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संत और सेठ - Holi Contest.

Posted On: 30 Mar, 2011 में

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मथुरा में एक संत रहते थे । उनके बहुत से शिष्य थे । उन्हीं में से एक सेठ जगतराम भी थे । जगतराम का लंबा चौड़ा कारोबार था । वे कारोबार के सिलसिले में दूर दूर की यात्राएं किया करते थे । एक बार वे कारोबार के सिलसिले में कन्नौज गये । कन्नौज अपने खुश्बूदार इत्रों के लिये प्रसिद्ध है । उन्होंने इत्र की एक बड़ी मंहगी शीशी संत को भेंट करने के लिये खरीदी ।

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सेठ जगतराम कुछ दिनों बाद काम खत्म होने पर वापस मथुरा लौटे । अगले दिन वे संत की कुटिया पर उनसे मिलने गये । संत कुटिया में नहीं थे । पूछा तो जवाब मिला कि यमुना किनारे गये हैं, स्नान-ध्यान के लिये । जगतराम घाट की तरफ चल दिये । देखा की संत घुटने भर पानी में खड़े यमुना नदी में कुछ देख रहे हैं और मुस्कुरा रहे हैं । तेज चाल से वे संत के नजदीक पहुंचे । प्रणाम करके बोले कि आपके लिये कन्नौज से इत्र की शीशी लाया हूं । संत ने कहा लाओ दो । सेठ जगतराम ने इत्र की शीशी संत के हाथ में दे दी । संत ने तुरंत वह शीशी खोली और सारा इत्र यमुना में डाल दिया और मुस्कुराने लगे । जगतराम यह दृश्य देख कर उदास हो गये । सोचा एक बार भी इत्र इस्तेमाल नहीं किया, सूंघा  भी नहीं और पूरा इत्र यमुना में डाल दिया । वे कुछ न बोले और उदासमन घर वापस लौट गये ।.

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कई दिनों बाद जब उनकी उदासी कुछ कम हुयी तो वे संत की कुटिया में उनके दर्शन के लिये गये । संत कुटिया में अकेले आंखे मूंदे बैठे थे और कोयी भजन गुनगुना रहे थे । आहट हुयी तो सेठ को द्वार पर देखा, प्रसन्न होकर उन्हें पास बुलाया और कहा – ”उस दिन तुम्हारा इत्र बड़ा काम कर गया ।“ सेठ ने आश्चर्य से संत की तरफ देखा और पूछा “मैं कुछ समझा नहीं ।” संत ने कहा ”उस दिन यमुना में राधा जी और श्रीकृष्ण की होली हो रही थी । राधा जी ने श्रीकृष्ण के ऊपर रंग डालने के लिये जैसे ही बर्तन में पिचकारी डाली उसी समय मैंने तुम्हारा लाया इत्र बर्तन में डाल दिया । सारा इत्र पिचकारी से रंग के साथ श्रीकृष्ण के शरीर पर चला गया और भगवान श्रीकृष्ण इत्र की महक से महकने लगे । तुम्हारे लाये इत्र ने श्रीकृष्ण और राधारानी की होली में एक नया रंग भर दिया । तुम्हारी वजह से मुझे भी श्रीकृष्ण और राधारानी की कृपा प्राप्त हुयी ।“

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सेठ जगतराम आंखे फाड़े संत को देखते रहे । उनकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था । संत ने सेठ की आंखों में अविश्वास की झलक देखी तो कहा “शायद तुम्हें मेरी कही बात पर विश्वास नहीं हो रहा । जाओ मथुरा के सभी श्रीकृष्णराधा के मंदिरों के दर्शन कर आओ, फिर कुछ कहना ।“

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सेठ जगतराम मथुरा में स्थित सभी श्रीकृष्णराधा के मंदिरों में गये । उन्हें सभी मंदिरों में श्रीकृष्णराधा की मूर्ति से अपने इत्र की महक आती प्रतीत हुयी । सेठ जगतराम का इत्र श्रीकृष्ण और राधारानी ने स्वीकार कर लिया था । वे संत की कुटिया में वापस लौटे और संत के चरणों में गिर पड़े । सेठ की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली । संत की आंखें भी प्रभू श्रीकृष्ण की याद में गीली हो गयीं ।

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मित्रों, यह कथा मैंने बचपन में पढ़ी थी । किताब का नाम याद नहीं, पर है यह सत्यकथा । मैं ऐसे कई भक्तों को जानता हूं जिन्होंने निमिष मात्र के लिये मथुरा में श्रीकृष्ण, राधारानी और गोपियों का रास देखा है । ब्रज में आज भी वंशीधर की मुरली बजती है और जिसपर उनकी कृपा होती है वह सुनता भी है और देखता भी । आप सब पर प्रभू श्रीकृष्ण और राधारानी की कृपा हो । होली की शुभकामनाएं ।

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38 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Essence के द्वारा
May 22, 2011

That’s way more clever than I was epxectnig. Thanks!

alkargupta1 के द्वारा
April 1, 2011

मिश्रा जी , श्री कृष्ण – सत्य कथा को पढ़ कर मन को बड़ा ही आनंद आया प्रभु की कृपा तो ऐसी ही है ! बहुत ही अच्छी कहानी !

    kmmishra के द्वारा
    April 1, 2011

    आदरणीय अलका जी, नमस्कार, प्रभु श्री कृष्ण की कथामृत एक एक बूँद के क्या कहने. नव सवंत्सर और नवरात्र की आपको हार्दिक शुभकामनायें.

rajkamal के द्वारा
March 31, 2011

आदरणीय मिश्रा जी …..सादर अभिवादन ! वाह ! क्या बात है , चेला (चातक -शक्कर ) और गुरु गुड़ दोनों ही मिल कर इस मंच पर भक्ति की गंगौत्री बहा रहे है ….. बधाई +होली की शुभकामनाये

    kmmishra के द्वारा
    April 1, 2011

    राजू भैया नमस्कार. हम क्या भक्ति की गंगोत्री बहायेंगे. हमारे लिए तो आप दोनों ही गुरु है. जहाँ चातक जी की भावना प्रधान, अंतरमन को छूती  लेखनी का मुरीद हूँ वहीँ छोटी से छोटी घटना में भी ब्लॉग के लिए मसाला ढूँढ लेने वाली चटपटी लेखनी का भी कायल हूँ. 

rajkamal के द्वारा
March 31, 2011

आदरणीय मिश्रा जी …..सादर अभिवादन ! वाह ! क्या बात है , चेला (चातक -शक्कर ) और गुरु गुड़ दोनों ही मिक्र इस मंच पर भक्ति की गंगौत्री बहा रहे है ….. बधाई +होली की शुभकामनाये

    Caiden के द्वारा
    May 22, 2011

    More posts of this qultaiy. Not the usual c***, please

sdvajpayee के द्वारा
March 31, 2011

  संत ने  इत्र के बहाने सेठ जगतराम का अहं यमुना में प्रवाहित कर दिया। अहं कुछ विशिष्‍ट होने का, सेठ-सम्‍पन्‍न होने का और (इत्र का) दाता होने का। फिर विगलित अहं सेठ का अंतस सुवासित-सुगंधित हो गया।  और ‘उन्हें सभी मंदिरों में श्रीकृष्णराधा की मूर्ति से अपने इत्र की महक आती प्रतीत हुयी ।’ वह विराटमना हो गए। संभवत: अपने प्रतीकार्थों में यह कथा यही संदेश देती है।

    kmmishra के द्वारा
    April 1, 2011

    आदरणीय बाजपेई जी, सादर प्रणाम । जो मैं न लिख सका वो आपने लिख दिया । कथा का असली संदेश आपकी टिप्पणी में प्रकट हुआ है । वास्तव में हम अपने बहुत से अंहकारों के मारे हुये हैं । धन, ज्ञान, महानता, विराटता, अध्यात्म, आदि के । कहानी में छिपे संदेश को प्रकट करने के लिये आभारी हूं ।

nikhil के द्वारा
March 31, 2011

बहुत सुन्दर और अर्थपूर्ण कथा ..

    kmmishra के द्वारा
    March 31, 2011

    निखिल जी नमस्कार. प्रभु की कथा का हमारे साथ आन्नद उठाने के लिए धन्यवाद.

allrounder के द्वारा
March 31, 2011

मिश्राजी नमस्कार, एक बेहतरीन कहानी से साक्षात्कार कराने के लिए हार्दिक बधाई !

    kmmishra के द्वारा
    April 1, 2011

    सचिन जी की जय हो. पाकिस्तान पर महाविजय के लिए भाई को बधाई. नव सवंत्सर और नवरात्र की आपको हार्दिक शुभकामनायें.

    Janessa के द्वारा
    May 21, 2011

    Snouds great to me BWTHDIK

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
March 31, 2011

जाकी रही भावना जैसी …… भावना का फल भगवान को देना ही पड़ता है… दाता के घर से कभी कोई निराश नही लौट ता है. बहुत सुंदर

    kmmishra के द्वारा
    April 1, 2011

    शिवेंद्र जी को नव सवंत्सर और नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
March 31, 2011

प्रिय मिश्र जी, आपकी यह सत्यकथा अत्यंत ही प्रेरक लगी| अंत की ओर आते हुए रोंगटे भी खड़े हो गए| साधुवाद,

    kmmishra के द्वारा
    April 1, 2011

    प्रिय वाहिद को नव सवंत्सर और नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें.

ashvinikumar के द्वारा
March 31, 2011

जय हो रास रचईया की ,जय हो मुरलीधर की वृन्दावनचारी गिरिधारी मुरलीधर राधा जीवन, जय भारत

    kmmishra के द्वारा
    April 1, 2011

    प्रिय अश्विनी को नव सवंत्सर और नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें.

abodhbaalak के द्वारा
March 31, 2011

मिश्र जी होली के रंग, और आपके कलम, दोनों ही का सुन्दर संगम. होली की शुभकामनाएं http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    kmmishra के द्वारा
    April 1, 2011

    प्रिय अबोध को नव सवंत्सर और नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें.

    Kourtney के द्वारा
    May 21, 2011

    THX that’s a great asnwer!

आर.एन. शाही के द्वारा
March 31, 2011

राधे-कृष्ण राधे-कृष्ण राधे राधे राधे-कृष्ण । केशव माधव हरि हरि बोल !! जय श्री कृष्ण !

    kmmishra के द्वारा
    April 1, 2011

    आदरणीय शाही सर को नव सवंत्सर और नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें.

    Kaden के द्वारा
    May 22, 2011

    The forum is a bgrtiher place thanks to your posts. Thanks!

Ramesh Bajpai के द्वारा
March 31, 2011

मैं ऐसे कई भक्तों को जानता हूं जिन्होंने निमिष मात्र के लिये मथुरा में श्रीकृष्ण, राधारानी और गोपियों का रास देखा है । ब्रज में आज भी वंशीधर की मुरली बजती है और जिसपर उनकी कृपा होती है वह सुनता भी है और देखता भी । आप सब पर प्रभू श्रीकृष्ण और राधारानी की कृपा हो । होली की शुभकामनाएं | प्रिय श्री मिश्रा जी प्रभु की लीला तो अपरम्पार है | कब किस तरह किस पर उनकी कृपा बरस जाएगी किसको पता | बृज माधुरी की फुहारों ka यह उपहार मन को उल्लास से भर गया | होली की शुभ कामनाये | जय राधे |

    kmmishra के द्वारा
    April 1, 2011

    बाजपयी जी को नव सवंत्सर और नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें.

    Elric के द्वारा
    May 21, 2011

    Wow, that’s a ralely clever way of thinking about it!


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