सत्यमेव .....

हास्य व्यंग्य एक्सप्रेस

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गांधीजी को पत्र

Posted On: 25 Feb, 2014 हास्य व्यंग में

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लेखक: नरेश मिश्र

मेरे प्यारे बापू जी ! आप स्वर्ग से देश को देख रहे होंगे । थोड़ा बताईये कि जिस आजादी के लिये आपने अनशन-सत्याग्रह और सत्य-अहिंसा के शस्त्र उठाये थे,उसकी कैसी ख्वारी हो रही है । आपने कहा था कि पवित्र साध्य के लिये साधन भी शुद्ध होना चाहिये । आपके कुछ तथाकथित चेले कह रहे हैं कि सत्य कूड़ेदान के हवाले करो और लगातार झूठ बोलकर अपना उल्लू सीधा करो । आपने स्वदेशी और सादगी का संकल्प लिया था,आपके चेले सिर्फ टोपी पहनकर सादगी का पाखंड रचते हैं ।

बापू जी आपने आजादी मिलने के बाद कांग्रेस को एक आंदोलन मानकर उसे खत्म करने का आदेश दिया था । कांग्रेसियों के गले आपका आदेश नहीं उतरा । वे दो अक्टूबर,तीस जनवरी,छब्बीस जनवरी और पंद्रह अगस्त पर आपकी समाधि पर जाकर हुकूमत करने का लाईसेंस रिन्यू कराते हैं । वे आपका नाम लेकर  मुल्क में भ्रष्टाचार की आंधी चलाते हैं और कालाधन विदेशी बैंकों में रखते हैं ।

सभी जानते हैं कि आपने कांग्रेसियों को हुकूमत करने का लाइसेंस अपनी मर्जी से नहीं दिया था लेकिन अब मुल्क पर दूसरी तबाही बरपा हो रही है । कुछ तथाकथित नव गांधीवादी कांग्रेस से यह लाइसेंस झपटने का प्रयास कर रहे हैं ।

हुकूमत गोश्त बेचने वाले की दुकान पर रखा मांस का टुकड़ा है । एक चील ने झपट कर उस टुकड़े को उठा लिया और आसमान में  उड़ गई । अब दूसरी चीलों का झुण्ड मांस के इस टुकड़े को छीन लेना चाहता है । जातक में कहा गया है कि बोधित्सव को यही दृश्य देखकर वैराग्य हो गया था । उन्हें लगा कि सत्ता का वैभव जिस प्राणी की चोंच में होता है उसे झपटने के लिये दूसरी चीलें तैयार रहती हैं । इसलिये सत्ता के वैभव को त्याग देना ही ठीक है ।

बापू जी समाजसेवी अन्ना आप के सच्चे शिष्य हैं । वे अपने सुख के लिये सत्ता का वैभव नहीं चाहते । उनका गुजारा तो एक छोटी सी कोठरी और एक जोड़ी कपड़े में हो जाता है लेकिन उनके तथाकथित रंगबिरंगे चेले सादगी का चोला ओढ़कर सब कुछ हथिया लेना चाहते हैं । निगाहें कहीं पर हैं और निशाना कहीं पर है । मुझे यकीन हैं कि आप कांग्रेस के क्रियाकलापों से क्षुब्ध हैं । अब अपने इन तथाकथित दूसरे भक्तों के गिरोह से देश को आप कैसे छुटकारा दिलायेंगे । अर्जी हमारी है,सो कर दिया । अब आप ही देश में दोबारा जन्म लेकर इन पाखंडियों से हमें छुटकारा दिलाईये ।

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बापू को लिखे इस पत्र में देश की राजनीतिक दशा या दुर्दशा कहना ज्यादा उचित होगा और दिशा दोनों ही को खूबसूरती से प्रस्तुत किया है आपने..आभार,,सादर


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