गई है तब से सत्ता हथियाने के लिए केंद्र और प्रदेशों में क्या क्या हथकंडे अपनाए जाते है क्या किसी से छुपा है गणित यहाँ आकर फेल हो जाता जब गिनती का खेल शुरू होता है करोडो के वारे न्यारे हो जाते हैं न तो किसी को नैतिकता याद रहती है और न ही धर्मनिरपेक्षता कि याद आती है याद आती है तो केवल लाल बत्ती और सत्ता के साथ जुड़ने का सुख ——- तो इन संविधान के अवांछित तत्वों से छुटकारा कौन दिलायागा हम और आप तो एक बेबस कि तरह सिर्फ देखते रहेंगे ? अच्छे लेख के लिए हार्दिक बधाई / .

    kmmishra के द्वारा
    November 16, 2010

    आदरणीय एस पी सिंह जी सादर प्रणाम । आपने कहा कि हम और आप तो बेबस देखते रहेंगे । मैं कहूंगा कि यह बेबसी कब तक रहेगी । आज मीडिया और विपक्ष की ही ताकत थी जो अशोक चव्हाण, कलमाडी और ए राजा को जाना पड़ा । सौभाग्य से हम भारतवासियों के हाथ ब्लागिंग जैसा धारदार हथियार लगा है । हमें आरटीआई और ब्लागिंग को अपना हथियार बना कर जनता क्या सोचती, चाहती है और मूर्ख नहीं है इन नेताओं को बताना होगा । . अनु0 14 समता के मूलाधिकार के बारे में चर्चा करना चाहता हूं लेकिन जब तक इसे विस्तार से नहीं लिखूंगा प्रयास निरर्थक हो जायेगा । इसे कम शब्दों में कहना मुश्किल है । जैसा कि आपने कहा कि फिर ये शब्द ”धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद“ कैसे संविधान में हैं तो उसके बारे मे मैंने संविधान के 42वें और 44 वें संशोधन के बारे लिखा है । . अगर कांग्रेस भ्रष्टाचार की गंगोत्री है तो दूसरी पार्टियां भी कम नहीं हैं । सोनिया गांधी के बारे मे और जानकारी लेने के लिये सुरेश जी का नया लेख- “भाजपा,संघ के मुकाबले डॉ स्वामी अधिक हिम्मतवाले हैं” देखिये । सादर आपका

rajkamal के द्वारा
November 14, 2010

प्रिय मिश्रा जी …अभिवादन ! अब तो आपसे मिलकर पूरी खुशी होने लग गयी है … वरना पहले तो सिर्फ आधी खुशी ही हुआ करती थी …. क्योंकि अब आप अपनी पोस्ट पे आई हुई टिप्पणियों का जवाब भी देने लग गए है …. आज मैं वाकई में कह सकता हू की मिश्रा जी आप से मिलकर सही अर्थो में हार्दिक खुशी हुई … बधाई एक मेहनत से जुटाई गई जानकारियो से भरपूर लेख के लिए …

    kmmishra के द्वारा
    November 14, 2010

    प्रिय राजकमल जी नमस्कार । आपकी दुआओं से मुझे कभी जवाब का टोटा नहीं रहा, हां कभी कभी समय का टोटा जरूर पड़ जाता है । मेरे ब्लाग पर करीब सौ से ज्यादा टिप्पणियां ऐसी होंगी जिनका में जवाब समय पर नहीं दे पाया । समय रहता है तो जवाब देने की कोशिश करता हूं ।

Rashid के द्वारा
November 13, 2010

प्रिय मिश्र जी,, हमेशा की तरह एक बार फिर आप का सुन्दर और जानकारी भरा लेख पढने को मिला,, जिस तरह से आप अपने लेखो में reference देते है वह वाकई काबिले तारीफ़ है,, जिन महापुरुषों की बाते आपने लिखी है वह बेहद सम्मानित है !! लेकिन एक बात जो मेरे मन में आती है जो आप से शेयर करना चाहता हूँ वह यह की जिस वक़्त की यह बाते है वह वक़्त शायद भारत और भारतीय मुसलमानों के लिए सब से ज्यादा kathin था, एक लंबी गुलामी के बाद देश आज़ाद हुआ था और यह आज़ादी एक बहुत बड़ा जख्म (विभाजन) दे कर मिली थी, यह ठीक वैसे ही था जैसे किसी व्यक्ति के दोनों हाथ काट कर कहा जाये जाओ मैंने तो तुम्हें आज़ाद किया,, सही तो यह था की अगले 100 साल और लड़ा जाता लेकिन विभाजन को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए था परंतु ऐसा नहीं हुआ इसका कारण ( जो मेरी समझ मे आता है ) था नेताओ जी सत्ता और कुर्सी की लालच,, यदि आप मेरा मत पुछे तो मैं कहूँगा की भारत के मुसलमानो के साथ सब से बड़ी दुश्मनी अगर किसी ने किया है तो वह शख्स जिन्ना है,उसने आज़ादी की मे मुसलमानो के योगदान की कीमत वसूल की सिर्फ अपनी गद्दी के लिए, और मुसलमानो को हमेशा के लिए एक जख्म दे दिया !! आज पाकिस्तान के क्या हालत है दुनिया के सामने है !! वहाँ से लाख दर्जे अच्छे हालात मे भारत के मुसलमान है हर लिहाज से,, यहाँ तक की बड़े बड़े इस्लामिक विद्वान जो भारतीय है विश्व मे बेहद सम्मानित है, शायद आप को मालूम हो की लखनऊ के अली मिया की लिखी किताबे अरब देशो तक मे चलती है !! अब बात आती है हिन्दू और मुसलमानो के रिश्तो की, तो साहब तमाम बातों के बावजूद यह एक अटल सच है की सदियो से यह दोनों साथ रहते आए है और इनको अलग करना ना मुमकिन है,, यह अगर एक दिन एक दूसरे के खून के प्यासे दिखते है तो हज़ार दिन एक दूसरे के लिए जान निछावर करते दिखते है,, इनका रंग रूप, इनके मिजाज, रहन सहन, संस्कृति सब एक है , क्या हम या आप एक झुंड देख कर बता सकते है की इसमे कौन मुसलमान है कौन हिन्दू ? सभी के रंग रूप एक / पहनावा एक / समस्ये एक,, फिर फर्क कहाँ है ?? कहीं नहीं और कैसे हो आखिर भारत के 90% मुसलमान पहले हिन्दू थे, हमने धर्म बदला है संस्कृति / रहन सहन नहीं !! फिर आखरी बात की जो विभाजन के ज़िम्मेदार थे या पाकिस्तान के हमदर्द थे वह गुज़र गए, हम लोग (या नयी जेनेरेशन) ने आज़ाद भारत मे जनम लिया है और हम भारतीय है हमारा कुछ लेने देना या हमदर्दी उन लोगो के साथ नहीं है जिन्हों ने भारत पर लूट के लिए हमला किया या भारत के टुकड़े किए या भारत के विरोधी हैं,, एक आम भारतीय की तरह हमारी भी समस्या है चाहे वह बेरोजगारी हो , सांप्रदायिक दंगे हो या आतंकवाद,, हमे इन का मुकाबला एक भारतीय की तरह ही करना है !! भारत हमारा देश है और हमारा आस्तित्व इस ही मे है यहीं हमने जनम लिया और अल्लाह से दुआ यहीं की मिट्टी मे दफन हो !! जय भारत !! जय हिन्द राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    kmmishra के द्वारा
    November 13, 2010

    राशिद मेरे सबसे प्रिय भाई, सादर वंदेमातरम ! इस टिप्पणी ने मेरा दिल जीत लिया । वाकई एक जिन्ना की सत्ता की लालच ने न सिर्फ हमें कभी न भरने वाला घाव पाकिस्तान दिया बल्कि इसकी वजह से भारतीय मुसलमानों को भी शंका की निगाह से देखा जाने लगा । मैं मुस्लिम भाईयों की नई सुलझी हुयी पीढ़ी को आपके अंदर देखता हूं । इस अनमोल टिप्पणी के लिये आपका आभारी हूं ।

    kmmishra के द्वारा
    November 13, 2010

    जहां तक धर्मनिरपेक्षता के राजनैतिक तुष्टिकरण की बात है इसे मुसमान भाईयों को नकार कर नेताओं को उनका असली चेहरा दिखा देना चाहिये । धर्म के तुष्टिकरण के अलावा पिछले 60 साल में मुसलमानों के लिये इन नेताओं ने क्या किया है । अब आप लोगों को उनसे धर्म की बजाये विकास, शिक्षा और रोजगार की मांग करनी चाहिये ताकि मुस्लिम समुदाय भी आगे बढ़ कर भारत के विकास में अपना योगदान दे सके ।

roshni के द्वारा
November 12, 2010

आदरणीय मिश्रा जी जानकारी से भरा हुआ लेख …. धन्यवाद इतनी अच्छी जानकारी हमारे साथ बाटने के लिए … आभार सहित

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    रोशनी बहन आप सब को लेख पसंद आया और आप लोगों ने इस पर विचार किया, मेरा लिखना सफल हुआ । आभार ।

ashvinikumar के द्वारा
November 12, 2010

प्रिय बंधु आज की स्थिति का अवलोकन करिये स्थिति भिन्न नही है,देश आज भी ज्वालामुखी के दहाने पर खड़ा है ,कुछ लोग पलीते में चिंगारी लगा रहे हैं,तो कुछ को इन सबसे कोई मतलब ही नही है ,(अपनी डफली अपना राग अलापे जा रहे हैं ,) आज देश को सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे ही जुझारू एवं दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व की आवश्यकता है………आपका

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    प्रिय अश्विनी जी सादर वंदेमातरम ! आपने ठीक कहा है । आज अगर खुद गांधी, पटेल होते तो वे भी शायद निराश हो गये होते । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 12, 2010

आदरणीय मिश्रा जी………..इस पर टिप्पणी स्वरूप लिखने को कुछ शेष नहीं है………. हां केवल विचार किया जा सकता है…………. जानकारी से भरे इस लेख के लिए हार्दिक बधाई…………..

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    पंत जी सादर वंदेमातरम ! आपने बिल्कुल ठीक कहा कि इस लेख पर सिर्फ विचार किया जा सकता है कि क्या हमारी गलतियों की वजह से इतिहास खुद को दुहराने तो नहीं जा रहा है । आभार ।

आर.एन. शाही के द्वारा
November 12, 2010

श्रद्धेय मिश्रा जी, प्रणाम! उद्धरणों को शृंखलाबद्ध कर बहुत बेहतरीन प्रस्तुति दी, जो आपकी विद्वता का परिचायक है । बहुत-बहुत बधाई । आज हर कौम को इसी बुद्धि-विवेक की आवश्यकता है । पता नहीं वह दिन कब आएगा जब हम इतने प्रबुद्ध हो पाएंगे कि अंजाने में भी न तो कोई किसी भगवान पर पत्थर बरसवाने की भूल करेगा, न ही कोई अंजाने में भी देश तोड़क गतिविधियों में लिप्त होगा । फ़िलहाल तो प्रार्थना ही की जा सकती है- ‘सबको सन्मति दे भगवान’ ।

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    शाही जी आपकी टिप्पणी से बहुत बल मिलता है, लेख को देखने का आपका नजरिया अद्भुत है । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

R K KHURANA के द्वारा
November 12, 2010

प्रिय मिश्र जी, बहुत ही जानकारी भरा सुंदर लेख ! खुराना

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    खुराना जी सादर वंदेमातरम ! बहुत दिनों से इस लेख को लिखना चाह रहा था क्योंकि जब जब धर्मनिरपेक्षता शब्द कानों में पड़ता था तब तब इमरजेंसी के दौरान जबरन किया गया 42 वां संविधान संशोधन याद आता था । आज राजनीति के सारे अपराध धर्मनिरपेक्षता की पवित्र कुंड में स्नान करने पर धुल जाते हैं । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

Coolbaby के द्वारा
November 12, 2010

Amazing ! What made me amazed ……..I will write soon blessings

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    Dear Coolbaby, write soon, God Bless you.

sdvajpayee के द्वारा
November 12, 2010

प्रिय श्री मिश्र जी,  प्राय: धर्म का राजनीति से घाल मेल हो जाता है। राजनीति की क्रूर-चतुर चालें , उद्दाम महात्‍वाकांक्षायें धर्म से जोड दी जाती हैं। हमें इतिहास भी निरपेक्ष होकर ही पढना-लिखना होगा। ज्‍यादातर ऐसा लेखन एक सापेक्ष और आग्रही दृष्टिकोण से लिखा गया है। जो शांति- सदभाव का संदेश न देता हो, सर्वकालिक व सार्वभैमिक न हो वह धर्म नहीं हो सकता।  आपका कहना कि भारतीय समाज हजारों साल से धर्मपिरपेक्ष रहा है, में एक शंका समाधान चाहता हूं। धर्मनिष्‍ठ जनमानस धर्म से निरपेक्ष कैसे रह सकता है?

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    आदरणीय बाजपेई जी सादर प्रणाम । आपने पूछा कि ” धर्मनिष्‍ठ जनमानस धर्म से निरपेक्ष कैसे रह सकता है“ . जवाब देने से पहले मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि हिंदू धर्म में धर्म की क्या अवधारणा दी गयी है और सेमेटिक धर्मों की धर्म के प्रति क्या अवधारणा है । अगर अपने ‘गीता और कुरान’ पर मेरी टिप्पणी को ध्यान पूर्वक पढ़ा है तो उत्तर उसी में छिपा है । फिर आपने लिखा है -”हमें इतिहास भी निरपेक्ष होकर ही पढना.लिखना होगा।“ यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि कौन सा इतिहास ? जो कम्युनिस्टों ने राष्ट्रनिरपेक्ष हो कर 1950 से लिखा है या मूल इतिहास जैसा कि मैंने ऊपर तीन तीन महान राष्ट्रनायकों को उद्धृत किया है । किसको सच माना जाये । एक जो स्वयं इतिहास का हिस्सा रहे हैं, भुक्तभोगी रहे हैं या फिर उनके लिखे इतिहास को जिनकी वजह से हम स्वयं अपना ही इतिहास भूल गये और सिर्फ मध्ययुगीन शासकों के कुण्डलियां याद करते रहे । . आज ओबामा तक कह गया कि पूरा विश्व आज भारत की तरफ देख रहा है उसके सनातन ज्ञान के कारण । दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी वैश्विक समस्याओं को सुलझाने के लिये हमारी तरफ ताक रहा है । इसके पीछे हमारी हजारों साल पुरानी ज्ञान की परंपरा है । हिंदू धर्म पोखर का सड़ता पानी नहीं है जहां डेंगू, मलेरिया के मच्छर पनपते हैं । यह एक निरंतर विकास की धारा है । यह खुद को समय के साथ अपग्रेड करती रहती है । नये विचारों के लिये इसने अपने दिमाग के दरवाजे कभी बंद नहीं किये । यहां विवेक, सोचने, समझने की आजादी है । . धर्म इंसानों के लिये होता है, जानवरों के लिये नहीं । इंसान पहले आया धर्म बाद में । इंसान स्वभावतः स्वतंत्र होता है । उसको किसी की गुलामी पसंद नहीं होती । धर्म की भी नहीं । हिंदूधर्म का चरित्र गुलाम बनाना नहीं बल्कि आत्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, वैश्विक विकास है । इसलिये हम वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया की बात करते हैं । . मैं हमेशा से भाईचारे और समरसता का पक्षधर रहा हूं लेकिन इसके लिये इतिहास की कड़ुवी सचाईयों से आंखे मंूद लेना कौन सी समझदारी की बात है । इतिहास बड़ा बेरहम होता है । जो उसे भूलजाते हैं वो उनको फिर खड़ा हो कर याद दिला देता है । भाईचारे के लिये त्याग और खुले दिलो-दिमाग की जरूरत होती है वरना एक पक्ष त्याग ही करता रह जायेगा और दूसरा यही कहेगा कि आप बड़े हैं आप त्याग करिये । राष्ट्रधर्म सर्वोपरि होना चाहिये फिर हम चाहे किसी भी धर्म के अनुयायी हों । . मैंने देखा है कि आपको मुस्लिम भाईयों का खूब समर्थन मिलता है वे आपको पढ़ते और सरहाते भी खूब हैं । एक बार जरा उनसे देश की बढ़ती जनसंख्या पर विचार करने और गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल के लिये कह कर देखिये । . काका एक तरफ तो आप कहते हो कि मैं इस अवस्था में ज्यादा पढ़ नहीं पाता हूं, मेरा इतन अध्ययन नहीं है । दूसरी तरफ जब हम तथ्य रखते हैं तब आप उससे बड़ी आसानी से असहमत भी हो जाते हो । आप बड़े हो कुछ भी कह सकते हो । सादर आपका ।

chaatak के द्वारा
November 12, 2010

प्रिय मिश्र जी, गांधी जी, सरदार पटेल और बाबा साहब के विचारों को इतना स्पष्ट रूप में मंच पर रखने पर आपको हार्दिक बधाई| जरूरत यहाँ पर शायद वाद-विवाद की नहीं रह जाती है, जरूरत है तो सिर्फ इन महापुरुषों के विचारों पर आत्म-मंथन करने की और यही एक मात्र रास्ता है सत्य और तथ्य को समझने का| वैसे आपके दिए गए विवरण और साक्ष्यों पर कुतर्क करने का एक बढ़िया तरीका मैं सुझा देता हूँ- ‘आपके द्वारा अवतरित सारे उदाहरण उन महापुरुषों के श्रीमुख से निकले हैं जो जन्म से हिन्दू थे और बाबा साहब ने धर्म परिवर्तन भी किया तो वे हिन्दू धर्म की ही एक शाखा (बौद्ध) के अनुयायी हुए और आप कैसे कह सकते हैं कि इन हिन्दुओं के मन में मुसलमानों के प्रति स्वाभाविक रूप से दुर्भावना नहीं रही रही होगी?’ सादर वन्दे-मातरम!

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    प्रिय चातक जी सादर वंदेमातरम ! आपने बिल्कुल ठीक कहा कि जरूरत यहाँ पर शायद वाद.विवाद की नहीं रह जाती, जरूरत है तो सिर्फ इन महापुरुषों के विचारों पर आत्म.मंथन करने की। हम दोनों समुदायों को एक साथ रहना है और इसके लिये प्रेम, विश्वास और एक दूसरे की भावनाओं का आदर करने का जज्बा दिलों में लाने की जरूरत है । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

chaatak के द्वारा
November 12, 2010

प्रिय मिश्र जी, गांधी जी, सरदार पटेल और बाबा साहब के विचारों को इतना स्पष्ट रूप में मंच पर रखने पर आपको हार्दिक बधाई| जरूरत यहाँ पर शायद वाद-विवाद की नहीं रह जाती है, जरूरत है तो सिर्फ इन महापुरुषों के विचारों पर आत्म-मंथन करने की और यही एक मात्र रास्ता है सत्य और तथ्य को समझने का| वैसे आपके दिए गए विवरण और साक्ष्यों पर कुतर्क करने का एक बढ़िया तरीका मैं सुझा देता हूँ- ‘आपके द्वारा अवतरित सारे उदाहरण उन महापुरुषों के श्रीमुख से निकले हैं जो जन्म से हिन्दू थे और बाबा साहब ने धर्म परिवर्तन भी किया तो वे हिन्दू धर्म की ही एक शाखा (बौद्ध) के अनुयायी हुए और आप कैसे खा सकते हैं कि इन हिन्दुओं के मन में मुसलमानों के प्रति स्वाभाविक रूप से दुर्भावना नहीं रही रही होगी?’ सादर वन्दे-मातरम!

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    प्रिय चातक जी यहां कुतर्क करने की जगह ही नहीं है क्योंकि सामने महात्मा गांधी, सरदार पटेल और भीमराव अंबेडकर खड़े हैं । जो इनसे असहमत हैं उसे पहले इन्हें गलत साबित करना होगा ।

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 12, 2010

आदरनीय मिश्रा जी हास्य ब्यंग के अन्दर से एक महत्वपूर्ण सन्देश देता लेख सबके बिच में रखने के लिए धन्यवाद,बाकि उन महान आत्माओ के बिचारों के बारे में कुछ भी कह पाना असंभव…………………….!

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    धर्मेश जी इस लेख का मकसद एक गंभीर संवैधानिक मसले को आप लोगों तक पहुंचाना था । हम लोग बहुत बार सुनते हैं कि कानून में छेद है । यह छेद नहीं ब्लैकहोल है । टिप्पणी के लिये आभार ।

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 12, 2010

प्रिय श्री मिश्रा जी, कानुनी जानकारी से भरपूर आपके इस आलेख ने ज्ञानवर्धन किया । उसका शुक्रिया । चुनाव में एक दूसरे के धूर विरोधी जनता के मत के साथ बलात्कार कर लोकतंत्र के सिद्धांत का मजाक उड़ातें है फिर भी अपनें को धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी बताते हैं क्‍योंकि उन्‍हें भय है तो केवल सत्ता छीन जाने का । लेकिन संविधान में सुझाया गया संशोधन अभी तो नामुमकिन ही लगता है । अरविन्‍द पारीक

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    अरविंद जी सादर वंदेमातरम ! आपने ठीक समझा की प्रस्तावना में अब संशोधन मुश्किल है लेकिन इंपासिबल नहीं है । जहां चाह वहां राह । अब देखना यह है कि यह संशोधन देश के दूसरे विभाजन के पहले होता है या बाद में । टिप्पणी के लिये आभारी हूं ।

nishamittal के द्वारा
November 12, 2010

मिश्र जी,इतनी विस्तृत जानकारी के लिए धन्यवाद.यद्यपि राजनीती शास्त्र की छात्र रही हूँ परन्तु कुछ तथ्य विशेष रूप से महात्मा गांधी,सरदार पटेल ,आंबेडकर जी के इन विचारों के विषय में नहीं पढ़ा था.

    kmmishra के द्वारा
    November 12, 2010

    निशा जी सादर नमस्कार । गांधी, पटेल और अंबेडकर की ये पंक्तियां किसी कोर्स की किताब में नहीं दी गयी हैं इसलिये लोग इनसे परिचित नहीं हैं इसीलिये इन पंक्तियों का सोर्स मैंने दिया है । इन पंक्तियों से हमें इतिहास और हमारे महान नेताओं ने किन विषम परिस्थितियों को झेला था इसके बारे जानने को मिलता है । टिप्पणी के लिये आभारी हूं

    kmmishra के द्वारा
    November 13, 2010

    प्रिय कूलबेबी, वंदेमातरम! यह आपने बड़ा अच्छा काम किया है । इससे कम से कम लोगों को यह यकीन हो जायेगा कि मैंने ऊपर जिन तीनों महापुरूषों के उद्धृरण दिये हैं वो मनगड़ंत नहीं है । फिर वे कथन किन किताबों से लिये गये हैं वो भी साफ साफ दिया गया है । . अब जब आप स्त्रोत तक पहुंच ही गये हैं तो उसको जरा ध्यान से पढ़िये क्योंकि वहां पर आपकी आंख खोलने वाले और आप जैसे लोगों को आत्मविश्लेषण करने का मौका देने के लिये बहुत से तथ्य और महान राष्ट्रवादियों के कथन दिये गये हैं । आपके इस राष्ट्रवादी कार्य के लिये आपका बहुत बहुत आभार ।

    Coolbaby के द्वारा
    November 14, 2010

    Big Bro ! I have seen whatever that site holds…..:-) and that picture also Ha Ha Ha , Writers are there very few and their books are kept in particular manner ………thats all Are they chauvinists all …….UNCERTAIN. will they reach their goal ……..UNCERTAIN. Yes their site is named with Indian proud ……..but their work? ……Why I have given this link here ,not because it seems to me THE NATIONALISM ……it is because I wanna reveal what it had hidden……. But not yet theirselves proved ……. May God bless you

    kmmishra के द्वारा
    November 14, 2010

    अपनी अपनी समझ है । ईश्वर तुम्हें सत्य देखने और समझने की शक्ति दे ।


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